रोजगार हमारी ज़रूरतों के लिए आवश्यक है, लेकिन कला और मनोरंजन मानसिक शांति और प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं। घिब्ली स्टाइल इमेजरी और एआई टूल्स सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं, जिससे मौलिकता पर सवाल उठ रहे हैं। पहले जहां कलाकारों को महीनों मेहनत करनी पड़ती थी, अब एआई कुछ सेकंड में वैसा ही आर्ट तैयार कर देता है, जिससे असली कलाकारों को चुनौती मिल रही है।
अगर हम हकीकत की दुनिया में देखें, तो रोज़गार ज़रूरी है। बिना नौकरी या व्यवसाय के, सिर्फ घिब्ली की खूबसूरत दुनिया में खोकर पेट नहीं भरा जा सकता। लेकिन मानसिक शांति और प्रेरणा के लिए कला भी आवश्यक है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर घिब्ली स्टाइल की इमेज और वीडियो एक ट्रेंड बन चुके हैं। लोग पिनटेरेस्ट, इंस्टाग्राम और टिकटोक पर इसे देखकर टाइम पास कर रहे हैं, कुछ इसे खुद ट्राई कर रहे हैं, और एआई टूल्स की मदद से घिब्ली-स्टाइल की इमेज बना रहे हैं।
लेख/विचार
दोहरे मापदंड! कर्मचारी परेशान, सांसद मालामाल
महंगाई में पिसते कर्मचारी, राहत में नहाते सांसद: 2% बनाम 24% का गणित!
सरकार ने जहां सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) में मात्र 2% की वृद्धि की, वहीं सांसदों के भत्तों और वेतन में 24% की बढ़ोतरी कर दी। यह विरोधाभास कर्मचारियों और जनता में नाराजगी पैदा कर रहा है। कर्मचारियों के लिए 2% DA वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरा समान। सांसदों को पहले से ही कई सुविधाएँ मिलती हैं, फिर भी वेतन में बड़ी बढ़ोतरी। सरकार जब आम जनता की राहत की बात आती है, तो “बजट की कमी” बताती है, लेकिन सांसदों के लिए खजाना खुला रहता है।
देश में महंगाई की मार लगातार बढ़ रही है। सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, पेट्रोल-डीजल की कीमतें जेब हल्की कर रही हैं और आम आदमी सोच रहा है कि “अगली सैलरी आएगी तो कौन-कौन से खर्चे टालने पड़ेंगे?” लेकिन इस बीच सरकार ने दो अलग-अलग वर्गों के लिए दो अलग-अलग राहत पैकेज जारी कर दिए— सरकारी कर्मचारियों के लिए महज 2% महंगाई भत्ता (DA) बढ़ाया गया। सांसदों के भत्तों और वेतन में 24% की बढ़ोतरी की गई।
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण के बालकाण्ड में यह चौपाई लिखी थी।
सुभ अरु असुर सलिल सब बहई।
सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।।
समरथ कहुँ नहीं दोष गोसाईं।
रवि पावक सुरसरि को नाईं।।
अर्थात, गंगा जी का जल निर्मल है, इसमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कह सकता। सूर्य, अग्नि और गंगा जी की भांति समर्थ को कोई दोष नहीं लगता।
गोस्वामी तुलसीदास ने भले ही यह चौपाई 500 वर्ष पूर्व लिखी हो, किन्तु आज भी शब्दशरू लागू होती है। आज भी समाज में ऐसे समर्थ और सक्षम हैं, जिनकी मनमानी पर भी समाज अपनी आंख मूंद लेना बेहतर समझता है। दबंग बदमाशों से लेकर नेता तक इसी श्रेणी में आते हैं। एक श्रेणी और भी है, कानून प्रदत्त शक्तियों का दुरूपयोग करने वाली श्रेणी। अदालतें स्वयं समय – समय पर इस बारे में चिंता जता चुकी हैं। तमाम उदाहरण आ चुके हैं कि किस तरह से चुनिंदा लोग कानून का दुरूपयोग करते हैं।
ऐसे ही कानून प्रदत्त शक्तियों का दुरूपयोग करने का उदाहरण है महिलाओं द्वारा कमाने में सक्षम एवं समर्थ होने के बावजूद अलग होने पर पति से गुजारा भत्ता मांगना। यदि कानून की नज़र में महिला पुरुष में कोई भेदभाव नहीं है तो गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी पति की ही क्यों होनी चाहिए? क्या अदालत ने कभी ऐसा फैसला सुनाया है, जिसमें सक्षम पत्नी को आदेश दिया गया हो कि वह अपने पति को गुजारा भत्ता दे? इसके विपरीत, पति को गुजारा भत्ता देने के लिए मजदूरी करने की सलाह भी अदालतें दे चुकी हैं। यह कहाँ का न्याय हुआ?
ऐसे ही एक केस की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि कमाने की क्षमता रखने वाली योग्य महिलाओं को अपने पतियों से अंतरिम गुजारा भत्ता की मांग नहीं करनी चाहिए।
मामला यह था कि एक महिला ने अलग होने के बाद अपने पति से अंतरिम भरण पोषण की मांग की थी, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। उसने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
सुनहरा लम्हा : धरती पर लौटीं सुनीता विलियम्स
सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर की धरती पर सुरक्षित वापसी एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है। वे जून 2024 में बोइंग के “स्टारलाइनर” मिशन के तहत अंतरिक्ष गए थे, लेकिन तकनीकी खामियों के चलते उनकी वापसी में नौ महीने की देरी हुई। इस कारण वे अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर लंबे समय तक रुके रहे। यह मिशन न केवल तकनीकी दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण था, बल्कि अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के प्रभावों को समझने में भी सहायक होगा। उनकी सुरक्षित वापसी से भविष्य में अंतरिक्ष अभियानों के लिए नई संभावनाएँ खुलेंगी। इससे नासा और बोइंग को स्टारलाइनर की खामियों को सुधारने का मौका मिलेगा। उनके अनुभव और उपलब्धियाँ न केवल अंतरिक्ष क्षेत्र बल्कि विज्ञान और तकनीक में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सीमाएँ केवल मानसिकता में होती हैं और यदि कोई लक्ष्य निर्धारित किया जाए, तो उसे प्राप्त किया जा सकता है।
रुपये (₹) के चिह्न को लेकर विवाद: भाषा का सम्मान या राजनीति का हथकंडा?
केवल वाद विवाद से हल नहीं निकलेगा। संविधान में ये कानून होना चाहिए कि कोई भी राज्य या राज्य सरकार राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग की जाने वाली या मानी जाने वाली वस्तुओं पर अपने से निजी परिवर्तन नहीं कर सकती। ऐसा किया जाना देश द्रोह माना जाए और ज़िम्मेदार व्यक्ति को पदच्युत किया जाए। रुपये (₹) के चिह्न को लेकर विवाद सिर्फ़ भाषा और सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक खेल भी दिखाई देता है। क्षेत्रीय दल, विशेष रूप से द्रविड़ मुनेत्र कषगम, इस मुद्दे को उठाकर न केवल तमिल अस्मिता को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि केंद्र सरकार की भाषा नीति और हिन्दी वर्चस्व के खिलाफ अपने पारंपरिक रुख को भी आगे बढ़ा रहे हैं।
ठगा हुआ मानव
लेकर अभिलाषाएं अनंत यहां,
कर लिया दुर्लभ जीवन यहां।
मन मूक मुद्रा लेकर जहां,
मन ठगा हुआ मानव है यहां।
आशा अभिलाषा में बंधा हुआ,
जाने वह विस्मित कहां हुआ।
पच्चास साल बाद होने वाली परिसीमन को लेकर चिंताएँ
राजकोषीय संघवाद और संस्थागत ढांचे को मज़बूत करके, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि राजनीतिक निष्पक्षता जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के साथ मिलीजुली हो, जिससे एक सुसंगत और एकजुट भारत को बढ़ावा मिले। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से नागरिकों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलेगा, जिससे निर्वाचन क्षेत्रों का आकार छोटा होगा और शासन में सुधार होगा। संसदीय सीटों को 543 से बढ़ाकर 800 से अधिक करने से संसद सदस्य मतदाताओं की ज़रूरतों को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सकेंगे। निश्चित सीट आवंटन के कारण उत्तरी राज्यों को कम प्रतिनिधित्व का सामना करना पड़ा है और परिसीमन इन ऐतिहासिक असंतुलनों को सुधारने का एक मौका प्रदान करता है।
Read More »विलंब के कारण न्याय से वंचित: न्यायालयों में अनसुलझे मामलों की बढ़ती हुई संख्या
भारतीय न्यायालयों में अनसुलझे मामलों का मुद्दा एक बड़ी चुनौती है, जिसने न्याय प्रणाली को गहराई से प्रभावित किया है। लंबित मामलों की बढ़ती संख्या न्याय प्रदान करने के लिए डिज़ाइन की गई वर्तमान प्रणाली की प्रभावशीलता और दक्षता पर गंभीर सवाल उठाती है। ऐसी देरी का कानूनी ढांचे पर हानिकारक और व्यापक प्रभाव पड़ता है। लंबी कानूनी प्रक्रियाएँ न्याय की पहुँच में बाधा डाल सकती हैं, जिससे व्यक्तियों और व्यवसायों दोनों को नुक़सान होता है। जैसे-जैसे मामले लंबित होते हैं, कानूनी प्रणाली में जनता का भरोसा कम होता जाता है, जिससे इसकी विश्वसनीयता को लेकर निराशा और संदेह पैदा होता है। नतीजतन, लोग विवादों को निपटाने के लिए वैकल्पिक साधनों की ओर रुख कर सकते हैं। यह लंबित मामला देरी का एक चक्र बनाता है, जिससे अदालतों के लिए नए मामलों को निपटाना मुश्किल हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः अनसुलझे मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।
Read More »वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट और उनके संरक्षण की आवश्यकता
वन्य जीव हमारी धरती के अभिन्न अंग हैं लेकिन अपने निहित स्वार्थों तथा विकास के नाम पर मनुष्य ने उनके प्राकृतिक आवासों को बेदर्दी से उजाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है और वनस्पतियों का भी सफाया किया है। धरती पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त उन सभी चीजों का आपसी संतुलन बनाए रखने की जरूरत होती है, जो उसे प्राकृतिक रूप से मिलती हैं। इसी को पारिस्थितिकी तंत्र या इकोसिस्टम भी कहा जाता है। धरती पर अब वन्य जीवों और दुर्लभ वनस्पतियों की कई प्रजातियों का जीवनचक्र संकट में है। वन्य जीवों की असंख्य प्रजातियां या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं।
बेटी नहीं बचाओगे, तो बहू कहाँ से लाओगे?
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम ने बेटे को प्राथमिकता देने के मुद्दे पर सफलतापूर्वक जागरूकता बढ़ाई है, लेकिन अपर्याप्त कार्यान्वयन और निगरानी के कारण, यह अपने वर्तमान स्वरूप में अपने मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहा है। 22 जनवरी, 2015 को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य लिंग-भेदभाव को रोकना, बालिकाओं को जीवित रखना और उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाना था। भले ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम ने लिंग भेदभाव के बारे में बहुत जरूरी जागरूकता पैदा की है, लेकिन अपर्याप्त कार्यान्वयन और निगरानी के कारण यह अपने मुख्य लक्ष्य से भटकता नज़र आता है जबकि यह अपने दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। भारत में युवा लड़कियों को अपने जीवन भर कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है और बेटे को प्राथमिकता देने और प्रतिगामी सत्ता संरचनाओं जैसे पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों के परिणामस्वरूप आर्थिक अवसरों को खोना पड़ता है जो उनके अस्तित्व और शिक्षा में बाधा डालते हैं।बेटे को प्राथमिकता देने वाले सामाजिक मानदंडों में यह कथन शामिल है कि “बेटी की परवरिश पड़ोसी के बगीचे में पानी देने जैसा है।” दृष्टिकोण बदलने के लिए सिर्फ़ वित्तीय प्रोत्साहन से ज़्यादा की ज़रूरत है।
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Jansaamna