इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है। परन्तु बदले परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है। प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है। श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के एक भाग अथवा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। आचार्य का पद उपाध्याय से दस गुना अधिक बड़ा बताया गया है। क्योंकि आचार्य की सेवाएँ निःस्वार्थ होती थीं। एक समय इन्हीं गुरुजनों के माध्यम से गुरुकुल के विद्यार्थी वेद, वेदान्त, वेदांग तथा स्मृतियों आदि का ज्ञान प्राप्त करते थे। कालान्तर में वेद व्यास ने जब पुराणों की रचना की तब ये पुराण भी गुरुकुलों के पाठ्यक्रमों में क्रमशः शामिल किये गये। जिनमें वर्णित महापुरुषों की कथाएं विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन तथा मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। इन पुराणों को गुरुकुलों तक पहुँचाने के मुख्य सूत्रधार व्यास जी के शिष्य लोमहर्षण सूत जी थे। सूत जी ऋषियों को पुराण सुनाते और ऋषिगण अपने शिष्यों को।
यद्यपि माता-पिता और गुरुओं द्वारा बच्चों को पुरानी कथाएं सुनाने की परम्परा तो अति प्राचीन है। इसके अलावा लोकगीतों में भी प्रायः प्राचीन कथाएं ही सुनाई जाती रही हैं। लोक गायक प्राचीन कथाएं सुनाकर समाज के समृद्ध वर्ग का मनोरंजन करके इनाम इकराम पाते रहे हैं। डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से इनकी संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। वर्ना गाँव गली में महफिल जोड़कर लोकगीतों के माध्यम से पुरानी कथाएं सुनाना आम बात थी। इन लोकगीतों में संस्कार गीत, गाथा गीत, पर्व गीत, पेशा गीत तथा जातीय गीत शामिल हैं। गाथा गीत में मुख्यतः कथा या वृतान्त सुनाया जाता है। प्रचलित लोकगीतों में मुख्य रूप से सोहर, कहरवा, चनैनी, नौका, झक्कड़, बंजारा, कजरी, जरेवा, सदावजरा सारंगा, बिहू, ददरिया, बाउल, आल्हा और बिरहा आदि हैं। बिरहा में जहाँ श्रीकृष्ण और गोपियों का विरह वर्णन है वहीं आल्हा महोबा के वीर आल्हा ऊदल का गाथा गीत है। ऐसे ही लगभग सभी लोकगीत किसी न किसी प्राचीन कथानक की पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। लोकगीतों की प्रस्तुती के लिए किसी बड़े साधन की आवश्यकता नहीं होती है। प्राचीन समय में लोकगीत गाने वाले प्रायः निम्न जाति के लोग होते थे। जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोकगायन के माध्यम से पुरानी कहानियां सुनाकर जीवकोपार्जन करते रहे हैं। अतः आज यदि उन लोकगायकों की सन्ताने कथा सुनाने के अपने अधिकार का दावा करते हैं तो इसे सीधे तौर पर नकारा नहीं जा सकता।
वहीँ दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से जब गुरुकुलों का अस्तित्व संकट में पड़ने लगा। तब इनके आचार्यों ने समाज को प्राचीन संस्कृति से जोड़े रखने के उद्देश्य से लोगों को संकल्प दिलाकर अनुष्ठानपूर्वक साप्ताह, पक्ष एवं मासिक रूप से पुराणों की कथाएं सुनानी प्रारम्भ कर दीं। बदले में दक्षिणा स्वरुप श्रोताओं से मिला धन आचार्यगणों की उदरपूर्ति में सहायक बना। इससे जहाँ समाज को संस्कृति से जोड़ने की एक नवीन प्रक्रिया शुरू हुई। वहीं आचार्यों की जीविका भी ससम्मान चलने लगी। कथा सुनाने वाले को व्यास तथा वह जिस आसन पर बैठकर कथा सुनाते उसे व्यास-पीठ की संज्ञा दी गयी। जिन कथाओं को आचार्यगण व्यास पीठ पर बैठकर सुनाते, लगभग वही कथाएं लोकगायक अपने लोकगीतों के माध्यम से सुनाया करते। व्यासपीठ पर बैठे वक्ता पुराणों की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए जन मानस को प्राचीन कथाओं के साथ-साथ साहित्य का भी बोध करवाते थे। जबकि लोकगायक परम्परा से प्राप्त लोकगीतों को बिना किसी साधन के प्रस्तुत करते।
अर्थ युग के बढ़ते प्रभाव से कथावाचकों की शैली और उद्देश्य बदलने लगे। आज पुराणों की व्याख्या कम, गीत गायन तथा नृत्य, कथा के महत्वपूर्ण अंग बन गये हैं। जो काम कभी लोकगायक करते थे, कालान्तर में वही काम अपने ज्ञान की कमी को छुपाने के लिए व्यास पीठ पर आसीन तथाकथित कथावाचक करने लगे। इसका प्रभाव यह हुआ कि लोकगायक भी धीरे धीरे व्यास गद्दी पर आसीन होकर अपनी शैली में कथा सुनाने लगे। अब तो कथा पाण्डालों में कथा कम होती है, परन्तु भजन के नाम पर आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ फिल्मी पैरोडी खूब गूंजती हैं। जिन पर श्रोताओं को थिरकते हुए कभी भी देखा जा सकता है। पूछने पर उत्तर मिलता है कि पण्डित जी भजन गा रहे हैं और भक्तगण भक्ति रस में डूबकर नृत्य कर रहे हैं। वर्तमान में यही भक्ति की नई परिभाषा है। पुराणों की कथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़कर सदाचारी बनाने का उद्देश्य तो न जाने कहाँ और कब छूट गया। व्याकरण के धरातल से पुराणों की व्याख्या करके नई पीढ़ी में संस्कृति और संस्कारों का बीजारोपण करने वाले आचार्य तो अब बिरले ही हैं। शेष तो मात्र गायक हैं। अब तो आडम्बर और भौड़ापन भी खूब दिखाई देता है। मनमानी शैली और मनमुखी व्याख्या प्रस्तुत करके समाज को दिग्भ्रमित करना ही एकमात्र उद्देश्य समझ में आता है। जिसके कारण अन्ध विश्वास भी निरन्तर अपने पैर पसार रहा है।
पुराणों की कथाएं सुनाने के जो नियम और विधान पूर्वजों ने बनाये हैं, उन्हें भी सर्वथा ताक पर इस कुतर्क के साथ रख दिया जाता है कि भगवान की भक्ति में कोई नियम नहीं लगता, केवल भाव चाहिए। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्भागवत महापुराण में पृष्ठ संख्या 10 से 31 तक श्रीमद्भागवत का महात्म्य, महिमा, कथावाचक की योग्यता, पूजन विधि, मुहूर्त विचार आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। ‘मुहूर्त विचार’ शीर्षक में स्पष्ट रूप से लिखा है कि गुरु और शुक्र ग्रह के अस्त होने पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन नहीं होना चाहिए। लेकिन विडम्बना देखिये कि 12 जून 2025 से 9 जुलाई 2025 तक गुरु अस्त है। फिर भी श्रीमद्भागवत कथाओं के अनगिनत आयोजन हो रहे हैं। इटावा काण्ड से सम्बन्धित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह का आयोजन 21 जून से अर्थात गुरु अस्त में प्रारम्भ हुआ था। यहाँ यह भी नहीं कह सकते कि इन तथाकथित कथावाचकों को इसका ज्ञान नहीं है। क्योंकि जो पुराण वे सुना रहे हैं, उसी में स्पष्ट रूप से सब लिखा हुआ है। तब फिर इसका दूसरा पक्ष यही हो सकता है कि धन के लोभ में मर्यादा और विधान को जान बूझ कर नजर अन्दाज किया जाता है। क्योंकि इस बारे में कोई किसी से सवाल करने वाला नहीं है। कमाई का बढ़िया जरिया देख अनेक युवक युवतियां बिना कोई विशेष शिक्षा प्राप्त किये कथावाचक बन रहे हैं। साथ ही समाज को भ्रमित करने के लिए अपने नाम के साथ शास्त्री जोड़ लेते हैं। जबकि संस्कृत महाविद्यालय से स्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले को ही शास्त्री तथा परास्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले को आचार्य की उपाधि सम्बन्धित विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की जाती है। कथावाचकों के रूप में अल्प शिक्षितों की बढ़ती फौज संस्कृति और संस्कारों का सत्यानाश करके अन्धविश्वास की प्रतिष्ठा करने में लगी हुई है। इस पर नियन्त्रण लगना ही चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि कथावाचकों के लिए एक मानक बने। जो लोग इस क्षेत्र में आना चाहते हैं उनके लिए प्रशिक्षण की अनिवार्यता हो। प्रशिक्षण के बाद उनकी परीक्षा हो। परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले को ही प्रमाण पत्र प्रदान करके कथावाचक की उपाधि देने की व्यवस्था बने। इस हेतु चारो शंकराचार्यों को सरकार के साथ बैठकर विचार करना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 26 में सभी धार्मिक सम्प्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबन्धन करने, धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने, रखरखाव तथा प्रशासन का अधिकार दिया गया है। भारतीय संस्कृति को संविधान ने हिन्दू नामक धार्मिक सम्प्रदाय माना है। जिसके सर्वोच्च गुरु चारो शंकराचार्य हैं। अतः चारो शंकराचार्यों को इस दिशा में गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करके कथावाचकों के लिए एक मानक निश्चित करने का निर्णय लेना चाहिए।
– डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
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