Saturday, September 19, 2026
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लेख/विचार

2075 के भारत के लिए रेलवे का निर्माण

माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 8 सितंबर को पूर्ण हो चुके पश्चिमी समर्पित माल गलियारे—वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर—को राष्ट्र को समर्पित किया जाना भारतीय रेल के बदलते स्वरूप की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने रेलवे के बुनियादी ढाँचे पर विशेष बल दिया है—विद्युतीकरण, नई रेल लाइनें, दोहरी और बहुल लाइनें, स्टेशनों का पुनर्विकास, आधुनिक ट्रेनें, बेहतर सुरक्षा एवं सिग्नल प्रणाली और देश के सर्वाधिक व्यस्त रेलमार्गों पर अतिरिक्त क्षमता का निर्माण इसी प्रयास का हिस्सा हैं।

वडोदरा में प्रधानमंत्री ने इस व्यापक सोच को कुछ शब्दों में बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया—“हम लोगों और सामान को अधिक तेजी से पहुँचाने, नए अवसर पैदा करने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए भारत के बुनियादी ढाँचे को मजबूत कर रहे हैं।”

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AI द्वारा खोज रहे भूत, भविष्य और आज के वर्तमान के लोग

आज 80 के दशक को खोज रहा युवा, Gen Z

अतीत में लौटना चाह रहा है, क्योंकि वह भीड़ से दूर आत्मिक प्रेम, शांति और मानवीय संवेदनाओं को महसूस करना चाहता है। कई लोग, जो 80 के दशक में पैदा हुए, वे भी अपने आप को उसी दशक में लौटा रहे हैं। हैरत की बात है कि लोग वर्तमान में नहीं, बल्कि अतीत में खुद को खोज रहे हैं। यह बात आज सिर्फ भविष्य में भूतकाल को खोजने तक ही सीमित नहीं है। जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी विकसित हो रही है, वैसे-वैसे दिमागी विस्तार के साथ बहुत कुछ संभव है। आज हो न हो, कल बहुत कुछ होगा। जैसे फेसबुक का ही फीचर था, आपके फोटो को कई सारे कैप्शन में परिवर्तित करने का। वह डेवलप होकर आज AI बन चुका है। आज AI आपको बहुत सारे फीचर दे रहा है।

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मिट्टी बचेगी, तभी खेती बचेगी

भारतीय कृषि अब एक नए युग की ओर अग्रसर है, जहाँ विकास का आकलन करने के लिए केवल वृद्धि ही एकमात्र मापदंड नहीं रह गया है। मिट्टी की घटती उर्वरता, भूजल की कमी, जैव विविधता का क्षय, जलवायु परिवर्तनशीलता और बढ़ती खेती लागत के कारण किसान और कृषि क्षेत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इस संदर्भ में, पुनर्योजी कृषि एक आशाजनक मार्ग है। यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो न केवल वर्तमान प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेगा, बल्कि वास्तव में मिट्टी के स्वास्थ्य, जैव विविधता, जल प्रणालियों और पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों को बेहतर बनाकर कृषि उत्पादकता को बनाए रखेगा।

मुख्य बात पुनर्योजी कृषि पर ध्यान केंद्रित करना और कृषि के पारिस्थितिक स्तंभों को पुनर्स्थापित करना है। गहन खेती, रासायनिक इनपुट पर अत्यधिक निर्भरता और एक ही फसल की खेती के कारण पिछले कई दशकों से कुछ क्षेत्रों में पोषक तत्वों का असंतुलन और मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो गई है।

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अपने ही बुने जाल में फंसे मुख्य राजनीतिक दल

अपनी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयास में राजनीति कब किस कुचक्र में फंस जाए तथा अपनी ही चालों में भटककर आम आदमी के लिए संकट खड़ा कर दे, कहा नहीं जा सकता। भारत की जाति आधारित राजनीति राष्ट्र की एकता व अखंडता को दांव पर लगाकर कब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए जन भावनाओं को आहत करने लगे, इसका भी पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।

भारत की राजनीति प्रारंभ से ही सवर्ण विरोध पर आधारित रही है। देश का सवर्ण वोट बैंक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का बिना शर्त वाला वोट बैंक रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस या भाजपा ने कभी सवर्ण मतदाताओं की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया। विभिन्न राज्यों में केवल चंद जातियों को अपना वोट बैंक मानने वाले राजनीतिक दलों ने अपनी विशेष जाति के अतिरिक्त सामान्य वर्ग में आने वाली जातियों को अपना वोट बैंक नहीं समझा। यही कारण रहा कि गैर भाजपा व गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता पार्टी तथा अन्य दलों में ब्राह्मण, राजपूतों, वैश्यों, कायस्थों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया गया। सार्वजनिक मंचों पर आज भी इन दलों का सवर्ण विरोधी चरित्र उजागर है।

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पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है!

बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जाए।

इसमें पहली नजर में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिलासवाल यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।

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जिसकी तस्वीर कभी छपी नहीं, वही आंदोलन की पहली आवाज़ था

इतिहास के गुमनाम सिपाही : आंदोलन इतिहास बनाते हैं, पत्रकार उसकी पहली आवाज़ दर्ज करते हैं!
आंदोलन खत्म हो गया, नेता याद रह गए—पत्रकार फिर अगले संघर्ष में निकल पड़े!


इतिहास की एक अजीब आदत है। वह हमेशा विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन विजय की नींव रखने वालों को अक्सर भूल जाता है। वह मंच पर खड़े नेताओं की तस्वीरें छापता है, नारों को याद रखता है, भाषणों को उद्धृत करता है, समझौतों की तारीखें लिखता है और इस्तीफों को लोकतंत्र की जीत घोषित कर देता है। लेकिन इतिहास की किताबों में शायद ही कभी उस आदमी का नाम मिलता है जिसने सबसे पहले अपनी जेब से कलम निकाली, मोबाइल निकाला, कैमरा चालू किया और देश को बताया—”यहाँ कुछ ऐसा हो रहा है जिसे पूरे देश को देखना चाहिए।”

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भारत में दण्ड नीति की वास्तविकता और पेपर लीक का न्यायसंगत समाधान

आजादी के बाद कई बार ऐसा समय आया जब किसी जघन्य अपराध ने पूरे देश को झकझोरा, लोग सड़कों पर उतरे, आन्दोलन हुए तथा अपराधियों के लिए कठोरतम दण्ड की मांग ने जोर पकड़ा। सरकारों ने भी तत्परता दिखाते हुए नये तथा अधिक कड़े कानून बनाकर अथवा पुराने कानून में अमूल-चूल परिवर्तन करके आम जन को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया। लेकिन सजा की कठोरता तथा त्वरित एवं निश्चित न्याय के बीच की खाई सदैव न्याय में अन्याय का दर्शन करवाती रही। अपराध-विज्ञान और न्यायिक इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि कानून सख्त बना देना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि असली प्रश्न दंण्ड की कठोरता का नहीं बल्कि दण्ड मिलने कि निश्चितता और प्रक्रिया की गति का है। भारत में ऐसे कानूनों की लम्बी श्रृखला है, जिनमें आजीवन कारावास, कठोर कारावास या फिर  मृत्युदण्ड तक के प्रावधान शामिल हैं। हाल ही में संसद द्वारा पारित सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026 में भारी-भरकम जुर्माना और 10 साल तक की सजा के प्रावधान तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाना आदि शामिल है।

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एक घंटा

न जाने वो कैसी औरतें होती हैं जो अपना ध्यान नहीं रखतीं। ना अपने चेहरे का और ना ही अपने शरीर का। ढीली स्किन और बेडौल शरीर ऐसा लगता है जैसे कि बस शादी करने के लिए ही उनको सुंदर दिखना था। शादी हो जाने के बाद जैसे उनका मकसद पूरा हो गया और फिर अपनी ओर ध्यान मत दो। फिर भी कपड़े फैशनेबल चाहिए रहते हैं ताकि अच्छी दिख सकें। फिर भले ही वो कपड़े उन पर अच्छे लगे या ना लगे। रिया अपनी टेबल पर बैठी हुई यह बात अपनी कलीग से कह रही थी जिसे कुछ ही दिन हुए थे स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करते हुए। पास में ही बैठी  सलोनी मुस्कुराने लगी उसने पूछा, “तुम्हारी शादी हो गई है क्या?”
रिया:- “नहीं, अभी नहीं हुई!”
सलोनी:- “अच्छा! तभी ऐसा बोल रही हो। जब शादी हो जाएगी और तब उसके बाद के अनुभव शेयर करना मेरे साथ और फिर जो बात तुमने अभी कही है वो फिर से कहना।”

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कथावाचकों के लिए भी एक मानक बने

इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है। परन्तु बदले परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है। प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है। श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के एक भाग अथवा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। आचार्य का पद उपाध्याय से दस गुना अधिक बड़ा बताया गया है। क्योंकि आचार्य की सेवाएँ निःस्वार्थ होती थीं। एक समय इन्हीं गुरुजनों के माध्यम से गुरुकुल के विद्यार्थी वेद, वेदान्त, वेदांग तथा स्मृतियों आदि का ज्ञान प्राप्त करते थे। कालान्तर में वेद व्यास ने जब पुराणों की रचना की तब ये पुराण भी गुरुकुलों के पाठ्यक्रमों में क्रमशः शामिल किये गये। जिनमें वर्णित महापुरुषों की कथाएं विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन तथा मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। इन पुराणों को गुरुकुलों तक पहुँचाने के मुख्य सूत्रधार व्यास जी के शिष्य लोमहर्षण सूत जी थे। सूत जी ऋषियों को पुराण सुनाते और ऋषिगण अपने शिष्यों को।

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महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी

2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब राजनीतिक दल अभी से महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाएँ। केवल आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं; दलों को आंतरिक कोटा, वित्तीय सहयोग, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और निर्णयकारी भूमिका में महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी। अगर यह मौका चूक गया तो आरक्षण भी दिखावा बन जाएगा। समावेशी और सशक्त लोकतंत्र के लिए अब निर्णायक और नीतिगत पहल ज़रूरी है। -प्रियंका सौरभ
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, यानी संविधान का 106वां संशोधन, भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का ऐतिहासिक प्रयास है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, लेकिन इसकी सफलता महज संविधान में दर्ज होने से नहीं होगी—बल्कि इस पर अमल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होगी। वर्ष 2029 के आम चुनावों में यदि यह आरक्षण प्रभावी होता है, तो यह न केवल भारत के लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़ होगा, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व की दिशा भी तय करेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को अभी से व्यापक और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे।

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