शहरों की भीड़ में रहते हुए हम जैसे संवेदना शून्य होते चले जाते हैं। वहां सुबह मोबाइल अलार्म से होती है, यहां मुर्गे की बांग से। वहां हवा एसी की होती है, यहां आम के पेड़ की। वहां आसमान धुंध से भरा होता है, यहां पक्षियों की उड़ान से।
– प्रियंका सौरभ
शहर की चमचमाती सड़कों, ऊंची इमारतों और बंद खिड़कियों के पीछे जब हम जीवन को व्यस्तताओं की कैद में जी रहे होते हैं, तब कहीं दूर गांवों की बाल्कनियों में जीवन अब भी खुले आकाश के नीचे साँस ले रहा होता है। वहां सुबहें अब भी चिड़ियों की चहचहाहट से शुरू होती हैं, दोपहरें कोयल की तान से सजी होती हैं, और रातें उल्लुओं की टेर में गूंजती हैं। यह लेख उन्हीं स्मृतियों और अनुभवों की यात्रा है — एक गांव की बाल्कनी में बैठकर महसूस की गई उस दुनिया की, जो कभी हमारी थी, लेकिन जिसे हमने शहर के शोर में कहीं खो दिया।
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Jansaamna
शहरों की भीड़ में रहते हुए हम जैसे संवेदना शून्य होते चले जाते हैं। वहां सुबह मोबाइल अलार्म से होती है, यहां मुर्गे की बांग से। वहां हवा एसी की होती है, यहां आम के पेड़ की। वहां आसमान धुंध से भरा होता है, यहां पक्षियों की उड़ान से।
हरियाणा के 18 सरकारी स्कूलों में 12वीं का रिजल्ट शून्य प्रतिशत रहा, जो राज्य प्रायोजित शैक्षिक विफलता का संकेत है। यह केवल छात्रों की असफलता नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है — जिसमें शिक्षक नहीं, संसाधन नहीं और जवाबदेही भी नहीं। सरकार को पहले से इन स्कूलों की हालत पता थी, फिर भी कोई सुधार नहीं किया गया। यह स्थिति शिक्षा के अधिकार के साथ धोखा है और गरीब छात्रों के सपनों की हत्या है। अब सवाल पूछना जरूरी है — वरना यह ढांचा पूरी पीढ़ी को अंधेरे में धकेल देगा।
एक कहावत है कि जोड़ियां आसमान से बन कर आती हैं, लेकिन यह कहावत केवल शादी-विवाह तक ही सीमित है क्योंकि बात जब राजनीति की हो तो दो लोगों के बीच में साझा रणनीति और सूझबूझ अहम हो जाती है। भारतीय राजनीति का इतिहास उन जोड़ियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने साझा विजन, नेतृत्व और रणनीतिक कौशल से देश की दिशा और दशा को आकार दिया। ये जोड़ियां न केवल अपनी पार्टी के लिए बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं। पंडित नेहरू-महात्मा गांधी की वैचारिक साझेदारी से लेकर नरेंद्र मोदी-अमित शाह की आधुनिक रणनीति तक, इन जोड़ियों ने भारतीय राजनीति को एक स्वर्णिम राह पर आगे बढ़ाया।