लम्हे-लम्हे, पल-पल जीवन गुजर रहा है
जाने ये कब से सतत, चल रहा है
साँसे आती है, जाती है, गुजर जाती है
सीना इस आग में, कब से सुलग रहा है?
कभी फकीरी में भी, मौज थी अपनी
जिधर देखो उधर, अपनो की फैज थी
यहाँ भीड़ बहुत है, मगर उसमें हम नही
ये जीवन का सफर, अकेले चल रहा है।
लेख/विचार
400 किमी दूर UP PET परीक्षा केंद्र: नकलविहीन परीक्षा या युवाओं की अग्निपरीक्षा?
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए प्रारंभिक अर्हता परीक्षा (PET) लाखों अभ्यर्थियों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। आरोप है कि अनेक अभ्यर्थियों को उनके गृह जनपद से सैकड़ों किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र आवंटित किए गए हैं। कानपुर के अभ्यर्थियों को मथुरा और अलीगढ़ जैसे शहरों में परीक्षा देने जाना पड़ रहा है। कानपुर से मथुरा की बताई गई शहरी दूरी लगभग 339 किलोमीटर है। ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए यह दूरी 400 किमी से ऊपर हो जाती है। यदि किसी अभ्यर्थी को परीक्षा देने के लिए इतनी दूर जाना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर परीक्षा व्यवस्था की सुविधा के लिए अभ्यर्थी को इतनी बड़ी कीमत क्यों चुकानी चाहिए?
यह मामला केवल परीक्षा केंद्र की दूरी का नहीं है। यह युवाओं के समय, धन, सुरक्षा, गरिमा और समान अवसरों से जुड़ा सवाल है। उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) को स्पष्ट करना चाहिए कि दूरस्थ परीक्षा केंद्र आवंटित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और क्या इस व्यवस्था के मानवीय तथा आर्थिक परिणामों का आकलन किया गया है?
रावण का पश्चाताप: एक ऐसा संदेश, जो हर दशहरे पर हमें अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करता है
मैं रावण हूँ! मुझे कौन नहीं जानता? जी हाँ, मैं वही रावण हूँ, जिसे हर वर्ष दशहरे की रात बड़े धूमधाम से जलाया जाता है। मेरे पुतले के दहन के साथ ही लोग असत्य पर सत्य की विजय, अधर्म पर धर्म की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। मुझे दुराचारी, दुष्ट, कपटी और अहंकारी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। लोग मेरे दस सिरों को बुराइयों का प्रतीक मानते हैं और हर वर्ष मेरे पुतले को आग के हवाले करके यह विश्वास करते हैं कि उन्होंने बुराई पर विजय प्राप्त कर ली है। हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने ऐसे कर्म किए, जिनके लिए मुझे कभी क्षमा नहीं मिल सकती। मेरा सबसे बड़ा अपराध माता सीता का अपहरण करना था। मैंने अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्य और अपने अहंकार के मद में एक नारी की स्वतंत्रता, सम्मान और मर्यादा का अपमान किया। यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, जिसकी कीमत मुझे अपने जीवन, अपने परिवार और अपने स्वर्णिम साम्राज्य को खोकर चुकानी पड़ी। आज भी हर वर्ष मेरा पुतला जलाया जाता है और मैं मानो अपनी उसी भूल की सजा भुगत रहा हूँ। लेकिन आज मैं आपसे अपने मन की कुछ बातें कहना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी कहानी को केवल एक पौराणिक कथा समझकर भुला न दिया जाए, बल्कि उससे कुछ सीखा जाए। क्योंकि मेरी हार में छिपी सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी मेरे समय में थी।
मेरे पास किस चीज की कमी थी? – आज जब मैं अपने बीते हुए जीवन को याद करता हूँ, तो मन में एक ही प्रश्न उठता है- आखिर मेरे पास किस चीज की कमी थी, जो मुझे उस अपराध की ओर ले गई? मेरे पास सोने की लंका थी, जिसकी समृद्धि और वैभव की चर्चा दूर-दूर तक होती थी। मेरे पास महाबली भाई कुंभकर्ण था, जो मेरे लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करता था।
प्रदीप कुमार जैन : पत्रकारिता का राष्ट्रीय विश्वास, प्रेस काउंसिल में पुनः दायित्व
पत्रकारिता में पद मिलना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन वर्षों तक विश्वास अर्जित करना और उसे बनाए रखना ही किसी पत्रकार की वास्तविक पूंजी है। श्री प्रदीप कुमार जैन की पत्रकारिता यात्रा इसी विश्वास, संस्कार और निरंतर कर्मशीलता की कहानी है। राष्ट्रीय स्तर पर राजा श्रेयांस पत्रकारिता पुरस्कार, से सम्मानित श्री जैन का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में पुनः सदस्य मनोनयन उनकी दीर्घ पत्रकारिता साधना और सामाजिक सरोकारों की राष्ट्रीय स्वीकृति है। 7 अक्टूबर 2026 की केंद्र सरकार की अधिसूचना के माध्यम से उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है।
यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है कि जिस ‘दैनिक विश्व परिवार’ की पत्रकारिता परंपरा से श्री प्रदीप कुमार जैन जुड़े हैं, वह स्वयं अब अपनी यात्रा के स्वर्णिम वर्ष में प्रवेश कर चुका है। वर्ष 1976 में झांसी से स्वर्गीय श्री कैलाशचंद जी द्वारा स्थापित ‘दैनिक विश्व परिवार’ ने पांच दशकों की यात्रा में पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। आज यह समाचार-पत्र झांसी और रायपुर दोनों स्थानों व दो राज्यों से प्रकाशित हो रहा है। स्वर्णिम वर्ष के अवसर पर परिवार की इस गौरवपूर्ण पत्रकारिता परंपरा के प्रतिनिधि श्री प्रदीप कुमार जैन का राष्ट्रीय पत्रकारिता के सर्वाेच्च संस्थागत मंचों में से एक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में पुनः दायित्व प्राप्त करना निश्चित ही एक विशेष और गौरवपूर्ण संयोग है।
विश्व परिवार: नाम में ही एक व्यापक दृष्टि
विश्व परिवार केवल एक समाचार-पत्र का नाम नहीं, बल्कि एक विचार और जीवन-दृष्टि है। इसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के साथ प्राणीमात्र के कल्याण का व्यापक संदेश निहित है। ऐसे समय में जब पत्रकारिता में नकारात्मकता और सनसनी की प्रवृत्तियां अक्सर चर्चा में रहती हैं, दैनिक विश्व परिवार ने सकारात्मक, रचनात्मक और समाज को जोड़ने वाली पत्रकारिता को अपनी विशिष्ट पहचान बनाया है।
इस परंपरा की नींव रखने वाले स्वर्गीय श्री कैलाशचंद जी स्वयं पत्रकारिता के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे और उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष ,नगर पालिका झांसी के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन कर चुके थे। परिवार की पत्रकारिता यात्रा को आगे बढ़ाने में उनके पुत्रों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा। स्वर्गीय श्री प्रवीण कुमार जैन ने झांसी संस्करण में लगभग 15 वर्षों तक संपादक के रूप में अपनी सेवाएं देकर समाचार पत्र को विशेष ऊंचाइयां दीं और सामाजिक क्षेत्र में भी आपने विशिष्ट कार्य किए । उनके आकस्मिक निधन से पत्रकारिता का समाज सेवी चेहरा चिर निद्रा में विलीन हो गया ।
चाइनीज़ मांझा: प्रतियोगिता बनाम नैतिकता का क्रूर केस स्टडी
चाइनीज़ मांझा भारत में एक नायाब उदाहरण है, जो प्रतियोगिता और नैतिक पतन का, या सीधे-सीधे कहें तो गला-काट प्रतियोगिता का, उदाहरण है। इस मांझे से भारतीयता से लेकर मानवता तक कई पैमाने आप माप सकते हो। चाइनीज़ मांझे से देश भर में लोग घायल हो रहे हैं और जान गंवा रहे हैं। जान गंवाने वालों की संख्या किसी भी नॉर्डिक कंट्री में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या से ज़्यादा है। ऐसे में हम लोगों के बीच एक सवाल है। क्या लोग अपनी 10-20 रुपए की पतंग को बचाने की कोशिश में, या पतंगबाज़ अपनी दक्षता की साख को बचाने की कोशिश में ऐसा कर रहे हैं? हाल ही में मेरे शहर बनारस में एक व्यवसायी की मौत चाइनीज़ मांझे से गला कटने से हुई।
एआई : अभिशाप या वरदान
जब से मोबाइल का विस्तार होना शुरू हुआ है, तब से मोबाइल तकनीक की दुनिया में तहलका मचा हुआ है। हर थोड़े समय पर नए फीचर्स आते रहते हैं, मोबाइल अपडेट होते रहते हैं। इसी तकनीकी क्रांति की अगली और सबसे बड़ी सीढ़ी है—एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। एआई के जनक अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक जॉन मैकार्थी थे। भारत में एआई की शुरुआत 1980 के दशक में प्रोफेसर एच. एन. महाबला और अन्य वैज्ञानिकों तथा सरकार के प्रोजेक्ट्स द्वारा हुई।
आज जब से चैटजीपीटी, जेमिनी और जेनेरेटिव एआई आया है, तब से इसने बड़े से लेकर बुजुर्ग तक को अपनी चपेट में ले रखा है। कहीं मौज-मस्ती के लिए, तो कहीं जानकारी के लिए और कहीं समय बचाने के लिए अनेक कारणों से इस तकनीक का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। अब तो एआई “मल्टीमॉडल” हो गया है। यानी यह हमारी आवाज सुनकर और कैमरे से हमारे आसपास देखकर इंसानों की तरह सजीव बातचीत कर सकता है। कार्यक्षमता और गतिशीलता भी इंसानों की तुलना में ज्यादा है।
Read More »2075 के भारत के लिए रेलवे का निर्माण
माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 8 सितंबर को पूर्ण हो चुके पश्चिमी समर्पित माल गलियारे—वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर—को राष्ट्र को समर्पित किया जाना भारतीय रेल के बदलते स्वरूप की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने रेलवे के बुनियादी ढाँचे पर विशेष बल दिया है—विद्युतीकरण, नई रेल लाइनें, दोहरी और बहुल लाइनें, स्टेशनों का पुनर्विकास, आधुनिक ट्रेनें, बेहतर सुरक्षा एवं सिग्नल प्रणाली और देश के सर्वाधिक व्यस्त रेलमार्गों पर अतिरिक्त क्षमता का निर्माण इसी प्रयास का हिस्सा हैं।
वडोदरा में प्रधानमंत्री ने इस व्यापक सोच को कुछ शब्दों में बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया—“हम लोगों और सामान को अधिक तेजी से पहुँचाने, नए अवसर पैदा करने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए भारत के बुनियादी ढाँचे को मजबूत कर रहे हैं।”
Read More »AI द्वारा खोज रहे भूत, भविष्य और आज के वर्तमान के लोग
आज 80 के दशक को खोज रहा युवा, Gen Z…
अतीत में लौटना चाह रहा है, क्योंकि वह भीड़ से दूर आत्मिक प्रेम, शांति और मानवीय संवेदनाओं को महसूस करना चाहता है। कई लोग, जो 80 के दशक में पैदा हुए, वे भी अपने आप को उसी दशक में लौटा रहे हैं। हैरत की बात है कि लोग वर्तमान में नहीं, बल्कि अतीत में खुद को खोज रहे हैं। यह बात आज सिर्फ भविष्य में भूतकाल को खोजने तक ही सीमित नहीं है। जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी विकसित हो रही है, वैसे-वैसे दिमागी विस्तार के साथ बहुत कुछ संभव है। आज हो न हो, कल बहुत कुछ होगा। जैसे फेसबुक का ही फीचर था, आपके फोटो को कई सारे कैप्शन में परिवर्तित करने का। वह डेवलप होकर आज AI बन चुका है। आज AI आपको बहुत सारे फीचर दे रहा है।
Read More »मिट्टी बचेगी, तभी खेती बचेगी
भारतीय कृषि अब एक नए युग की ओर अग्रसर है, जहाँ विकास का आकलन करने के लिए केवल वृद्धि ही एकमात्र मापदंड नहीं रह गया है। मिट्टी की घटती उर्वरता, भूजल की कमी, जैव विविधता का क्षय, जलवायु परिवर्तनशीलता और बढ़ती खेती लागत के कारण किसान और कृषि क्षेत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इस संदर्भ में, पुनर्योजी कृषि एक आशाजनक मार्ग है। यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो न केवल वर्तमान प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेगा, बल्कि वास्तव में मिट्टी के स्वास्थ्य, जैव विविधता, जल प्रणालियों और पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों को बेहतर बनाकर कृषि उत्पादकता को बनाए रखेगा।
मुख्य बात पुनर्योजी कृषि पर ध्यान केंद्रित करना और कृषि के पारिस्थितिक स्तंभों को पुनर्स्थापित करना है। गहन खेती, रासायनिक इनपुट पर अत्यधिक निर्भरता और एक ही फसल की खेती के कारण पिछले कई दशकों से कुछ क्षेत्रों में पोषक तत्वों का असंतुलन और मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो गई है।
Read More »अपने ही बुने जाल में फंसे मुख्य राजनीतिक दल
अपनी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयास में राजनीति कब किस कुचक्र में फंस जाए तथा अपनी ही चालों में भटककर आम आदमी के लिए संकट खड़ा कर दे, कहा नहीं जा सकता। भारत की जाति आधारित राजनीति राष्ट्र की एकता व अखंडता को दांव पर लगाकर कब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए जन भावनाओं को आहत करने लगे, इसका भी पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।
भारत की राजनीति प्रारंभ से ही सवर्ण विरोध पर आधारित रही है। देश का सवर्ण वोट बैंक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का बिना शर्त वाला वोट बैंक रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस या भाजपा ने कभी सवर्ण मतदाताओं की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया। विभिन्न राज्यों में केवल चंद जातियों को अपना वोट बैंक मानने वाले राजनीतिक दलों ने अपनी विशेष जाति के अतिरिक्त सामान्य वर्ग में आने वाली जातियों को अपना वोट बैंक नहीं समझा। यही कारण रहा कि गैर भाजपा व गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता पार्टी तथा अन्य दलों में ब्राह्मण, राजपूतों, वैश्यों, कायस्थों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया गया। सार्वजनिक मंचों पर आज भी इन दलों का सवर्ण विरोधी चरित्र उजागर है।
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Jansaamna