न जाने वो कैसी औरतें होती हैं जो अपना ध्यान नहीं रखतीं। ना अपने चेहरे का और ना ही अपने शरीर का। ढीली स्किन और बेडौल शरीर ऐसा लगता है जैसे कि बस शादी करने के लिए ही उनको सुंदर दिखना था। शादी हो जाने के बाद जैसे उनका मकसद पूरा हो गया और फिर अपनी ओर ध्यान मत दो। फिर भी कपड़े फैशनेबल चाहिए रहते हैं ताकि अच्छी दिख सकें। फिर भले ही वो कपड़े उन पर अच्छे लगे या ना लगे। रिया अपनी टेबल पर बैठी हुई यह बात अपनी कलीग से कह रही थी जिसे कुछ ही दिन हुए थे स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करते हुए। पास में ही बैठी सलोनी मुस्कुराने लगी उसने पूछा, “तुम्हारी शादी हो गई है क्या?”
रिया:- “नहीं, अभी नहीं हुई!”
सलोनी:- “अच्छा! तभी ऐसा बोल रही हो। जब शादी हो जाएगी और तब उसके बाद के अनुभव शेयर करना मेरे साथ और फिर जो बात तुमने अभी कही है वो फिर से कहना।”
रिया:- “अरे ! कुछ भी! मैं ऐसे ही रहने वाली हूं शादी के बाद भी। मैं खुद का ध्यान रखूंगी।”
सलोनी मुस्कुराती हुई अपनी क्लास की ओर बढ़ गई।
सलोनी दो बच्चों की मां और भरे पूरे परिवार की महिला थी। जिम्मेदारियों से भरा घर और नौकरी से तालमेल बिठाना काफी मुश्किल काम होता था उसके लिए लेकिन फिर भी अपनी एक आइडेंटिटी के लिए शिक्षिका की नौकरी कर रही थी, नहीं तो वह घर में ही बंद होकर रह जाती। भले ही वो अपने ऊपर को ध्यान नहीं दे पाती थी, उसका शरीर भारी हो गया था, उसे महीनों हो गये थे पार्लर गए हुए लेकिन वो एडजस्ट कर लेती थी। सलोनी सोचने लगी कि वह भी शादी से पहले ऐसा ही सोचती थी कि वो हमेशा खुश रहेगी, फिट रहेगी, सबके साथ मजे करेगी लेकिन शादी के बाद जीवन में बहुत बदलाव आ जाता है वो यह नहीं जानती थी। शादी के बाद उस पर घर की जिम्मेदारियां बढ़ गई थी। सास जो घर का काम खुद करती थी उन्होंने भी घर के काम की जिम्मेदारी उस पर डाल दी थी। अब घर के काम के साथ – साथ सभी लोगों का समय से चाय नाश्ता दवाई का भी ध्यान रखना पड़ता था। बाजार के काम की जिम्मेदारी भी उसी पर आ गई थी। घर में ऐसे बहुत से छोटे – छोटे काम होते थे जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता है और कभी – कभी रवि को जब उनकी कोई चीज समय पर नहीं मिलती थी तो वह भी कह देते थे कि करती क्या हो दिन भर! ऐसे में जवाब नहीं सूझता था मुझे।
शुभम के आने के बाद मेरा काम और बढ़ गया था। अब बीवी, बहू के साथ मां की भी जिम्मेदारी निभाने लगी थी मैं। पूरे दिन चकरघिन्नी की तरह घूमती रहती थी। ऐसे में अपने ऊपर ध्यान देने का समय ही कहां से निकालती। नतीजा यह हुआ कि मैं बेडौल होने लगी। मेरा तन और मन पूरी तरह से अपने ऊपर से हटकर कर गृहस्थी में रम गया था और कुछ आलस ने भी अपने पैर पसार लिए थे।
आज सुबह से ही मेरे सर में दर्द और बुखार जैसा लग रहा था। बिस्तर छोड़ने का मन नहीं हो रहा था और मेरी हिम्मत भी जवाब दे रही थी लेकिन बच्चों को स्कूल भेजना था। रवि का टिफिन बनाना और सबका नाश्ता तैयार करना था। जैसे तैसे उठकर सारे काम निपटाये और सासू जी को बोलकर लेट गई कि खाने के समय उठा दीजिएगा तबीयत अच्छी नहीं है। सास ने रवि को फोन करके घर जल्दी बुला लिया।
रवि:- “तुमने सुबह बताया नहीं कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?”
सलोनी:- “मुझे लगा कि क्रोसिन खा लूंगी तो ठीक हो जाएगा इसलिए नहीं बताया आपको।”
रवि:- “तैयार हो जाओ डॉक्टर के यहां जाना है।”
सलोनी:- “हां ठीक है।”
डॉक्टर के यहां से आने के बाद मैं किचन में चली गई शाम की रसोई बनाने के लिए।
सास:- “तबीयत ठीक नहीं है तो सभी के लिए खिचड़ी चढ़ा दो।”
सलोनी:- “जी मांजी।”
काम का पसारा देखकर मेरी सांस फूल रही थी। कपड़े प्रेस करने बाकी थे, बड़ियां धूप में सूखने के लिए रखी थी वह भरनी बाकी थी। दो दिन से कपड़े नहीं धोए थे तो कपड़ों का ढेर लगा हुआ था। आखिर में सोचना बंद कर दिया और खिचड़ी बनाकर मैं चुपचाप लेट गई। मैंने तय किया कि मुझे घर से बाहर निकलना होगा नहीं तो मैं ऐसे ही घर में घुटते रहूंगी। आखिर बी एड कर रखा है तो टीचिंग जॉब तो कर सकती हूं और उसने नौकरी ढूंढना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद उसे नर्सरी के बच्चों को पढ़ाने की नौकरी मिल गई। सुबह जल्दी उठकर कर घर के जरूरी काम निपटाकर वो स्कूल जाती और एक बजे घर आकर बाकी के काम निपटाती। फिर वो बच्चों की पढ़ाई देखती उन्हें ट्यूशन छोड़ने जाती और शाम होते ही किचन में काम शुरू करती। खुद के लिए उसके पास आधा घंटा भी नहीं था। अपने सारे शौक वह भूलते जा रही थी। पढ़ना, घूमना, मूवी देखना, दोस्तों के संग मजे करना सब खत्म हो गया था। आज रिया की बातों ने उसे अपना पुराना वक्त याद दिला दिया। आज वह अपने लिए एक घंटा निकालना चाहे भी तो मुश्किल होता है। पेंडिंग काम मुंह बाये खड़े रहते हैं। वो कई बार तय करती कि पार्लर जाकर फेशियल करवा कर एक घंटा रिलैक्स करके आ जाये। वह सोचती कि एक घंटा अपने लिये निकाले लेकिन वह सिर्फ सोचते ही रहती। वह सोचने लगी कि हर स्त्री के लिए एक घंटा खुद के लिए निकलना कितना कठिन हो जाता है। समय का अभाव और समय की पाबंदी कुछ सोचने नहीं देती और दूसरे लोगों को बस हमें जज करना है। लोगों को इससे ही फुर्सत नहीं है। यह कहना बहुत आसान है कि अपने लिए एक घंटा निकालो लेकिन नहीं मिलता है समय, यदि हम फैशनपरस्ती करने लगे तो घर की जिम्मेदारियां कैसे निभाएंगे। दूसरों को जज करना बहुत आसान है यदि हमारी जगह वह खुद को रखें तो शायद हम स्त्रियों को लेकर जज करना बंद कर दे।
आज स्टाफ रूम में इत्तेफाक से सिर्फ रिया और सलोनी ही बैठी हुई थी। रिया ने बात की पहल की।
रिया:- “सलोनी मैम कल आपको मेरी बात बुरी लगी लेकिन मैंने आपको नहीं कहा था। मैंने एक जनरल बात कही थी लेकिन आप भी इतनी सुंदर हो, एक्टिव हो तो आप जिम क्यों नहीं जाती हैं?” सलोनी:- “नहीं, मुझे बुरा नहीं लगा और जिम जाने का वक्त नहीं रहता है मेरे पास। बहुत काम होते हैं घर में।”
रिया:- “अच्छा यह बताएं यदि आप बीमार पड़ जाए तो आराम करती है क्या?”
सलोनी:- “तब मजबूरी हो जाती है, शरीर साथ नहीं देता है।”
रिया:- “यदि कहीं बाहर जाना हो, कोई मेहमान आ जाए या कोई अर्जेंट काम आ जाए तब क्या करतीं हैं आप?”
सलोनी:- “तब तो समय निकालना पड़ता है। कैसे भी लेकिन जो काम छोड़ो वह बाद में तो करना ही पड़ता है ना।”
रिया:- “बिल्कुल आप अपने किसी भी काम को इग्नोर नहीं करती फिर खुद को इग्नोर कैसे करती है? जो काम आप बाद में भी कर सकती हैं या टाइम मैनेजमेंट करके कर सकती है तो आप अपनी सेहत पर भी ध्यान दे सकती है।”
रिया:- “ठीक है! शाम को पांच बजे घर पर पूजा है आप जरूर आइएगा।”
सलोनी:- “ठीक है !”
सलोनी शाम को तैयार होकर रिया के घर पहुंचती है तो वहां पर पूजा की कोई तैयारी ना देखकर चौंक जाती है।
सलोनी:- “तुमने कहा था कि तुम्हारे घर पर पूजा है?”
रिया:- “हां है ना, पर पूजा का तरीका जरा अलग है और वह हंसने लगती है। रिया सलोनी को अपने साथ घर के पीछे बने हुए आंगन में लेकर आती है जहां उसकी दो और सहेलियां बैठी हुई थी। वो उनसे उनका परिचय करवाती है। सॉरी मैम लेकिन मैं आपको ऐसे हताश नहीं देख सकती। आज आप हमारे साथ एक्सरसाइज करेंगीं।” सलोनी मुस्कुराने लगती है।
आंगन में चारों ओर फूलों की बेलें फैली हुई थी। तरह तरह के फूल खिले हुए थे। हरियाली और फूलों की सुगंध वातावरण में ताजगी का एहसास करा रही थी।
आधे घंटे में सलोनी थक गई और बोली, “बस भाई अब नहीं होता मुझसे।”
रिया:- “आधा घंटा और करना है लेकिन आपके लिए आज इतना ही काफी है कल से एक घंटा करेंगे।”
सलोनी:- “कल भी आना होगा क्या? बहुत मुश्किल है।”
रिया:- “कह देना घर में कि मेरे घर पर सत्संग है सात दिन तक।” सलोनी हंसने लगती है। सात दिन समय निकालकर सलोनी रिया के यहां एक्सरसाइज करती है तो उसे अच्छा लगता है और उसे अपना शरीर भी हल्का लगने के साथ-साथ चुस्ती फुर्ती में भी फर्क आता है। अब उसका मन जिम जाने का हो रहा था लेकिन घर में बात शुरू कैसे करें।”
सलोनी:- “आजकल उठने बैठने में दिक्कत होती है। घुटने पर जोर आता है।”
सास:- “अभी से! अभी तो इतनी उम्र भी नहीं है तुम्हारी! तुम्हारी उम्र की जब मैं थी तो तुमसे दुगना काम करती थी और उफ भी नहीं करती थी और तुमने अपना वजन भी कितना बढ़ा लिया है।” सलोनी:- “जी मांजी। क्या करूं वजन कम ही नहीं होता है मेरा।”
सास:- “आजकल लड़कियां, औरतें योगा – जिम जाती है तुम भी जाओ। शरीर स्वस्थ रहेगा तो कोई बीमारी नहीं फटकेगी पास में।”
सलोनी:- “लेकिन घर में समय निकालना मुश्किल होता है। मैं कैसे जाऊं?”
सास:- “मेरे लायक जो काम हो मुझे बता दिया करो मैं कर लूंगी तुम्हारा थोड़ा बोझ कम हो जाएगा।”
सलोनी:- “जी और वह मुस्कुराते हुए अंदर चली गई। अगले दिन से उसने जिम जॉइन कर लिया। रोज शाम को जाने के लिए उसे अब समय मैनेज नहीं करना पड़ता था। अब एक घंटा समय अपने लिए निकल आता था। धीरे-धीरे उसे अपने लिए एक घंटे का महत्व समझ में आने लगा था। उसके जीवन और स्वास्थ्य में फर्क आने लगा था।

-प्रियंका वरमा माहेश्वरी, गुजरात
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