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विविधा

अंतरात्मा कर ले आत्महत्या

नीरज त्यागी

पत्थरो की भीड़ है इंसान है कहाँ ।
बईमानों की भीड़ में ईमान है कहाँ ।।
मुर्दो की बस्ती जिंदा इंसान है कहाँ ।
झूठो की बस्ती मक्कार सब यहाँ ।।
एकला चलो अब संभव कहाँ।
भीड़ से हटकर तेरा वजूद अब कहाँ ।।
आराम से जीना है तो जमीर बेच दो ।
भीड़ से जुड़ना है तो अपना आत्मसम्मान बेच दो ।।
दलदल है जीवन इससे बच ना पाएगा ।
जिंदा रहना है तो बस अब दुसरो के सामने घुटने टेक दो ।।
आओ अपने आप को भीड़ से जोड़ दे।
आत्मा जिंदा हो ना होएदिखावटी शरीर को भीड़ से जोड़ दे ।। § Read_More....

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दगा दोस्ती में न तुम यार करना।

-संजय कुमार गिरि, दिल्ली।

दगा दोस्ती में न तुम यार करना।
कभी पीठ पीछे न तुम वार करना।।
करेंगे न हद पार हम दोस्ती की।
कि तुम भी कभी ये न हद पार करना।।
अगर हम करें जिद कभी जीतने की।
तो हँस कर ही तुम हार स्वीकार करना।।
कभी दूर से चल के आए कोई तो।
सदा हँस के ही उसका सत्कार करना।।
मिला है तुम्हें चार ही दिन का जीवन।
इसे यूँ ही बस तुम न बेकार करना।।
वतन पर कभी आँच आए अगर तो।
कलम की जरा तेज रफ्तार करना।।
हमेशा ही ‘संजय’ ने बाँटी मुहब्बत।
उसे भी अगर हो सके प्यार करना।। § Read_More....

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तू मंजिल मेरी है तू रस्ता मेरा है,

…दिवाकर कुमार सुलतानपुरी, दिल्ली।

तू मंजिल मेरी है तू रस्ता मेरा है,
मुसाफिर हूँ मुझको चलना सदा है,
सफर तय किया , इनायत है रब की
मुसिबत से महरूम उसने रखा है,
नजरों में मेरी है गुलिस्तां भी बंजर
हकीकत का जबसे पर्दा उठा है,
गमों की नवाजिश करें भी तो कब तक
की ये रोज का सिलसिला बन गया है,
तड़पता है दिल बेबसी पे मिरा पर
यही इक अदा मेरी सबसे जुदा है, § Read_More....

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नेता जी अब तुम्ही बताओ, अच्छे दिन कब आएंगे !

आशीष तिवारी ‘जुगनू’ इंदौर

नेता जी अब तुम्ही बताओ,
अच्छे दिन कब आएंगे !

ठेला, गुमटी रोज हटाते,
हम सबकी फुटपाथों से !
आप कहे तो गला घोट दूँ,
अपने बच्चों की, हाथों से !

बिना कमाई के बच्चे सब,
जीते जी मर जाएंगे !
नेता जी अब तुम्ही बताओ,
अच्छे दिन कब आएंगे !

कहते हो तुम बेच पकौड़ा,
फिर करवाते निगम का दौड़ा !
तोड़ फोड़ सामान छीनते,
भर ले जाते मार हथौड़ा !

हमी तलें घर बैठ पकौड़ा,
और हमीं क्या खाएंगे ?
नेता जी अब तुम्हीं बताओ,
अच्छे दिन कब आएंगे !

जब जी चाहा उड़ जाते हो,
हम गरीब पर ध्यान नहीं !
विजय माल्या, नीरव मोदी,
के जैसा तो प्लान नहीं !! § Read_More....

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“ प्रेम की चिड़िया ”

बहुत छोटी सी कोई बात भी
झकझोर देती है
तो चिड़िया प्रेम की पल भर में
जीना छोड़ देती है
न जबरन बांधना इसको,
संभलकर थामना इसको
जरा सी चोट लग जाए
तो ये दम तोड़ देती है l
*** § Read_More....

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विश्व चित्रगुप्त प्रकटोत्सव की तैयारियां आरम्भ

औरैया, जन सामना ब्यूरो। विश्व चित्रगुप्त प्रकटोत्सव की तैयारियां आरम्भ हो गयीं हैं। भगवान चित्रगुप्त जी जो संसार के समस्त प्राणियों के चित्त में गुप्त रहकर उनका लेखा-जोखा रखते हैं। उनका अवतरण पर्व देश-विदेश में प्रतिवर्ष पूरे हर्षोल्लास के साथ चैत पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष यह 31 मार्च को मनाया जायेगा। इस अवसर पर कहीं प्रभु की मनोरम झांकी निकलती है तो कहीं रथयात्रा, कहीं पूजा तो कहीं भण्डारा होता है। इस दिन लोग अपने घरों में दीप प्रज्वलित कर पूरे परिवार के साथ प्रभु चित्रगुप्त जी और कलम दवात का पूजा कर स्वागत कर खुशियां मनाते हैं। इस वर्ष इस महापर्व को भव्य बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कायस्थ वाहिनी के प्रमुख पंकज भैया कायस्थ ने वाहिनी के समस्त पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को जुट जाने का आवाह्न किया है। § Read_More....

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ठिठुरी धरती

– कंचन पाठक कवियित्री, लेखिका

ठिठुरी धरती ठिठुरा सा गगन
तरु वल्लरी भी स्तब्ध गहन
थर-थर काँपे गिरि वन नदिया
किसी विधि नहीं हो ये ठंढ वहन
भूली बुलबुल कुजन किल्लोल
किसने दी ऋतू में बरफ घोल।
कलि क्लांत सुकोमल खिल न सकी
दुपहर तक रवि से मिल न सकी
बिरहा की सर्द शिथिलता में
रुक-रुक बरबस लेती सिसकी
मौसम पर सिहरन को जड़ कर
अदृश्य हुई रवि रश्मि लोल ।
किसने दी ऋतू में बरफ घोल ।।
दलकाता एक एक तन्तु को
यह शीत लहर हर जन्तु को
कम्बल में भी घुस घुस जाता
भरमा कर किन्तु परन्तु को
लम्बी पारी निशिपति खेले
दिनमान धरे पग नाप तौल ।
किसने दी ऋतू में बरफ घोल ।
प्रभु अग्निदेव तुम धन्य धन्य
तुम सा नहीं प्रियकर कोई अन्य
हर ओर शिशिर की मनमानी
दसों दिशा प्रकम्पित शीत जन्य
एक तुम हीं अपनी कुनकुन से
देते पुलकन के द्वार खोल ।
किसने दी ऋतू में बरफ घोल ।। § Read_More....

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गजलः आपको देख कर…

संजय कुमार गिरि

आपको देख कर मुस्कुराते रहे
गीत गजलें सभी गुनगुनाते रहे
प्रेम से वास्ता इस कदर हो गया
दुश्मनी को भीश् दिल से भुलाते रहे
छोड़ कर हर बुरा ऐब हम तो यहाँ
राह के कंटको को हटाते रहे
डाल कर हाथ में हाथ अपना सनम
हाल दिल का तुम्हें हम सुनाते रहे
कर दिया आज झूठा हमी को यहाँ
हम गमों से जिन्हें ही बचाते रहे
बात दिल की कहूँ आपसे अब सुनो
रात भर वो हमें ही रुलाते रहे § Read_More....

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हाहाकार: पैसा पावर और जुगाड़

 

-आकांक्षा सक्सेना

हो, ब्यूटी, टैलेन्ट तो क्या हो बात
फिर जो बटरिंग कर जाये बेमिशाल….!
बस उसकी किस्मत उसका राज्य….
आज कलयुग की है यही डिमाण्ड….!
आँसुओं का भी हो रहा व्यापार
पाप की गठरी बस जिन्दाबाद….!
जनता शोषित बदहाल पड़ी
उनको तो बस वोट की पड़ी….!
भैंस भी लाठी बन गयी आज
न्याय-नैतिकता हुई गुमनाम
असत्य के साथ चार बाॅडीगार्ड….!
कोई नही सुनता फरियाद
गरीब की आस बस भगवान…..!
सब जानकर बनते अनजान
चारों तरफ आज हाहाकार…..! § Read_More....

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कहानीः आवारा

एम. अफसर खान सागर

शाम के आठ बज रहे थे, मोबाइल ने घन-घनाना शुरू किया तो रीमा ने करवट बदल कर देखा कि फिर वही नम्बर। पहले तो उसने काल रिसीव नहीं करना चाहा मगर रिंग पर रिंग बजा जा रहा था तो उसने अचानक काल रिसीव कर कहा ‘तुमसा आवारा लड़का मैंने अपने जीवन में नहीं सोचा था’ और काल डिसकनेक्ट हो गया। इतना सुनना था कि फोन करने वाला सन रह गया, मानो उसे सांप ने डस लिया हो। पिछले चार साल के सम्बन्ध में उसने रिंग तो कितनी बार किया होगा मगर शुरूवाती जाड़े की वह शाम उसके लिए तपती गर्मी के झोंकों से कम न था। उस शाम चार साल पहले तक समीर की जिन्दगी विरान सहरा में उड़ते रेत की मानिंद भटक रही थी। कब शाम और कब सुबह होती उसको इसका इल्म न रहता। जिन्दगी की रंगीनियों और प्यार की बारीकियों के बारे में उसने कभी सोचा भी होगा, ऐसा उसे नहीं लगता। बस एक लिखने का धुन सवार रहता उस पर और वह उस धुन में अक्सर बुझा रहता। वक्त की रेत पर जिन्दगी धीरे-धीरे कट रही थी। तभी एक दिन समीर के खास दोस्त की मोबाइल का रिंग बजा। रिसीव करने पर आवाज आयी, हैलो….. आप कौन, चूंकि नम्बर अंजान था सो उसने काल करने वाले से यह सवाल पूछा। उत्तर था, आप से ही बात करनी थी। इतना सुनना था कि दोस्त ने जवाब दिया कि मैं अंजान लोगों से बात नहीं करता और फोन काट दिया। रात बीती सुबह हुआ फिर आयी वो शाम जिसने समीर की जिन्दगी में ऐसा भूचाल पैदा किया कि वह उसे याद कर आज भी यादों की सफर पर चला जाता है। शाम के सात बज रहे थे, बाजार से होता हुआ समीर घर की जानिब मुखातिब हुआ ही होगा कि उसके मोबाइल पर डाइवर्ट काल आया। हैलो… हैलो, काफी नाजुक व मखमली आवाज। आप कौन, ऐसा आवाज कि जिसे सुन कर कोई भी नाम बताने से गुरेज न करे। सो समीर ने जवाब दिया…. समीर कहते हैं लोग। इतना सुनना था कि काल डिसकनेक्ट हो गया। उस मखमली आवाज ने समीर को पूरी रात बेचैन रखा। रात भर वह सोचता रहा, कौन… कहाँ से…. क्यों ? फिर दूसरे दिन उसी नम्बर से काल आया। आप कौन, समीर ने बस यही पूछा था उससे।
जवाब भी उसने समीर की अन्दाज में ही दिया, रीमा कहते हैं लोग और फिर फोन कट गया। फिर जो सिलसिला चालू हुआ वो दरिया की रवानी की तरह बहता रहा। बीच-बीच में मौजों ने जरूर कभी-कभार हिचकोले लिये होंगे मगर रवानी में कमी न आयी। रोज शाम के वक्त समीर के मोबाइल पर उसी नम्बर से काल और मिसकाल आता रहा। फिर शुरू हुआ बातों का ऐसा दौर जिसने दोनों को एक अन्जान रिश्ते में कैद कर दिया। § Read_More....

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