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2016-05-27

विद्युत विभाग का भ्रष्टाचार रोकना ही होगा


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संजय कटियार, कानपुर महानगर 

आज हमारे देश के विकास के लिए हो या दुनिया का कोई भी देश हो, चाहे वो विकसित की श्रेणी में हो अथवा विकासशील देश हो। वहां की जनता की सबसे बड़ी जरूरत यदि रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा कुछ है अगर तो वो है ‘बिजली’। जिसके बिना हम विकास की कल्पना भी नहीं कर सकते। बिजली हमारे जीवन की इतनी महत्व पूर्ण आवश्यकता होते हुए भी उसके उत्पादन के बाद यदि सबसे महत्वपूर्ण कुछ है तो वो है बिजली उपभोक्ताओं तक उसका निर्बाध और सुरक्षित वितरण होना ही होता है। बड़ी ही चिंता का विषय है कि आज केंद्र सरकार जहां अपनी पूर्ण शक्ति से देश में बिजली उत्पादन बढ़ाकर देश के 18000 उन गावों को बिजली पहुँचाने का कार्य कर रही जहां देश कि आजादी के 67 वर्षो के बाद भी बिजली तो दूर बिजली का खम्भा भी नहीं पहुंचा था। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अभी 7018 गावों तक बिजली पंहुचा दी गई है और कुल 1000 दिनों के भीतर देश का कोई भी गावों बिजली से वंचित नहीं रहेगा।

2016-03-13

देश को खोखला करता नशे का कारोबार


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जगजीत शर्मा

नए वर्ष की शुरुआत में ही गुरदासपुर स्थित एयरबेस को निशाना बनाकर हुआ आतंकी हमला नाकाम रहा और सारे आतंकी मार गिराए गए। इस मामले में गुरदासपुर के एसपी सलविंदर सिंह की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक, एसपी सलविंदर सिंह के नशा तस्करों से मिले होने का भी संदेह है। भारत-पाकिस्तान की सीमाओं से जुड़े होने के चलते पंजाब के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी भी खूब होती है। पंजाब से जुड़ी भारत-पाक सीमा पर आए दिन नशीले पदार्थ पाए जाते हैं या तस्कर गिरफ्तार किए जाते हैं। पंजाब ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के रास्ते काफी मात्रा में नशीले पदार्थ और नशीली दवाएं भारत आती हैं। एक सरकारी रिपोर्ट कहती है कि पिछले तीन सालों में भारत में नशीली दवाओं की तस्करी का प्रतिशत पांच गुना बढ़ा है। पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में बड़ी संख्या में लोग नशे के आदी हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंजाब के ग्रामीण इलाकों में 67 फीसदी लोग किसी न किसी प्रकार का नशा करते हैं। इनमें शराब, चूरा पोस्त, गांजा, चरस और हेरोइन आदि प्रमुख हैं। नशे के मामले में हरियाणा भी अछूता नहीं है। हरियाणा और पंजाब दोनों इस मामले में भले ही थोड़े बहुत अंतर से आगे-पीछे हों, लेकिन युवाओं में जिस तरह नशे की लत बढ़ती जा रही है, वह चिंताजनक है। पंजाब के युवाओं में जिस तरह नशा प्रेम बढ़ रहा है, वह भी शोचनीय है। कहा जाता है कि पंजाब के 70 फीसदी युवा नशा करने के आदी हैं।

2016-02-13

आतंकवाद विरोधी कठोर कानून 


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विकसित देशों द्वारा आतंकवाद के संदर्भ में कठोर कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ा गया है। आॅस्ट्रिया की संसद ने एक नया आतंकवादी निरोधी कानून पारित किया है। इस कानून के तहत आॅस्ट्रिया के अल्पसंख्यक संगठनों द्वारा विदेशों से धन तथा अन्य वित्तीय सहायता लेने पर संपूर्ण पाबंदी आरोपित कर दी गई है। इसके अलावा आॅस्ट्रिया में कुरान का जर्मन भाषा में अनुवाद कर उसे प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। आॅस्ट्रिया के इस कानून का वहां के अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा बहुत कम विरोध किया गया है। आॅस्ट्रिया की मुस्लिम आबादी में अधिकांश आबादी तुर्की से आए नागरिकों की है। तुर्की से यहां बहुत से इमामों को भेजा गया है तथा इन्हें तुर्की से काफी अधिक वित्तीय सहयोग भी प्राप्त होता है। आॅस्ट्रिया का कहना है कि वे सांप्रदायिक सौहार्द और सहिष्णुता को मान्यता देने वाले इस्लाम को स्वीकार करते हैं, परंतु कट्टरपंथी आतंकवाद को आॅस्ट्रिया में पनपने की अनुमति कदापि नहीं दी जा सकती। उल्लेखनीय है कि आॅस्ट्रिया के लगभग दो सौ युवक ‘आईएस’ से प्रभावित होकर इराक और सीरिया चले गए थे। आॅस्ट्रिया सरकार ने कहा है कि आॅस्ट्रिया में रहने वाले सभी नागरिकों को समान रहन-सहन और आचरण करना चाहिए। यदि कतिपय नागरिक दूसरों से भिन्न लगेंगे और दिखेंगे, तो इससे सामाजिक सौहार्द और सांस्.तिक विन्यास को क्षति पहुंचती है। आॅस्ट्रिया के अल्पसंख्यक नागरिकों को भी शेष समाज के साथ ही सहज रूप में रहना चाहिए। आॅस्ट्रिया में मुस्लिम महिलाएं भी सार्वजनिक स्थलों पर चेहरे पर नकाब पहनने या न पहनने के लिए स्वतंत्र हैं, परंतु ऐसा करने के लिए उनको कानूनन बाध्य नहीं किया जा सकता। 

2016-02-04

अनुचित शक्ति प्रदर्शन की ढपोरशंखी प्रवृत्ति      


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- पंकज के. सिंह

यदि कट्टरपंथी तत्व अपने देशों और अपने समाज में अन्य धर्मावलंबियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को बुनियादी मानवाधिकार देने को तैयार नहीं हैं, तो कैसे वे विश्व के अन्य देशों में दबाव बनाकर हठपूर्वक यही मानवाधिकार मांगने की नैतिक क्षमता रखते हैं। आखिर कब तक भारत, यूरोप और अमेरिका के प्रगतिशील उदारवादी वातावरण को कमजोर समझकर कट्टरपंथी संगठन इसका मनचाहा लाभ उठाते रहेंगे और इन देशों में अपनी घुसपैठ बढ़ाते रहेंगे। संपूर्ण विश्व के लिए आज यह आवश्यक हो गया है कि कट्टरपंथ के समूल उन्मूलन के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं। इसके लिए यदि प्रचलित रीति-नीति से आगे बढ़कर कुछ कठोर कदम भी उठाने पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए, क्योंकि यहां सवाल मानव जाति के संपूर्ण भविष्य का है। मानव जाति का भविष्य किसी भी संप्रदाय विशेष के भविष्य से अधिक महत्व का है। 

2016-01-25

जाति-भेद मिटाना है,नया भारत बनाना है 


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- पंकज के. सिंह

भारत को यदि वैश्विक मंच पर एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करानी है, तो पहले उसे स्वयं को अंदर से स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनाना होगा। यह तो हो नहीं सकता कि वैश्विक मंच पर हम एक विकसित देश के रूप में स्थापित हो जाएं और राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में अंदर से पाखंड, जाति-भेद, अंधविश्वासों और अलगाव के वायरस से ग्रसित बने रहें। भारत के लिए इससे अधिक लज्जास्पद और क्या होगा कि संपूर्ण योग्यताओं और संवैधानिक शक्तियां प्राप्त होने के बावजूद मात्र जातिगत पाखंड के कारण देश में ऐसा कई बार हुआ है, जबकि देश की विशिष्ट विभूतियों, जिनमें राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और संवैधानिक पदों पर आसीन गणमान्य व्यक्तियों तक को हिंदू पूजा स्थलों में प्रवेश नहीं दिया गया।इन्हीं पाखंडों की वजह से भारत की जगहंसाई होती है और स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी भारत एक योग्यताविहीन व्यवस्था के रूप में विपन्नता और अवैज्ञानिकता का पर्याय बना हुआ है। इस आशय के समाचार पूरे देश और विश्व की मीडिया द्वारा प्रसारित और प्रचारित किए जाते रहे हैं। जब विशिष्ट व्यक्तियों के साथ ऐसे कटु अनुभव होते रहते हैं, तो इस देश में सुदूर गांवों में आज भी जातिगत पाखंड की क्या स्थिति होगी, यह समझना कोई मुश्किल कार्य नहीं है। 

2016-01-16

क्यों दफन हो रही हैं मासूम बच्चियां?


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एम. अफसर खां सागर

कन्या भ्रूण हत्या के लिए यूं तो मुल्क में बाजाब्ता कानून है फिर भी बच्चियों को पैदा होने से पहले ही दन करने के मामले बदस्तूर जारी हैं। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान भी चल रहे हैं मगर उनका व्यापक असर आना बाकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो कन्या भ्रूण हत्या को मुल्क की मानसिक बीमारी तक बता दिया फिर भी लोग नहीं चेत रहे। धर्म चाहे कोई हो स्त्री को मां, बहन और बीबी का दर्जा हासिल है बावजूद इसके सामाजिक रूढ़िवादीता ने हमें न जाने कितना गिरा दिया है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों की पूजा की जाती है फिर भी पुत्र प्राप्ति की चाह में आज भी कई कन्याएं जन्म लेने से पहले ही दन कर दी जा रही हैं। बालिकाओं पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सरकारी तंत्र के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को इसके लिए आगे आना होगा। महिला सशक्तिकरण का परचम बुलन्द करने से पहले बालिकाओं को बचाने की जरूरत है, क्योंकि जब बालिकाओं ही वजूद खतरे में रहेगा तो ऐसी दशा में महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। महिलाओं पर होने वाले अपराधों की पहली शुरुआत कन्या भ्रूण हत्या से होती है। चिंताजनक और विचारणीय तथ्य है कि हमारे मुल्क के संवृद्ध राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ती गैरकानूनी, अमानवीय और घृणित है। इसके खिलाफ समाज को पुरजोर आवाज बुलन्द करना होगा। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या-भ्रूण हत्या की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं।

2016-01-09

 ‘आईएसआई’ की घातक सक्रियता 


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- पंकज के. सिंह

जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ‘आईएसआई’ आतंकी गतिविधियों और अवैध घुसपैठ बढ़ाने के मिशन में लगी हुई है। राज्य के अलगाववादी नेता और जेल से रिहा हुए आतंकियों व अपराधियों तक हथियार व अन्य संसाधन पहुंचाने के काम में ‘आईएसआई’ बहुत तेजी से लगी हुई है। जम्मू के कठुआ और सांबा क्षेत्रों में सेना की वर्दी में आए आतंकवादियों द्वारा आतंकी हमला कर अनेक पुलिसकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली गई। इन घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि राज्य के जम्मू क्षेत्र में सबसे अधिक संख्या में सीमापार से होने वाली घुसपैठ और आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। यह इलाका इसलिए भी अधिक संवेदनशील है, क्योंकि इस क्षेत्र से ही होकर अंतर्राष्ट्रीय सीमारेखा गुजरती है, जिसके कारण यहां बहुत बड़ी संख्या में अर्द्धसैनिक बलों, सेना तथा सुरक्षा बलों की तैनाती रहती है। यह भी उल्लेखनीय है कि यहां नियंत्रण रेखा की भांति उसी प्रकार की चैकस घेरेबंदी तथा तारों का जाल नहीं बिछाया गया है। राज्य के कश्मीर हिस्से में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना के जवान प्राथमिक सुरक्षा तंत्र के रूप में काम करते हैं। कठुआ तथा सांबा क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति भी कुछ इस प्रकार की है कि यहां घुसपैठ की घटनाओं को सबसे अधिक संख्या में अंजाम दिए जाने का प्रयास आतंकियों द्वारा किया जाता है। इस क्षेत्र में भारतीय सेना तथा सुरक्षा बलों को आतंकियों पर नियंत्रण स्थापित करने में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसी क्षेत्र में सबसे अधिक संख्या में भारतीय सैनिक और सुरक्षाकर्मी शहीद होते रहे हैं।

2016-01-07

बाल श्रम के कलंक से मुक्ति कब?


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स्निग्धा श्रीवास्तव

मैं उसका नाम नहीं जानती। लेकिन अकसर अपने घर से मेट्रो तक आने-जाने के दौरान उसे सड़कों से पालीथिन, कागज, प्लास्टिक और लोहे के टुकड़ों को बीनते देखती हूं। अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं, तो रेस्टोरेंट, ढाबों, दुकानों और अन्य जगहों पर बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे। चैदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना या करने को मजबूर करना, अपराध है। बालश्रम कराने वाले के खिलाफ अपराध साबित होने पर सजा भी हो सकती है,यह बात सबको मालूम है, लेकिन इसके बावजूद लोग थोड़े से लाभ के लिए बालश्रम कराते हैं, करने को मजबूर करते हैं। बच्चों के संरक्षण, उनकी स्वतंत्रता तथा सम्मान के महत्व के बारे में सभी एकमत हैं। बच्चों के हितों और संरक्षण का मामला भारत के संविधान में निहित है। इसके बावजूद, स्वतंत्रता के बाद से ही बच्चों के अधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है। आजादी के इतने साल बाद भी बच्चों के प्रति समाज का रवैया घोर निंदनीय है।

2016-01-04

आतंक के साये में रहा पंजाब


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अवनीश सिंह भदौरिया

पंजाब में पिछले कई वर्षों से आतंकी हमले होते आ रहे हैं। पांच माह पहले गुरदासपुर जिले के दीनानगर थाने पर आतंकी हमला शायद ही कोई भारतीय  भूला हो? अब फिर उन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति करते हुए सीमापार से आए सेना की वर्दी में आतंकियों ने पठानकोट एयरफोर्स बेस को निशाना बनाने की कोशिश की। सीमा से मात्र 20 किलोमीटर दूर आतंकवादियों ने पठानकोट एयरबेस पर सुबह तीन बजे धावा बोला, लेकिन वे असफल रहे। तीन दिन चले मुठभेड़ में पांच आतंकी मारे जा चुके हैं। दुख की बात यह है कि हमारी सेना के वीर जवानों ने देश की रक्षा करते हुए अपनी जिंदगी की आहुति दी। ऐसे वीर जवानों को पूरा देश सलाम करता है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे ही हमारे वीर जवान बलि चढ़ते रहेंगे और हम देखते रहेंगे? सोचने की बात यह भी है कि सीमापार से आतंकी हमारे देश कैसे आ जाते हैं? इसके पीछे क्या मनसूबे हैं? कुछ वर्षों से यही देखने को मिल रहा है कि बार-बार ऐसे आतंकी हमलों से पंजाब दहलता आया है। हमारी सरकार कुछ नहीं कर पाई, सिवाय चंद लफ्ज कहने के अलावा।

2016-01-04

चिंताजनक है सैनिकों में बढ़ता अवसाद


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लक्ष्मन शर्मा

बिगत वर्ष सितंबर महीने में हिसार की सैनिक छावनी की बैरक में केरल निवासी 33 वर्षीय दिलीप कुमार ने फांसी का फंदा लगाकर आत्म हत्या कर ली। हत्या का कारण पहली जांच में परिवार से दूर रहने के कारण उपजा अवसाद बताया गया। भिंड के एसडीएम बीबी अग्निहोत्री के आवास पर तैनात पूर्व सैनिक भूप सिंह भदौरिया ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। 10 मार्च 2015 को होमगार्ड कमांडेंट शिवराज सिंह चैहान की प्रताडना से आजिज आकर होमगार्ड सैनिक रामवीर शर्मा ने खुदकुशी कर ली। ये कुछ घटनाएं हैं, जो इस बात को साबित करती हैं कि सेना, अर्ध सैनिक बलों और पुलिस बल में आत्महत्या की घटनाएं दिनोंदिन बढ़ रही हैं। ऐसी घटनाओं का बढना, किसी भी सरकार के लिए चिंताजनक हो सकता है। वैसे, ऐसी घटनाएं सिर्फ भारत में ही बढ़ रही हैं, ऐसा भी नहीं है। इंग्लैंड, ईरान, इराक और अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय देशों में सैनिक विभिन्न कारणों से आत्महत्या कर रहे हैं।

2016-01-03

कलम के हथियार से तोड़ीं वर्जनाएं


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कलम का हथियार खुद थामा, लाखों महिलाओं को थमाया, क्रांति की शुरूआत हुई, लाखों वर्षों से रची वर्जनाएं तोड़ी गई। इस क्रान्ति की शुरूआत सिर्फ एक महिला ने कर दिखाई। जी हां वह कोई और नहीं! यह किया भारत की प्रथम महिला शिक्षिका क्रान्ति ज्योति सावित्री बाई फूले ने।  - पंकज कुमार सिंह

जहां भारतीय समाज में लाखों साल पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं के चलते महिलाओं को हांसिए पर ही रखा गया। जहां तरक्की के हर रास्ते में महिलाओं के लिए बंदिशों की बेड़ियां थी। जब महिलाएं को अपने घर की दहलीज़ को पार करना भी एक गुनाह से कम न था। जहां पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं को निचले दर्जे का ही स्थान प्राप्त था। ऐसे समाज में महिलाओं में क्रांति की अलख जगाई महान विभूति सावित्री बाई फूले ने। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं को हांसिए से निकालने के लिए तमाम विरोध झेलते हुए छोटी सी उम्र में कलम का हथियार थामा। खुद शिक्षा पाई और फिर एक बंड़ी क्रांति को अंजाम देते हुए लाखों महिलाओं को कलम का हथियार थमाया, क्रांति की शुरूआत हुई, लाखों वर्षों से रची वर्जनाएं तोड़ी गई।

2016-01-03

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो यहां हैं 


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रईस अहमद ‘लाली’

 भारतीय नागरिकता मिलने पर पाकिस्तानी गायक अदनान सामी ने कुछ इन शब्दों में ट्विटर पर अपनी खुशी का इजहार किया-‘एक नई शुरुआत, एक नया अहसास, एक नया जुड़ाव, एक नया प्यार, एक नया देश, जय हिंद!’ अदनान सामी को नये साल का इससे बड़ा तोहफा मिल भी क्या सकता था! पिछले 11 से ज्यादा वर्षों से वे भारत में रह रहे थे। उन्हें लगता था कि इस मुल्क ने उन्हें बहुत प्यार, बहुत अपनापन दिया है। इस अपनेपन को वे लगातार महसूस करते रहे। और इसी की परिणति है कि वे आगे की अपनी जिंदगी इसी वतन की सरजमीं पर गुजारने के तलबगार हो गये। एक जनवरी 2016 को उन्हें भारत की नागरिकता मिल गई। वे भारतीय नागरिक बन गए। अदनान सामी ऐसी पहली पाकिस्तानी शख्सियत नहीं हैं, जिन्हें हिंदुस्तान इतना रास आया हो कि वे यहां आए और यहीं बस गए। इससे पहले के भी ऐसे ढेरों उदाहरण रहे हैं, जहां पाकिस्तान की सरजमीं को हमेशा के लिए छोड़कर किसी ने हिंदुस्तान को अपना वतन मान लिया और यहीं का होकर रह गया। दरअसल, पाकिस्तानी हस्तियों को भारत में जितना मौका और महत्व मिलता रहा है, वह उन्हें भारत को न सिर्फ एक खूबसूरत देश मानने को बाध्य करता है बल्कि इसकी मिट्टी का हिस्सा बनने को भी लालायित करता है।

2016-01-01

1 जनवरी ‘बैटल आॅफ कोरे गांव’


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1 जनवरी 1818 को भारत के पांच सौ वीर सपूतों ने देश में वीरता और पराक्रम की वो कहानी गढ़ दी थी जो दुनियां में भारत के दम-खम के लिए आज भी नजीर पेश करती है। यह वीर गाथा उन पाॅच सौ महार वीर योद्धाओं की है जिन्होंने बाजी राव पेशवा के अट्ठाईस हजार सैेनिकों को यु़द्ध में छक्के छुड़ा दिये और उसके क्रूर शासन का अन्त किया। यहीं से भरी गई हजारों वर्ष पुराने छुआ-छूत, ऊंच-नीच की व्यवस्था के विरूद्ध हुंकार। 1 जनवरी को इसी वीरता को शौर्य दिवस के रूप में याद किया जाता है।

 - पंकज कुमार सिंह

भारत के इतिहास में बहुत सी घटनाएं ऐसी हैं जिनकी जानकारी से हम आज भी अनभिज्ञ हैं। कोरे गांव का महासंग्राम एक ऐसा वास्तविक युद्ध था जो विश्व के इतिहास में शायद ही हुआ हो। इतने बड़े इतिहास को भारत में दबा छुपाकर रखा गया है। यह इतिहास की वो कहानी हैं जो वर्तमान भारत के शौर्य और पराक्रम की नींव कही जा सकती है। जी हाॅं! महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का इतिहास कुछ यही दर्शाता है।

2015-12-31

अलविदा वर्ष में हुए ऐतिहासिक फैसले व कार्य 


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जनपद कानपुर देहात का विकास दिनों दिन निरन्तर हो रहा है। वर्तमान में लोकप्रिय सरकार के युवा मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में प्रदेष का चतुर्दिश विकास हुआ है वहीं जनपद में भी लोक कल्याणकारी विकास परक कार्यक्रम लाभपरक योजनाओं को जिलाधिकारी कुमार रविकान्त सिंह व मुख्य विकास अधिकारी राजकुमार श्रीवास्तव ने वर्ष 2015 में विकास को पर दिए हैं परिणाम स्वरूप जनसामान्य तक पहुंॅचाने एवं समाज के अन्तिम छोर पर खडे़ व्यक्ति को मुख्य विकास की धारा में जोड़ने के अपने मकसद में सफल दिखा। पुलिस अधीक्षक सभाराज के नेतृत्व में भी जनपद में कानून व शान्ति व्यवस्था पूरी तरह दुरूस्त रही वहीं शासन की मंशानुरूप जनपद में निरन्तर विकास व शासन द्वारा निर्धारित सभी योजनाओं को बेहतर तरीके से क्रियान्वयन भी किया गया। 3021 वर्ग किमी क्षेत्रफल के जनपद में नयी तहसील मैथा बनी जिसने अन्य तहसीलें की भांति अपना कार्य सकुशल प्रारम्भ भी कर दिया है। पर्यटन एवं ऐतिहासिक स्थल शुक्ल तालाब का जीर्णोद्धार हुआ वहीं वन चेतना केन्द्र औनहाॅं व सिविल लाइन माती स्थित डा0 राम मनोहर लोहिया ईको पार्क जिसका क्षेत्रफल 3.76 हेक्टेयर का है जो अधिकतर विकसित भी हो चुका है। जनपद औद्योगिक क्षेत्र दुग्ध परियोजना जिसका शिलान्यास मा0 मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव जी के कर कमलों से हुआ था, वर्तमान में उसका कार्य भी युद्धस्तर पर प्रारम्भ हो गया है। रसूलाबाद में हवाईपट्टी का कार्य भी प्रगति पर है।

2015-12-27

कब मिलेगा पीने को साफ पानी?


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जगजीत शर्मा

भारत में पेयजल की समस्या का काफी विकट है। गांवों की लगभग 80-85 फीसदी आबादी का गुजारा कुओं या हैंडपंप के पानी से होता है। शहरों में ज्यादातर लोग स्थानीय निकायों द्वारा की जा रही जलापूर्ति पर ही निर्भर रहते हैं। शहर और गांवों में अधिसंख्य आबादी को होने वाली जलापूर्ति प्रदूषित रहित है, इसकी कोई भी गारंटी नहीं ले सकता है। यही वजह है कि शहरों और गांवों की अधिकतर आबादी जल जनित रोगों के शिकार होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि भारत के दस फीसदी बच्चे जिनकी आयु पांच वर्ष से कम है, घातक रोग डायरिया से पीडिघ्त होकर मर जाते हैं। वहीं सरकार का दावा है कि भारत में लगभग 86 प्रतिशत परिवार स्वच्छ पेयजल का उपयोग करते हैं।सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से लोगों तक स्वच्छ जल की पहुंच का आंकड़ा बढ़ा है। वर्ष 1991 में जहां देश के सिर्फ 62 फीसदी परिवारों तक स्वच्छ पेयजल की पहुंच थी, वहीं 2001 में यह आंकड़ा बढ़कर 71 फीसदी तक पहुंच गया। 2011 में यही आंकड़े 86 फीसदी पहुंच गए थे। इसमें ग्रामीण इलाके के 83 फीसदी और शहरी इलाकों के 91 फीसदी लोग शामिल थे। केवल 44 फीसदी परिवारों तक नल के पानी की पहुंच है एवं इनमें से भी केवल 32 फीसदी परिवारों तक नल का पानी परिष्कृत होकर पहुंचता है।

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