Friday, March 6, 2026
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लेख/विचार

एक घंटा

न जाने वो कैसी औरतें होती हैं जो अपना ध्यान नहीं रखतीं। ना अपने चेहरे का और ना ही अपने शरीर का। ढीली स्किन और बेडौल शरीर ऐसा लगता है जैसे कि बस शादी करने के लिए ही उनको सुंदर दिखना था। शादी हो जाने के बाद जैसे उनका मकसद पूरा हो गया और फिर अपनी ओर ध्यान मत दो। फिर भी कपड़े फैशनेबल चाहिए रहते हैं ताकि अच्छी दिख सकें। फिर भले ही वो कपड़े उन पर अच्छे लगे या ना लगे। रिया अपनी टेबल पर बैठी हुई यह बात अपनी कलीग से कह रही थी जिसे कुछ ही दिन हुए थे स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करते हुए। पास में ही बैठी  सलोनी मुस्कुराने लगी उसने पूछा, “तुम्हारी शादी हो गई है क्या?”
रिया:- “नहीं, अभी नहीं हुई!”
सलोनी:- “अच्छा! तभी ऐसा बोल रही हो। जब शादी हो जाएगी और तब उसके बाद के अनुभव शेयर करना मेरे साथ और फिर जो बात तुमने अभी कही है वो फिर से कहना।”

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कथावाचकों के लिए भी एक मानक बने

इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है। परन्तु बदले परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है। प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है। श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के एक भाग अथवा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। आचार्य का पद उपाध्याय से दस गुना अधिक बड़ा बताया गया है। क्योंकि आचार्य की सेवाएँ निःस्वार्थ होती थीं। एक समय इन्हीं गुरुजनों के माध्यम से गुरुकुल के विद्यार्थी वेद, वेदान्त, वेदांग तथा स्मृतियों आदि का ज्ञान प्राप्त करते थे। कालान्तर में वेद व्यास ने जब पुराणों की रचना की तब ये पुराण भी गुरुकुलों के पाठ्यक्रमों में क्रमशः शामिल किये गये। जिनमें वर्णित महापुरुषों की कथाएं विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन तथा मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। इन पुराणों को गुरुकुलों तक पहुँचाने के मुख्य सूत्रधार व्यास जी के शिष्य लोमहर्षण सूत जी थे। सूत जी ऋषियों को पुराण सुनाते और ऋषिगण अपने शिष्यों को।

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महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी

2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब राजनीतिक दल अभी से महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाएँ। केवल आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं; दलों को आंतरिक कोटा, वित्तीय सहयोग, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और निर्णयकारी भूमिका में महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी। अगर यह मौका चूक गया तो आरक्षण भी दिखावा बन जाएगा। समावेशी और सशक्त लोकतंत्र के लिए अब निर्णायक और नीतिगत पहल ज़रूरी है। -प्रियंका सौरभ
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, यानी संविधान का 106वां संशोधन, भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का ऐतिहासिक प्रयास है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, लेकिन इसकी सफलता महज संविधान में दर्ज होने से नहीं होगी—बल्कि इस पर अमल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होगी। वर्ष 2029 के आम चुनावों में यदि यह आरक्षण प्रभावी होता है, तो यह न केवल भारत के लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़ होगा, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व की दिशा भी तय करेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को अभी से व्यापक और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे।

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क्या वाकई कानून अंधा है?

हालांकि महिलाओं के प्रति बर्बर हादसे कोई नई बात नहीं है, यह समस्या काफी पुरानी है। निर्भया कांड के बाद लोगों में जो एक डर बैठ गया था और उसके मद्देनजर जो कानून बनाए गए थे उसके द्वारा इस तरह के अपराधों में कोई रोकथाम हुई हो ऐसा नजर नहीं आता है बल्कि हाल के दिनों में उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। पाक्सो एक्ट (2012) भी कुछ समय पहले ही लागू हुआ है। पिछले कुछ समय से निर्भया जैसी ही बर्बरता फिर से देखने सुनने में आ रही है। अनेक वीडियो वायरल हो जाते हैं जिनमें वीभत्सता देखी नहीं जाती। दिल दहल जाता है। इस तरह के अपराधी कुछ वो लोग होते हैं जिनका बैकग्राउंड ही अपराधिक होता है और कुछ सफेदपोश अपराधी होते हैं। हालांकि आपराधिक बैकग्राउंड होना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन सत्ता पर काबिज लोग ही मनमर्जियां करते हैं। सवाल यह उठता है कि इतने कानून बनाए जाने के बाद भी उन पर अमल कितना हो पाता है? कितने अपराधी पकड़े जाते हैं? सजा कितनों को मिलती है? बड़ी बात यह है कि पावर, पैसा के जरिए जमानत मिल जाती है और अपराधी अपराधमुक्त हो जाते हैं।

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पारंपरिक खेल: शारीरिक, मानसिक एवं संज्ञानात्मक विकास का आधार

मनुष्य के विकास में खेलों की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि वे बच्चों और युवाओं के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास में भी अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। परंतु वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण और मोबाइल क्रांति ने इन खेलों की जगह आधुनिक डिजिटल खेलों को दे दी है, जिससे बच्चों का जीवन-शैली और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में पारंपरिक खेलों का विशेष स्थान रहा है। कबड्डी, खो-खो, कुश्ती, कंचे, लंगड़ी टांग, पिट्टू, गिल्ली-डंडा, टायर दौड़, लुका-छिपी, गदा-पीठी, घरगुला आदि खेल गाँवों और शहरों दोनों में लोकप्रिय थे। इन खेलों में केवल मनोरंजन ही नहीं था, बल्कि इनमें जीवन के लिए आवश्यक अनेक गुण भी छिपे होते थे।

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“मां के प्रति पुत्र का वैचारिक आकलन”

आइए जानते हैं एक पुत्र अपनी मां के विषय में उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर क्या-क्या विचार रखते हैं।
(1) 0-3 वर्ष = संसार की सबसे ख़ास व अनमोल है उसकी मां। वह सदैव अपनी मां की छत्रछाया में अपने को सुरक्षित महसूस करता है।
(2) 04-05 वर्ष = मेरी मां बहुत महान है और दुनिया में सबसे अच्छी है।
(3) 06-09 वर्ष = मेरी मां सब कुछ जानती है, वह सबसे होशियार है, मेरी मां से होशियार कोई नहीं है।
(4) 12-15 वर्ष = मैं जब छोटा था, मां ज़्यादा प्यार करती थी, अच्छा व्यवहार रखती थी, पर अब नहीं।
(5) 16-17 वर्ष = वर्तमान के साथ मेरी मां नहीं चलती, सच पूछो तो उनको कुछ पता ही नहीं है, कोई ज्ञान ही नहीं है।

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पर्यावरण – जीवन की नींव, सिर्फ़ एक दिन की बुनियाद नहीं”

“पेड़ सिर्फ़ लकड़ी नहीं होते, ये वो साया हैं जो हमारी साँसों को सहारा देते हैं। मिट्टी सिर्फ़ ज़मीन नहीं होती, वो हमारी जड़ों की पहचान है।”
क्या 5 जून पर्यावरण दिवस मनाकर पर्यावरण बच जाएगा?
हर साल 5 जून आता है — हम पेड़ लगाते हैं, कुछ स्लोगन सुनते हैं और फिर अगले दिन वही ज़िन्दगी…प्लास्टिक की बोतल, AC की हवा, डिस्पोज़ेबल कप में चाय, ऑनलाइन ऑर्डर की पैकिंग में लिपटी दुनिया।
तो सवाल अब ये है, कभी लगा कि ये सब करते हुए हम ख़ुद ही उस धरती को जला रहे हैं, जो हमें जन्म देती है?
“धरती को बचाना हाँ बड़ा काम है, बस अपने छोटे-छोटे लालचों से जीतना है।” पर्यावरण क्या है? सिर्फ़ पेड़ नहीं… पूरा जीवन है |
जब हम पर्यावरण कहते हैं, तो उसका मतलब सिर्फ़ हरे-भरे जंगल नहीं होते।
वो हवा जिसमें माँ ने पहली बार गहरी साँस ली थी। वो पानी जो किसी किसान की मेहनत से भरा खेत सींचता है। वो मिट्टी जिसमें बचपन में हमने नंगे पाँव दौड़ लगाई थी। और वो सूरज जिसकी किरणों से शरीर ही नहीं, मन भी तपता है।
“मिट्टी में जो अपनापन है, वो शॉपिंग मॉल की चमक में कहाँ?”
आपदाएं, बीमारियाँ और हमारा बिगड़ता रिश्ता प्रकृति से कोरोना सिर्फ़ एक वायरस नहीं था। वो प्रकृति की एक गूंगी चीख थी, जो जब निकली तो सारी दुनिया थर्रा गई।
जंगल उजाड़े गए, नदियाँ बांधी गईं, ज़मीन खोदी गई, और अब परिणाम सामने हैं: कभी गर्मी 50 डिग्री पार करती है, तो कभी हवा में ज़हर घुला होता है।
“प्रकृति बहुत शांत रहती है, मगर जब बोलती है, तो सब सुनते हैं।”
पर्यावरण और स्वास्थ्य – सीधा संबंध
मैं एक डॉक्टर हूँ। मैंने अपने क्लिनिक में वो माँएं देखी हैं, जिनके बच्चे रोज़ बीमार पड़ते हैं, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनका खाना, पानी, हवा सब कृत्रिम हो चुका है। मैंने वो बुज़ुर्ग देखे हैं जिनकी नींद सिर्फ़ इसलिए गायब है क्योंकि मोबाइल रेडिएशन से उनका दिमाग़ चैन नहीं ले पाता।
“दवा से नहीं, दुआ से पहले ज़रूरत है प्राकृतिक जीवन की।”

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हम नहीं देख पाए, वो अब भी गा रहे थे: गांव की बाल्कनी से उड़ती स्मृतियाँ

शहरों की भीड़ में रहते हुए हम जैसे संवेदना शून्य होते चले जाते हैं। वहां सुबह मोबाइल अलार्म से होती है, यहां मुर्गे की बांग से। वहां हवा एसी की होती है, यहां आम के पेड़ की। वहां आसमान धुंध से भरा होता है, यहां पक्षियों की उड़ान से।
– प्रियंका सौरभ

शहर की चमचमाती सड़कों, ऊंची इमारतों और बंद खिड़कियों के पीछे जब हम जीवन को व्यस्तताओं की कैद में जी रहे होते हैं, तब कहीं दूर गांवों की बाल्कनियों में जीवन अब भी खुले आकाश के नीचे साँस ले रहा होता है। वहां सुबहें अब भी चिड़ियों की चहचहाहट से शुरू होती हैं, दोपहरें कोयल की तान से सजी होती हैं, और रातें उल्लुओं की टेर में गूंजती हैं। यह लेख उन्हीं स्मृतियों और अनुभवों की यात्रा है — एक गांव की बाल्कनी में बैठकर महसूस की गई उस दुनिया की, जो कभी हमारी थी, लेकिन जिसे हमने शहर के शोर में कहीं खो दिया।

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हरियाणा के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का अंतिम संस्कार: जब पूरी क्लास फेल होती है, तो सिस्टम अपराधी होता है

हरियाणा के 18 सरकारी स्कूलों में 12वीं का रिजल्ट शून्य प्रतिशत रहा, जो राज्य प्रायोजित शैक्षिक विफलता का संकेत है। यह केवल छात्रों की असफलता नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है — जिसमें शिक्षक नहीं, संसाधन नहीं और जवाबदेही भी नहीं। सरकार को पहले से इन स्कूलों की हालत पता थी, फिर भी कोई सुधार नहीं किया गया। यह स्थिति शिक्षा के अधिकार के साथ धोखा है और गरीब छात्रों के सपनों की हत्या है। अब सवाल पूछना जरूरी है — वरना यह ढांचा पूरी पीढ़ी को अंधेरे में धकेल देगा।
– डॉ सत्यवान सौरभ
हरियाणा के सरकारी स्कूलों से एक शर्मनाक और विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है — 12वीं बोर्ड परीक्षा में राज्य के 18 स्कूलों का परिणाम शून्य प्रतिशत रहा। यानी पूरे स्कूल से एक भी छात्र पास नहीं हुआ। यह घटना महज कुछ छात्रों के फेल होने की बात नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की नंगेपन के साथ पोल खोलने वाली स्थिति है। यह सिर्फ रिजल्ट नहीं, एक पीढ़ी के सपनों की सामूहिक हत्या है।

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सीजफायर पर इतना घमासान क्यों ?

पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डो को निशाना बनाते हुए भारत द्वारा की गयी सैन्य कार्रवाई बन्द हो जाने के बाद पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। विपक्षी दल जहाँ सरकार पर हमलावर हैं वहीं सत्ता पक्ष के नेता ऑपरेशन सिन्दूर को सफल तथा सीजफायर को अस्थाई बता रहे हैं। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में बताया कि भारत ने पहले तीन दिनों में ही पाकिस्तान को इतना तबाह कर दिया जिसका उसे अन्दाजा भी नहीं था। भारत की आक्रामक कार्रवाई के बाद पाकिस्तान बचने के रास्ते खोजने लगा था। प्रधानमन्त्री ने यह भी बताया कि पाकिस्तान दुनियां भर में तनाव कम करने के लिए गुहार लगा रहा था और बुरी तरह पिटने के बाद पाकिस्तानी सेना ने 10 मई की दोपहर हमारे डीजीएमओ को सम्पर्क किया। तब तक हम आतंकवाद के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर तबाह कर चुके थे।

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