Sunday, April 6, 2025
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मंज़िल को पाना है तो मुखर बनों

खुद पर कमान मजबूत शख़्सीयत की नींव होती है, शांत मन इंसान की दक्षता और कुनेह है, मन को शांत रखो और दिमाग को तेज़। जब किसी की गलत बात या गलत विषय वस्तु पर आप निरर्थक दिमाग नहीं चलाते तो अपनी ज़िंदगी की दिशा निर्देश की कमान भी किसी और के हाथों में मत दो। विरोध करना भी एक हुनर है सीख जाओ, ना कहना गलत नहीं। जिस बात को करने की अनुमति अपना मन और हृदय ना दें वो करने की जुर्रत मूर्खता है, कमज़ोरी है और डर का दूसरा नाम है।
भावनाओं को कुशाग्र बुद्धि पर हावी होने का अधिकार कभी मत दो, अपने वजूद की तलाश खुद के अंदर करो और प्रभुत्व पाकर बेहतरीन शख़्सीयत का प्रमाण दो। आत्मबल का स्त्रोत बहता है हमारे भीतर डर को जड़ से काटने पर फूट पड़ेगा सकारात्मकता का झरना, जो डर और जिजक की असंख्य परतों के पीछे बंदी पड़ा है।
भावनाशील होना बुरा नहीं पर मूर्खता की दहलीज़ ना लाँघे, एक सीमा तक सिमित रहें भावनाओं को बोल दो।
निडरता को सौंप दो अपना वजूद बस आपकी आँखें काफ़ी है, बात करते वक्त हर किसीसे मिलाना सीख लो। एक व्यक्तित्व उभर आएगा अपने आप में आत्मविश्वास का ब्युगूल बजेगा।
महत्व इस बात का नहीं कि आपके पास कोई अधिकार है या नहीं, महत्व उस बात का है कि क्या आप अपने हक और अधिकार के लिए आवाज़ उठाना जानते हो। और वो भी पूरी शिद्दत और आत्मविश्वास के साथ। कभी-कभी मौन रहकर हम बहुत कुछ खो देते है, संवाद का सिक्का ही चलता है, मंज़िल को पाना है तो खुद को मुखर कर दो।
मात खाना और हारना ज़िंदगी का हिस्सा सही, पर उसे आदत बनाना खुद के प्रति अन्याय है। कमज़ोर खयालों को बंदीश में रखो अपने सपनों की ज़मीन पर कदम रखने की इज़ाज़त मत दो। एक ज़िंदगी में से अपने लिए आसमान चुनना है तो हिम्मत और हौसलों का दामन थामें नज़रों को लक्ष्य की सरहद पर तैनात करो और पीछे मूड़ कर देखने की आदत को बदल दो।
बस कुछ ही कदमों पर आपकी मंज़िल खड़ी है हर खुशीयों को आगोश में भर लो।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)