Friday, March 6, 2026
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लेख/विचार

जगद्गुरु शकंराचार्य, महाकुम्भ मेला और नागा सन्यासी

प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ-2025 के सन्दर्भ में कहा जा रहा है कि यह अवसर 144 वर्ष बाद आया है और आगे 144 वर्ष बाद ही आयेगा। जिसके कारण देश विदेश से करोड़ों श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाने पहुँच रहे हैं। कुम्भ मेला कब प्रारम्भ हुआ, इस बारे में कोई सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। परन्तु अधिकांश विद्वान इसकी शुरुआत का श्रेय आदि शंकराचार्य को देते हैं। आदि शंकराचार्य का जन्म ईसा पूर्व सन 507 (युधिष्ठिराब्द 2631) में बैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को केरल राज्य (तब मालाबार प्रान्त) में एर्णाकुलम जनपद के कालड़ी ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान इनका जन्म आठवीं शताब्दी में होना बताते हैं। इनके पिता का नाम पण्डित शिवगुरु भट्ट तथा माता का नाम आर्याम्बा था। पण्डित शिवगुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। आदि शंकराचार्य को महादेव शिव का अवतार माना जाता है, जो उनकी विलक्षण प्रतिभा से सिद्ध भी होता है। मात्र आठ वर्ष की आयु में श्री गोविन्द नाथ भगवत्पाद से सन्यास की दीक्षा लेकर सन्यासी हो जाना। उसके बाद वाराणसी होते हुए बदरिकाश्रम तक पैदल यात्रा करना। सोलह वर्ष की आयु में ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना। सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करनाद्य दरभंगा जाकर तत्कालीन ख्यातिलब्ध विद्वान मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित करने के बाद सन्यास की दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाना। भारतवर्ष में व्याप्त तत्कालीन कुरीतियों एवं धार्मिक आडम्बरों को समाप्त कर समभावदर्शी वैदिक धर्म की पुनः स्थापना करना उनके शिवत्व को दर्शाता है।
महर्षि पाणिनी, महर्षि पातंजलि, महाराज मनु, महर्षि भृगु, दैत्यगुरु शुक्राचार्य, देवगुरु वृहस्पति, महर्षि प्रचेता, महर्षि यास्क, महर्षि क्रतु, महर्षि पुलह, महर्षि पुलस्त, महर्षि अत्रि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि जाबालि, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, महर्षि यमदग्नि, महर्षि दत्तात्रेय, महर्षि अगस्त, महर्षि मार्कण्डेय, महर्षि भरद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र, महर्षि गौतम, महर्षि पाराशर, महर्षि मैत्रेय, महर्षि गर्ग, महर्षि सान्दीपनि, महर्षि शाण्डिल्य, महर्षि कात्यायन, महर्षि सांकृत, महर्षि उपमन्यु, वेद व्यास, रोमहर्षण सूत तथा महर्षि शौनक आदि अनगिनत मनीषियों द्वारा पल्लवित पुष्पित भारतीय संस्कृति जिसे कालान्तर में वैदिक धर्म, सनातन धर्म और अब हिन्दू धर्म के नाम से पहचान प्राप्त है, जो व्यक्ति को जन्म से नहीं अपितु कर्म से मनुष्य बनाने के लिए जानी जाती है। जिसके मूल में त्याग, तपस्या, सदाचार और अन्त में परम गति अर्थात मोक्ष की प्राप्ति निहित है। जीव की स्वाभाविक वृत्ति भोग का पग-पग पर निषेध ही इसका परम सिद्धान्त है। भारतीय भू-भाग पर जन्मी मानव सभ्यता हजारों नहीं अपितु लाखों वर्षों से इसी संस्कृति को धारण किये हुए है। परन्तु विभिन्न कालखण्डों में जीव की स्वाभाविक वृति भोग भी समाज पर हावी होती रही है। जिसे भोगवादी आसुरी या दानवी वृत्ति का नाम दिया गया। जब-जब यह कुवृत्ति समाज पर हावी हुई तब-तब किसी न किसी विलक्षण प्रतिभा ने जन्म लेकर इसको समाप्त किया और वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की। भारतीय मनीषियों ने ऐसी सभी प्रतिभाओं को ईश्वर के अवतार रूप में प्रतिष्ठा देकर सम्मानित किया है। आदि शंकराचार्य भी उन्हीं प्रतिभाओं में से एक हैं।
ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति के सापेक्ष न केवल कई सम्प्रदाय अस्तित्व में आ चुके थेद्य अपितु विदेशी आक्रमणकारी भी यहाँ की सम्पदा लूटने के लिए आने लगे थे।

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प्रवासियों के लिए बंद होते अमेरिका के दरवाजे

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह पहले से ही तय माना जा रहा था कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रपति के रूप में वापसी से न सिर्फ अमेरिका के राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आयेगा, बल्कि उनकी नीतियों का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ेगा, जिससे भारत भी अछूता नहीं रहने वाला है। सत्ता संभालने के साथ ही ट्रंप ने अपने देश में रह रहे अवैध प्रवासियों को निकालना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में अवैध भारतीय अप्रवासियों को लेकर अमेरिकी सैन्य विमान भारत आया है। ट्रंप प्रशासन की ओर से पदभार संभालने के बाद देश के प्रवासियों पर यह पहली कार्रवाई है। अमेरिका में अवैध रुप से प्रवेश करने वाले 104 लोग भारत पहुंचे है।
अमेरिका से निर्वासित लोगों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग शामिल हैं, जिनमें से सबसे कम उम्र का बच्चा केवल 4 वर्ष का है जो गुजरात से है। इनमें पंजाब के 30, हरियाणा के 33, चंडीगढ़ के 2, गुजरात के 33, उत्तर प्रदेश के 3 व महाराष्ट्र के 3 लोग शामिल हैं। इनमें 48 लोग ऐसे हैं, जिनकी उम्र 25 वर्ष से कम है। अमेरिका से अवैध प्रवासियों की वापसी से भारत की चिंताएं बढ़ना स्वभाविक है, क्योंकि वहां काफी संख्या में अवैध तरीके से भारतीय प्रवासी रह रहे हैं। हालांकि इसमें भारत के लिए कुछ करने को ज्यादा नहीं है, क्योंकि अवैध रूप से प्रवेश करने वालों का समर्थन नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत, भारतीय नागरिकों को वैध तरीके से वापस लेने को तैयार है।
इस मामले को लेकर संसद में भी हंगामा हुआ।

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भाषा और पठन-पाठन की बेहतर समझ की ओर बढ़ता ‘निपुण भारत’

हालिया वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट 2024 में कहा गया है कि ग्रेड III के विद्यार्थियों ने अपने पढ़ने के कौशल (24% से 34%) और घटाव के कौशल (29% से 41%) में सुधार किया है। श्रगतिका घोष जैसे युवा पाठक इस बात के उदाहरण हैं कि कैसे जीवंत और प्रासंगिक कार्यपुस्तिकाओं को अपनाने से ओडिशा में साक्षरता परिणामों में सुधार हुआ है। प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रवि शर्मा द्वारा गीतों के माध्यम से गणित पढ़ाया जाता है। जैसे-जैसे वे संख्याएँ सीखते हैं, वे नारा लगाते हैं, “एक-दो थैला लो, तीन-चार चलो बाज़ार।” दूसरी कक्षा की छात्रा श्रगतिका घोष अब आत्मविश्वास के साथ ओडिया पुस्तकें पढ़ सकती है। रंगीन और प्रासंगिक कार्यपुस्तिकाएँ कोर साक्षरता को बढ़ाती हैं।
शिक्षा मंत्रालय ने निपुण भारत कार्यक्रम 2021 की शुरुआत की, जो समझ और अंकगणित के साथ पढ़ने में दक्षता के लिए एक राष्ट्रीय पहल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश का हर बच्चा 2026-2027 तक ग्रेड 3 के अंत तक बुनियादी साक्षरता और अंकगणित समझ हासिल कर ले।

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चिंताजनक है बच्चों के साथ समय न बिताना

बात करना बहुत ज़रूरी है, साथ ही ज़रूरत पड़ने पर दयालु होना भी ज़रूरी है। जितना हो सके अपने बच्चे को अपने काम में शामिल करने की कोशिश करें। उन पर ध्यान दें और उनकी पसंदीदा गतिविधियों में शामिल हों; इससे आप दोनों के बीच नज़दीकियाँ बढ़ेंगी। बच्चे स्वाभाविक रूप से अपने माता-पिता का ध्यान और स्वीकृति चाहते हैं, इसलिए समझदार माता-पिता इसका इस्तेमाल अपने बच्चों को अलग-अलग तरीकों से सहयोग करने के लिए करते हैं। अनुशासन का मतलब है सिखाना और सीखना। अपने बच्चों को यह समझने में मदद करने के लिए कि उन्हें क्या जानना चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर उनके व्यवहार को सुधारने के लिए, आपको उनसे इस तरह बात करनी होगी कि वे आपका सम्मान करें और समझें।

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पूर्ण विद्युतीकरण की राह पर भारतीय रेल

पहिए के अविष्कार के साथ ही दुनिया कई गुना तेजी से आगे बढ़ने लगी। इस रफ्तार को नई दिशा सितंबर 1825 में तब मिली, जब दुनिया की पहली ट्रेन ने अपनी यात्रा शुरू की। इसी क्रम में 28 साल बाद 16 अप्रैल, 1853 को वह दिन भी आया जब भारत में पहली बार ट्रेन चलाई गई। इसके करीब 72 वर्षों बाद 3 फरवरी 1925 ने भारतीय रेल ने एक और अध्याय जोड़ते हुए पहली बार छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) से कुर्ला, मुंबई तक अपनी यात्रा बिजली से चलने वाली ट्रेन चलाकर नया कीर्तिमान रच दिया। अब साल 2025 भारत में रेल विद्युतीकरण के 100 साल पूरे के होने के साथ, भारत अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क के 100% विद्युतीकरण के कगार पर है जो भारतीय रेल की उपलब्धियों में एक मील का पत्थर है। यह उपलब्धि भारत में पहली रेल यात्रा के समान ही ऐतिहासिक है तथा भारतीय रेल के विद्युतीकरण में एक सदी की प्रगति का प्रतीक है।

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बजट 2025: मध्यम वर्ग के लिए बड़ी सौगात

केंद्रीय बजट 2025 ऐसे महत्त्वपूर्ण समय पर आ रहा है, जब भारत की आर्थिक वृद्धि चार वर्षों में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है। अमेरिकी टैरिफ के खतरों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों सहित वैश्विक अनिश्चितताएँ नई चुनौतियाँ पैदा कर रही हैं। जवाब में, बजट ने अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने की योजना की रूपरेखा तैयार की है, जिसमें कर छूट, बुनियादी ढांचे के विकास और विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों पर ज़ोर दिया गया है। उल्लेखनीय आयकर कटौती, छूट में वृद्धि और स्टार्टअप और छोटे व्यवसायों के लिए नए प्रोत्साहन शुरू करके, सरकार मध्यम वर्ग की आय बढ़ाने और लंबे समय में सतत विकास को बढ़ावा देने की उम्मीद करती है।

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मन चंगा तो कठौती में गंगा

‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ यह कहावत इसलिए कही गई कि यदि आपका मन और नीयत साफ है तो वह व्यक्ति गंगा के समान पवित्र है। कुंभ मेले में स्नान की मान्यता है कि गंगा, यमुना, और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने से पापों का नाश, मोक्ष प्राप्ति और आत्मा की शुद्धि होती है। यह मेला साधु-संतों, गुरुओं और श्रद्धालुओं के मिलन का केंद्र है, जहां ज्ञान, भक्ति और सेवा का आदान-प्रदान होता है लेकिन यह कुंभ स्नान जो 144 साल बाद आया है और जहाँ सबसे ज्यादा भीड़ नजर आ रही है उसे देखकर लगता है कि हर किसी को अपने पाप धोने है या फिर धरती पर पापियों की संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि कुंभ स्नान के द्वारा पाप धोये जा रहे हैं या फिर लोग नए पाप करने के लिए शक्ति संचय कर रहे हैं क्योंकि इस कुंभ मेले में ज्ञान और साधना का संगम दिखाई नहीं दे रहा है।

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प्रयागराज भगदड़: प्रशासनिक लापरवाही या भक्तों का उन्माद

एक पौराणिक शहर की सीमाओं पर विचार करना चाहिए, जिसे अपनी धार्मिक विरासत को बनाए रखते हुए आठ करोड़ लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया है। दस लोगों के लिए डिज़ाइन की गई जगह में सौ लोग कैसे रह सकते हैं? यह विचार करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। इसके अलावा, वीवीआईपी संस्कृति और सरकार के मुनाफे की खोज, जिसमें राजस्व के लिए हर उपलब्ध भूमि को पट्टे पर देना और बिचौलियों को शामिल करना शामिल है, के बीच का सम्बंध मामले को और जटिल बनाता है। यह धार्मिक भक्ति का मामला है, प्रतिस्पर्धा या उन्माद का नहीं।
प्रयागराज में हुई भगदड़ के बारे में सुनना दुर्भाग्यपूर्ण है, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों की जान चली गई। यह घटना निस्संदेह विभिन्न मीडिया प्लेटफार्मों पर व्यापक चर्चाओं को जन्म देगी। विपक्ष आलोचना करेगा, जबकि सरकार अपने कार्यों को सही ठहराने का प्रयास करेगी, लेकिन जो लोग मर चुके हैं उन्हें वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। प्रयागराज में संगम तट पर वर्ष 2013 के कुंभ मेले के दौरान 10 फरवरी दिन रविवार को मौनी अमावस्या का स्नान था। कुचलने और गिरने से 35 लोगों की मौत हो गई थी। जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे।

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कुंभ की साइंटिफिक व्याख्या

ग्रह के ऊर्जाओं की
मंगलमई बेला
तटिनी पर अमृत की
छवि कुंभ मेला।
हमारे पौराणिक शब्दों के अर्थ अधिकतर सांकेतिक होते हैं। कुंभ की बात करें तो यहाँ कुंभ का अर्थ घड़ा, सुराही या कलश की बजाय पानी से अधिक ताल्लुक रखता है।
वैसे कुंभ का शाब्दिक अर्थ होता है – घड़ा। सरल सी बात है कि जब बात घड़े की हो तो सबसे पहले ध्यान पानी का आता है। जी हाँ, यहाँ संकेत जल का हीं है।
आइए समझते हैं कि कुंभ को नदी के जल या नदी स्नान से क्यों जोड़ा गया है। सबसे पहले जानते हैं कुंभ से संबंधित पौराणिक कथा के बारे में।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी वेश धरकर अमृत कुंभ हासिल तो कर लिया परंतु अमृत से भरा हुआ कलश (कुंभ) लेकर जब वह जा रहे थे तो असुरों ने उस कलश को छीनने के लिए भगवान के साथ छीना झपटी की इन्हीं चेष्टाओं के बीच कलश में से अमृत की चार बूँदें छलक कर बाहर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह अमृत बूँदें हरिद्वार, उज्जैन, प्रयागराज तथा नासिक में गिरी जिससे ये स्थान तीर्थ बन गए।

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प्रतिस्पर्धा के बीच जीवित रहने का संघर्ष करते बच्चे

स्कूली पढ़ाई के बजाय कोचिंग के भयावह दौर में, छात्रों में आत्महत्या की प्रकृति और प्रवृत्ति का नए सिरे से अध्ययन करने की भी बहुत सख्त ज़रूरत है, क्योंकि देश की पूरी युवा बौद्धिक संपदा दांव पर लगी हुई है, जिसके दूरगामी गंभीर नतीजे पूरे राष्ट्र के माथे पर गहरा सिकन ला सकते हैं। युवाओं के कंधे पर स्थापित विकासशील प्रगति का पूरा ढांचा ही भरभरा कर गिर सकता है। छात्रों को इसे चुनौती के रूप में लेते हुए पूरी क्षमता के साथ इसका सामना करना चाहिए। परीक्षा जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं है। परीक्षा परिणामों को जीवन का अंतिम आधार न मानकर अपनी सफलता की राह स्वयं बनानी होती है। बिना श्रम के जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिलती। अभिभावकों को यह समझना है कि उन्हें अपने बच्चों के साथ कैसा घरेलू बर्ताव करना है।
वैसे तो इस दौर में पूरी युवा पीढ़ी ही भयावह मानसिक व्याधि से विचलित है, इनमें विशेषत: छात्र विचलन गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। हमारे देश में प्रति 100 में 15 से अधिक छात्र आत्महत्या से प्रभावित हो रहे हैं। वे अवसाद, चिंता और आत्मघात से पीड़ित पाए जा रहे हैं। कठिन प्रतिस्पर्धा और पढ़ाई-लिखाई में अनुशासन आदि को लेकर तनाव बढ़ रहा है, उससे न सिर्फ़ शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों, बल्कि पूरे समाज की चिंता बढ़ती गई है। पारिवारिक दबाव, शैक्षिक तनाव और पढ़ाई में अव्वल आने की महत्त्वाकांक्षा ने छात्रों के एक बड़े वर्ग को गहरे मानसिक अवसाद में डाल दिया है।

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