हालांकि महिलाओं के प्रति बर्बर हादसे कोई नई बात नहीं है, यह समस्या काफी पुरानी है। निर्भया कांड के बाद लोगों में जो एक डर बैठ गया था और उसके मद्देनजर जो कानून बनाए गए थे उसके द्वारा इस तरह के अपराधों में कोई रोकथाम हुई हो ऐसा नजर नहीं आता है बल्कि हाल के दिनों में उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। पाक्सो एक्ट (2012) भी कुछ समय पहले ही लागू हुआ है। पिछले कुछ समय से निर्भया जैसी ही बर्बरता फिर से देखने सुनने में आ रही है। अनेक वीडियो वायरल हो जाते हैं जिनमें वीभत्सता देखी नहीं जाती। दिल दहल जाता है। इस तरह के अपराधी कुछ वो लोग होते हैं जिनका बैकग्राउंड ही अपराधिक होता है और कुछ सफेदपोश अपराधी होते हैं। हालांकि आपराधिक बैकग्राउंड होना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन सत्ता पर काबिज लोग ही मनमर्जियां करते हैं। सवाल यह उठता है कि इतने कानून बनाए जाने के बाद भी उन पर अमल कितना हो पाता है? कितने अपराधी पकड़े जाते हैं? सजा कितनों को मिलती है? बड़ी बात यह है कि पावर, पैसा के जरिए जमानत मिल जाती है और अपराधी अपराधमुक्त हो जाते हैं।
अभी कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में निर्भया जैसी ही घटना घटी। सत्तारूढ़ दल के नेता मनोहर लाल धाकड़ का अश्लील वीडियो वायरल हुआ। भाजपा की नेत्री अपनी ही बेटी को हैवानियत का शिकार बना रही। यूपी में चार साल की बच्ची से हैवानियत की खबर सुनी। कुछ दिन पहले बलिया के सत्तारूढ़ दल के नेता बब्बन सिंह रघुवंशी एक पार्टी में अश्लील हरकतें करते पकड़े गए। कर्नाटक के ही प्रज्ज्वल रवन्ना जिनके खिलाफ़ सैंकड़ो महिलाओं के यौन शोषण का मामला है। कर्नाटक के नेता मुनिरत्ना अपनी ही पार्टी कार्यकर्ता के गैंगरेप में शामिल थे। कासगंज में एक नाबालिग के गैंग रेप में शामिल नेता अखिलेश प्रताप सिंह पकड़े गए थे।
इसी पार्टी के ही विधायक कर्नाटक और त्रिपुरा की विधानसभा में पोर्न देखते हुए पकड़े गए।
मैनपुरी भाजपा अध्यक्ष के बेटे के 130 अश्लील वीडियो सामने आये। दुष्कर्म की सजा काट रहे कुलदीप सेंगर हो या पाक्सो मे दोषी विधायक रामदुलार गोंड हो ये सभी सत्ता के दम पर अपनी ताकतों का दुरुपयोग करते हैं। ये खुद ही अपराधों में लिप्त हैं तो इनसे न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
राम रहीम को जमानत मिल जाती है….वो भी खुलेआम घूमते हैं। बाबा आसाराम को भी जमानत मिल जाती है? कानून की धज्जियां उड़ाते हैं ये लोग? इतने कानून बनाने के क्या फायदे जब सत्ता में बैठे लोग ही हैवान है। जब वो सुरक्षा देने के बजाय नोच रहे हैं स्त्री को, स्त्री जाति का अपमान कर रहे हैं तब ऐसे कानून का क्या महत्व रह जाता है? ऐसे में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि पीड़िता को न्याय मिलेगा? कुछ समय के लिए होहल्ला जरूर हो जाता है लेकिन फिर वही लीपापोती करके सब भूल जाते हैं। सवाल यही है कि जब मानसिकता नहीं बदल सकती स्त्रियों के प्रति तो इस तरह के अपराधों में कमी कैसे आएगी? खुले तौर पर आजकल युवाओं को जो अश्लीलता परोसी जा रही है और इस कुंठित मानसिकता का खामियाजा लड़कियां, महिलाएं भुगत रही है। पुरुष प्रधान समाज भी कारण है जोकि उसका सबसे बड़ा संरक्षक है। पुलिस और वकील उसके साथ है। महिलाओं के प्रति पुलिस का रवैया भी उदासीन ही रहता है। अभी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के लिए पीड़िता को भी जिम्मेदार ठहराते हुए अपराधी को जमानत दे दिया।
जब तक बनाये गये कानूनों पर सख्ती से अमल नहीं किया जायेगा तब तक इस मसले का हल नहीं निकलेगा। हम एक तरफ हर क्षेत्र में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देकर उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन वहीं उनके साथ लगातार अत्याचार की घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। महिलाओं को भी अपनी स्थिति सशक्त बनाने के लिए तैयार होना पड़ेगा। आत्मरक्षा के लिए ट्रेनिंग अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिये। इस मामले में महिलाओं को पहल करनी चाहिए। महिला आयोग के अनुसार महिलाओं के प्रति बढ़ते हुए अपराधों में सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश है और दूसरे नंबर पर राजधानी दिल्ली है तीसरे चौथे और पांचवें नंबर पर महाराष्ट्र, बिहार और मध्यप्रदेश है।
-प्रियंका वरमा माहेश्वरी, गुजरात
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