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विविधा

आत्ममंथन

– ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

यूँहि बेवक्त कभी बारिश में भीग कर देखो
वक्त की जेब से खुशियां चुरा कर देखो!
कब तक सिकुड़ के जीते रहोगे
कभी तो बाहों को फैला कर देखो!
हमेशा शिकायत रहती है लोगों से
कभी खुद की गलती सुधार कर देखो!
यूँहि जिये जा रहे हो खुद के लिये
थोड़ा वक्त जरूरतमंदों को देकर देखो!
सभी को जाना है यहां कोई अमर नही
जानते तो हो पर मानकर भी देखो!!
हर तरफ भ्रष्टाचार व्यभिचार दिख रहा
एक बार चुप्पी को तोड़ कर देखो!!
हमेशा लिखते हो दुनियादारी पर
कभी आत्ममंथन को लिख कर देखो!! § Read_More....

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नटखट तू गोपाल जैसा

मुकेश सिंह

नटखट तू गोपाल जैसा
प्रिय तू मुझको न कोई वैसा।
है हवाओं सी तुझमें चंचलता
चांद सी तुझमें है शीतलता।।
प्रखर सूरज सा ओज है मुख में
बादलों सा पानी है।
गंगा की निर्मलता तुझमें
तू प्यार की रवानी है।।
निश्छल तेरी यह मुस्कान
जग में है सबसे छविमान।
अटक अटक कर तेरा बोलना
सात सुरों की अद्भुत तान।। § Read_More....

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ग़ज़ल आग में मुफलिसी….

ऐनुल बरौलवी

आग में मुफलिसी की हम जलते रहे
और दर्दे जिगर से बिलखते रहे
चाक दामन किए जो थे अपने सभी
रोज उनकी जो नजरों में खलते रहे
जिन्दगी का भयानक बुरा वक्त था
बेबसी में फिसलते सँभलते रहे
बेवफा है जमाना नहीं काम का
जो थे अपने वो नजरें बदलते रहे
गैर से है गिला और शिकवा नहीं
क्या कहें रोज अपने ही छलते रहे
वक्त की आँधियाँ ले उड़ी सब खुशी
गम की राहों में हम रोज चलते रहे
आँसुओं की नदी मेरी आँखों में थी
खार चुभते रहे फूल हँसते रहे
मुश्किलें जिन्दगी की नहीं कम हुईं
शम्अ की तरहा श्ऐनुलश् पिघलते रहे
ऐनुल बरौलवी § Read_More....

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मौन भी आवाज़ है

मौन भी संगीत है
मौन भी सुगंध है
मौन भी तौल है
मौन भी जोड़ है
मौन भी योग है
मौन भी प्रेम है
मौन भी इलाज है
मौन भी तपस्या है
मौन भी आनंद है
मौन भी आगाज़ है
मौन भी तलवार है
मौन भी आवाज़ है
-ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना § Read_More....

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पहली बार मंच पर कविता पढ़ता कवि

नीरज त्यागी

पहली बार कविता का पाठन करना है।
नीर का मन आज बहुत घबराया है।।
अपनी लिखी हुई कविता के शब्द जैसे दिख नही रहे।
सारे के सारे शब्द जैसे पन्ने से फुर हो गए।।
उसपे बड़े बड़े कवियों ने बड़ा अच्छा मंच सजाया है।
देख देख कर मंच की सज्जा नीर का मन घबराया है।।
ऐसा लग रहा था आज बस दम निकल जायेगा।
इतने बड़े नामो के बीच मे सब खो जाएगा।।
जैसे तैसे कविता का उच्चारण शुरू किया।
होठ लड़खड़ा गए और पैर भी अंदर तक कांप गए।।
लगता था आज अपनी ही कविता मैं कह नही पाऊंगा।
पता नही आज अपनी जान कैसे बचाऊँगा।।
पढ़ते पढ़ते आँखो से आँशु बहने लगे ।
शीर्षक माँ ने आज फिर मुझे बचाया है।।
बचपन से आज तक माँ ही काम आयी है।
कविता पाठन में भी मेरी लाज माँ ने बचाई है ।। § Read_More....

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एक बेटी की व्यथा

उड़ती फिरती चिड़िया थी ।
मैं अपने पापा की गुड़िया थी ।।
माँ की आँखो का तारा थी ।
मुझमे माँ की झलक प्यारी थी ।।
जो भी मन चाहा करती थी ।
मैं पंख लगा कर उड़ती थी ।।
अपने भाई की बड़ी प्यारी थी ।
मैं उसकी बड़ी दुलारी थी ।।
अब मेरा विवाह हो गया है ।
पिंजरे के पंछी सा जीवन हो गया है।।
अब सबकी नजर बचाती हूँ ।
मैं बन्द कमरों मे गुनगुनाती हूँ ।।
मन करता फिर बच्ची बन जाओ ।
अपने पापा की गोदी चढ़ जाओ ।। § Read_More....

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कविता – जवाब देना होगा ।

नीरज त्यागी

एक अजीब सी ख्वाईश थी कभी।
बुलंदियों का आसमान छूने की ।।
आज भी आसमान छूने की ख्वाईश है ।
पर अब आसमान छूने की वजह है नई ।।
अब आसमान छूने की ख्वाईश हैं।
क्योंकि सवाल बहुत पूछने है तुझसे।।
मेरे गमो के सवालों का जवाब देना है तुझको ।
तुझे लोगो ने खुदा बना के सर पर चढ़ा के रखा है ।।
इस जमीन पर अगर जवाब ना मिले मुझको ।
धुआँ बन कर ही सही पर आऊंगा तेरे पास जरूर ।। § Read_More....

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अंतरात्मा कर ले आत्महत्या

नीरज त्यागी

पत्थरो की भीड़ है इंसान है कहाँ ।
बईमानों की भीड़ में ईमान है कहाँ ।।
मुर्दो की बस्ती जिंदा इंसान है कहाँ ।
झूठो की बस्ती मक्कार सब यहाँ ।।
एकला चलो अब संभव कहाँ।
भीड़ से हटकर तेरा वजूद अब कहाँ ।।
आराम से जीना है तो जमीर बेच दो ।
भीड़ से जुड़ना है तो अपना आत्मसम्मान बेच दो ।।
दलदल है जीवन इससे बच ना पाएगा ।
जिंदा रहना है तो बस अब दुसरो के सामने घुटने टेक दो ।।
आओ अपने आप को भीड़ से जोड़ दे।
आत्मा जिंदा हो ना होएदिखावटी शरीर को भीड़ से जोड़ दे ।। § Read_More....

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दगा दोस्ती में न तुम यार करना।

-संजय कुमार गिरि, दिल्ली।

दगा दोस्ती में न तुम यार करना।
कभी पीठ पीछे न तुम वार करना।।
करेंगे न हद पार हम दोस्ती की।
कि तुम भी कभी ये न हद पार करना।।
अगर हम करें जिद कभी जीतने की।
तो हँस कर ही तुम हार स्वीकार करना।।
कभी दूर से चल के आए कोई तो।
सदा हँस के ही उसका सत्कार करना।।
मिला है तुम्हें चार ही दिन का जीवन।
इसे यूँ ही बस तुम न बेकार करना।।
वतन पर कभी आँच आए अगर तो।
कलम की जरा तेज रफ्तार करना।।
हमेशा ही ‘संजय’ ने बाँटी मुहब्बत।
उसे भी अगर हो सके प्यार करना।। § Read_More....

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तू मंजिल मेरी है तू रस्ता मेरा है,

…दिवाकर कुमार सुलतानपुरी, दिल्ली।

तू मंजिल मेरी है तू रस्ता मेरा है,
मुसाफिर हूँ मुझको चलना सदा है,
सफर तय किया , इनायत है रब की
मुसिबत से महरूम उसने रखा है,
नजरों में मेरी है गुलिस्तां भी बंजर
हकीकत का जबसे पर्दा उठा है,
गमों की नवाजिश करें भी तो कब तक
की ये रोज का सिलसिला बन गया है,
तड़पता है दिल बेबसी पे मिरा पर
यही इक अदा मेरी सबसे जुदा है, § Read_More....

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