Wednesday, October 21, 2026
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रामलीला बदली तो बदल गया आस्था का रंग

➤ कभी 25 दिन तक मंदिरों में रहते थे राम-लक्ष्मण-सीता के स्वरूप, अब 12 से 15 दिन में सिमट गया मंचन

हाथरस। शहर की रामलीला ने पिछले करीब तीन दशकों में समय के साथ अपना स्वरूप बदल लिया है। कभी रामलीला स्थानीय लोगों की आस्था, अनुशासन और सामूहिक सहभागिता का केंद्र हुआ करती थी। भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के स्वरूप शहर के ही विभिन्न क्षेत्रों से चुने जाते थे। इन पात्रों के लिए धार्मिक मर्यादाओं का पालन अनिवार्य था। प्रमुख स्वरूपों को रामलीला के पूरे आयोजन के दौरान घर से दूर मंदिरों में रहना पड़ता था। आज वही रामलीला बाहरी और पेशेवर मंडलियों के कलाकारों के सहारे मंचित हो रही है। आयोजन की अवधि भी घटकर करीब 12 से 15 दिन रह गई है। समय के साथ बदले इस स्वरूप ने रामलीला की परंपराओं, स्थानीय भागीदारी और आस्था की अभिव्यक्ति को भी प्रभावित किया है।

पुराने दौर में रामलीला में पात्र बनना महज अभिनय नहीं, बल्कि धार्मिक जिम्मेदारी माना जाता था। भगवान राम का स्वरूप धारण करने वाले कलाकार को प्रभु के समान सम्मान दिया जाता था। मोहल्ले के लोग उनके चरण स्पर्श करते थे। प्रमुख भूमिकाओं के लिए अविवाहित ब्राह्मण बच्चों का चयन करने की परंपरा थी। पात्रों का चयन विद्वानों की देखरेख में उनकी योग्यता के आधार पर किया जाता था।

एक भूमिका, एक पात्र और 25 दिन का कठोर अनुशासन

पुराने समय में रामलीला के स्थानीय कलाकार आयोजन शुरू होने से काफी पहले ही अभ्यास में जुट जाते थे। प्रतिदिन चौपाइयों का अभ्यास कराया जाता था और संवादों के साथ मंचन की तैयारी होती थी। एक कलाकार पूरी रामलीला में एक ही पात्र की भूमिका निभाता था। राम, लक्ष्मण, सीता, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूपों को कई दिनों तक मंदिरों में रहना पड़ता था। उनके लिए धार्मिक अनुशासन और मर्यादाओं का पालन विशेष महत्व रखता था। रामलीला के अलग-अलग प्रसंग शहर के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाते थे। पत्थर वाले बाजार में आकाशवाणी का मंचन होता था, जबकि अन्य प्रमुख प्रसंगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। राजगद्दी के आयोजन की भी अलग व्यवस्था रहती थी। रामलीला संपन्न होने के बाद स्वरूप गंगा स्नान करते थे और फिर अपने घर लौटते थे।

वर्ष 1973 में जानकी का स्वरूप निभाने वाले अशोक शर्मा बाद में लगातार 11 वर्षों तक भगवान राम की भूमिका में रहे। वह बताते हैं कि उस समय सार्वजनिक धार्मिक सभा रामलीला कमेटी ही आयोजन कराती थी। कमेटी आज भी रामलीला का आयोजन कर रही है, लेकिन कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव आ गया है। उनके अनुसार, पहले स्वरूपों में रामलीला के प्रति जिस तरह का श्रद्धाभाव और समर्पण देखने को मिलता था, वह अब कम दिखाई देता है। शिवानंद शर्मा भी हाथरस की रामलीला में स्थानीय राम का स्वरूप निभाने वालों में शामिल रहे हैं। उनके अनुसार, बाद में मथुरा की मंडली के माध्यम से रामलीला मंचन की शुरुआत हुई। पहले पात्रों के चयन से लेकर उनके धार्मिक अनुशासन तक की पूरी व्यवस्था अलग थी। अब पेशेवर कलाकारों के आने से मंचन की परंपरा में बदलाव आया है।

1994 के बाद बढ़ा बाहरी मंडलियों का चलन

रामलीला कमेटी के अध्यक्ष भोला पहलवान के मुताबिक, समयाभाव के कारण स्थानीय लोगों की भागीदारी पहले जैसी नहीं रह गई। वर्ष 1994 में पहली बार वृंदावन की मंडली को रामलीला मंचन के लिए बुलाया गया था। दर्शकों को मंडली का प्रदर्शन पसंद आया। इसके बाद बाहरी मंडलियों से रामलीला कराने की परंपरा धीरे-धीरे बढ़ती गई। पहले रामलीला का आयोजन करीब 25 दिनों तक चलता था, लेकिन अब इसे 12 से 15 दिनों में पूरा कर दिया जाता है। पहले शहर के अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता था, जबकि अब अधिकांश कार्यक्रम एक ही मंच पर आयोजित किए जाते हैं। इससे आयोजन की अवधि और व्यवस्था में बदलाव आया है। हालांकि, रामलीला के प्रति शहर के व्यापारियों का सहयोग आज भी बना हुआ है। गल्ला व्यापारी, दाल मिल संचालक, रुई व्यापारी और गल्ले के आढ़तिये अब भी आयोजन के लिए आर्थिक सहयोग करते हैं। इससे स्पष्ट है कि मंचन की शैली बदलने के बावजूद रामलीला से शहर का जुड़ाव बरकरार है।

भजन और संतों के आशीर्वाद की परंपरा भी पड़ी कमजोर

पुरानी रामलीला में भजन गायन विशेष आकर्षण हुआ करता था। खिच्चोमल अखाड़े में खलीफा रहे स्वर्गीय राधाकिशन भजन लिखते और गाते थे। उनके बेटे हरीश वार्ष्णेय बताते हैं कि वनवास के प्रसंग के दौरान 25 से 30 लोग सामूहिक रूप से करुण भजनों का गायन करते थे। इन भजनों से वातावरण भक्तिमय हो जाता था। समय के साथ यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। उस दौर में रामलीला के स्वरूप संतों से आशीर्वाद लेने भी जाते थे। रामबारात के अवसर पर भगवान राम सहित अन्य स्वरूप दूल्हे के वेश में गोवर्धन पहुंचकर संत गया प्रसाद से आशीर्वाद लेते थे। बताया जाता है कि संत गया प्रसाद स्वरूपों को अपनी गोद में उठाकर अंदर तक ले जाते थे और उनके जूठे भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। यह परंपरा रामलीला के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को दर्शाती थी।

मंचन बदला, लेकिन सांस्कृतिक पहचान बरकरार

रामलीला से जुड़े पुराने लोगों का मानना है कि पहले इसके प्रत्येक प्रसंग में जीवन और समाज के लिए कोई न कोई संदेश छिपा होता था। भाई के प्रति भाई का प्रेम, माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवक का स्वामी के प्रति समर्पण जैसे आदर्श मंचन के माध्यम से लोगों के मन में उतरते थे। आज बाहरी मंडलियों के कलाकार आते हैं, अपनी भूमिकाएं निभाते हैं और आयोजन पूरा होने के बाद लौट जाते हैं। ऐसे में स्थानीय कलाकारों की भागीदारी और सामूहिक श्रद्धाभाव में कमी महसूस की जा रही है। हालांकि, बदलते समय और परिस्थितियों के बीच हाथरस की रामलीला आज भी शहर की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।