Friday, March 22, 2019
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सम्पादकीय

स्वास्थ्य परिदृश्य में सराहनीय पहल

आम आदमी का ध्यान रखते हुए सरकारों ने अनेकों जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित कीं हैं और की जा रहीं हैं लेकिन मगर ज्यादातर जनप्रतिनिधियों व सरकारी मशीनरी की नीति और नियत साफ ना होने के कारण ज्यादातर योजनाएं ढकोसला व ढाक के तीन पात वाली कहावात को सही साबित करतीं दिखीं हैं। नतीजन इन जनकल्याणकारी योजनाओं ने आम आदमी के बजाय योजनाकारों को ही लाभ पहुंचाया है। अभी स्वास्थ्य के क्षेत्र की ही चर्चा की जाए तो देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इलाज महंगा होने के कारण गरीब आदमी की पहुंच से बहुत दूर है। अनेकों लोग संसाधनों के अभाव में बिना इलाज के ही दम तोड़ जाते हैं। गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए आम आदमी अपना घर-बार, जमीन, जेवर आदि तक बेच डालता है। आम आदमी निजी अस्पतालों में इलाज करवाने में असमर्थ दिखता फिर भी अपना सबकुछ लुटाने पर तुला रहता है। सरकारी अस्पतालों में भरोसा नहीं दिखता और देश की विशाल व विविधता भरी जनसंख्या को सस्ता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बनी रही है।
इस गंभीर समस्या की ओर पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार ने ध्यान दिया। मोदी सरकार ने गरीबों को मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने के लिए ‘आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के रूप में एक क्रांतिकारी पहल की है। बिदित हो कि यह योजना विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है। इस योजना को केंद्रीय कैबिनेट ने 21 मार्च, 2018 को स्वीकृति दी थी और छह माह के भीतर 23 सितंबर, 2018 को यह पूरे देश में लागू कर दी गई। ऐसा कहा गया है कि इस योजना से देश के निर्धन वर्ग के 10 करोड़ से अधिक परिवारों अर्थात् पचास करोड़ की आबादी को प्रतिवर्ष पांच लाख तक का इलाज सरकारी व निजी अस्पतालों में मुफ्त मिलेगा। कहने का मतलब यह है कि इस योजना के तहत हमारे देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या कैशलेस उपचार का लाभ उठाएगी।
इस योजना में 1350 से अधिक बीमारियों को शामिल किया गया है। रोगियों की सुविधा के लिए अस्पतालों में आरोग्य मित्र तैनात किए जा रहे हैं। योजना के अंतर्गत कवर लाभार्थी को पैनल में शामिल किए गए देश के किसी भी सरकारी / निजी अस्पताल में इलाज की अनुमति होगी। आंकड़ों की मानें तो इस योजना के लागू होने के मात्र 100 दिन के भीतर देश भर में 6.85 मरीजों का मुफ्त इलाज किया गया अर्थात प्रभावी क्रियान्वयन अगर किया जायेगा तो इससे देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में गुणात्मक परिवर्तन होगा। सामाजिक असंतुलन को समाप्त कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सकेगा।

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‘कैश लैस’ के साथ साथ ‘कैश से लैस’ होना भी जरूरी

आज इंटरनेट की दुनिया ने जीवन में अमूलचूल परिवर्तन कर दिया है। जिधर देखो उधर कोई मोबाइल में जुटा है तो कोई कम्प्यूटर या लैपटाॅप में मसगूल है। साथ ही हमारे दुनिया की अर्थ व्यवस्था में अगर तुलनात्मक बात करें तो हमारे देश ने भी इस क्षेत्र ने काफी अच्छा स्तर पा लिया है, इसी के चलते हमारे देश की प्रगति का लोहा, पीतल, कांस्य, चांदी और सोना सब माना जा रहा है। लोकलुभावन घोघणाओं के बीच आधारभूत समस्याओं को समझने का प्रयास राजनीतिक डिजिटलीकरण से ईमानदारी करने की डींगे हांकी जा रही हैं। शायद हम सब अब साक्षर हो चुके हैं ! इस पुष्टि के बावजूद लोग खोज में लगे हैं कि वास्तव में कितने मानुष निरक्षर हैं और डिजिटल जिंदगी के तकनीकी पहलुओं से अनजान हैं। साथ ही गर्व की बात यह भी है कि हमारा देश, इंटरनेट प्रयोग के हिसाब से दुनिया में दूसरे नंबर पर है भले ही इंटरनेट की गुणवत्ता व स्पीड के मामले में थोड़ा टांय टांय फिस्स दिखता हो। हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इंटरनेट तो चालू कह सकते ही हैं। भले ही तमाम शिकायतें आती हैं कि अमुक जगह पर सर्वर या सिगनल नहीं मिल रहा है। इसके साथ ही आंकड़ों व रिर्पोटों की मानें तो जिंदगी की मूल सुविधाओं की ओर काफी ध्यान दिया जा रहा है उदाहरण के लिए डिजिटली पुष्टि भी हो चुकी है कि खुले में शौच से सबको मुक्ति मिल गई, पर वस्तुतः कितने परिवार अभी इससे दूर हैं यह तो जमीनी हकीकत देखने पर ही पता चलेगा कि वास्तविकता क्या है?
यह भी कहा गया कि देशवासियों की जिंदगी डिजिटल हो रही है और वो अब कैशलेस जी रहे हैं, यह हमारी असली उपलब्धि है !
डिजिटली युग की बात करें तो सुनने में आया है कि डिजिटल लेनदेन में अपराध भी बढ़ रहे हैं क्योंकि समाचार पत्रों व चैनलों में तमाम ऐसी सुर्खियां आती रहती जिससे पता चलता है कि साइबर अपराधियों ने लोगों की वर्षों में मेहनत से कमाई धनराशि को कुछ ही पलों में ‘पार’ कर दिया। ऐसे में अपराधियों पर सिकंजा कसने में पुलिस भी अपने हांथ उठा रही है उसका कहना है कि समुचित संशाधन उपलब्ध नहीं है अबतक।

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स्वच्छ भारत अभियान को पलीता

स्वच्छता अभियान में वो तेजी नहीं आ पा रही है जितना प्रयास किया जा रहा है। महानगरों के नजारों को देखकर तो यही प्रतीत होता कि स्वच्छता अभियान के बहाने कहीं कहीं तो सिर्फ फोटो खिचाऊ बहाना ही मिल रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘हमें गंदगी और खुले में शौच के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, हमें पुरानी आदतों को बदलना है और महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के वर्ष 2019 तक स्वच्छ भारत का लक्ष्य प्राप्त करना है। हमारे गाँवों में महिलाओं का गौरव एक महत्त्वपूर्ण विषय है…खुले में शौच समाप्त होना चाहिये…शौचालयों का निर्माण होना चाहिये…उनका उपयोग होना चाहिये।’’
गौरतलब हो कि स्वच्छ भारत मिशन का लक्ष्य 2 अक्तूबर, 2019 तक स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्त भारत के लक्ष्य को हासिल करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही शौचालयों के निर्माण में बढ़ोतरी दिनोंदिन की जा रही है और इसका उपयोग करने वालों की संख्या बढ़ी है, लेकिन शौचालय योजना भ्रष्टाचार से अछूत ना रह सकी। कहीं कहीं तो शौचालय बनाकर सिर्फ खाना पूर्ति ही कर ली गई। उनकी गुणवत्ता को पूरी तरह से नकारा गया है। इसमें दो राय नहीं कि पुराने ढर्रे की कार्यशैली के आदी हो चुके अधिकारी इस योजना को खूब पलीता लगा रहे हैं। इस मामले की शिकायतें जब होती हैं तो अधिकारी कार्रवाई के वजाय लीपापोती कर अपनी जेब जरूर भर लेते हैं। इस बन्दरबांट में निचली स्तर से लेकर जिले के आलाधिकारी भी अपनी सहभागिता निभा रहे हैं। खास बात यह भी है कि अधिकारी तो नजरअन्दाजी कर ही रहे हैं सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि भी अपनी आंखें बन्द किए हैं और सबकुछ देखते हुए भी अनदेखा किये हैं।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह हैं कि स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफाॅर्मों का उपयोग किया गया। लेकिन इसे जितनी सफलता मिलनी चाहिए वह नहीं मिलती दिख रही है।

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आतंकियों पर रहम की जरूरत नहीं

रमजान के महीने में मोदी सरकार द्वारा आतंकवादियों के विरूद्ध घोषित एकतरफा सीजफायर से सिर्फ फजीहत ही मोदी सरकार के हांथ लग रही है। जिस तरह से रमजान के महीने में आंतकी घटनायें घटित हो रही हैं और उसको देखते हुए सेना ने भी अपने स्वर मुखर किये है। देश की जनता भी इस कदम को सही नहीं ठहरा रही है। वहीं सेनाधिकारियों की मानें तो एकतरफा सीजफायर की इस घोषणा ने आतंकी गुटों में नई जान फूंकने जैसी बात कही क्योंकि इसका फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब आतंकियों की कमर टूटने की बात कही जा रही है। अतीत पर अगर नजर डालें तो रमजान के अवसर पर कश्मीर में पहली बार सीजफायर की घोषणा भी भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार के मुखिया तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। उनका मकसद था कि कश्मीर में शांति रहे लेकिन उनका यह प्रयास औंधे मुंह गिरा था। दुखद पहलू पहले चरण के सीजफायर का यह था कि जिस आम कश्मीरी जनता को राहत पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने सीजफायर की घोषणा की थी उन्हीं को सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ा था। अगले चरणों में भी नागरिकों को कोई राहत नहीं मिली थी क्योंकि आतंकियों के निशाने पर सुरक्षा बलों के साथ साथ नागरिक रहे थे। इतना जरूर था कि सुरक्षा बलों ने आतंकी हमलों पर जवाबी कार्रवाई करते हुए वर्ष 2000 के सीजफायर के चार चरणों के दौरान लगभग तीन सैकड़ा आतंकियों को ढेर कर दिया था। लेकिन इन कामयाबियों के लिए सुरक्षा बलों को भी लगभग दो सौ जवानों व अधिकारियों की शहादत देनी पड़ी थी और तकरीबन साढ़े तीन सैकड़ा नागरिक भी इस दौरान मारे गए थे। यह भी सामने आया था कि आतंकी गुटों ने वर्ष 2000 के रमजान सीजफायर के दौरान अपने आपको अच्छी तरह से मजबूत कर लिया था और यह मजबूती सीजफायर की समाप्ति के बाद के कई महीनों के दौरान होने वाले हमलों और मौतों से स्पष्ट होती रही थी।
यह कहना कदापि अनुचित नहीं कि तत्कालीन परिस्थितियों में सुरक्षा बलों ने सीजफायर से बहुत से सबक सीखे थे लेकिन देश के राजनीतिज्ञों ने कुछ नहीं सीखा था शायद। वर्तमान में जो आदेश दिया गया है उससे तो यही जाहिर होता है कि देश के राजनीतिज्ञों ने ऐसे समय में पुनः सीजफायर लागू करवाने में कामयाबी पाई है जबकि सेना के आॅपरेशन आल आउट ने आतंकियों की कमर को तोड़ दिया है। बचे खुचे आतंकियों को उनकी मांद से निकाल मारने का जो सिलसिला तेजी पकड़ पकड़ रहा है अब उस पर ब्रेक लगा दिया गया लेकिन यही कारण है कि देश की सेना समेत अन्य सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने इस सीजफायर का विरोध करना आरंभ किया है और आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात सामने आ रही है।

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क्यों नहीं थम रहा हादसों का दौर?

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली और उन्हें कभी ना भूलने वाला गम दे दिया। साथ ही उन लोगों के दिलो दिमाग पर उन तसवीरों ने अपनी अमिट छाप छोड़ दी होगी जो उस हादसे के दौरान काल के गाल में समाने से बच गए। हादसा जो हुआ उस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए बल्कि उस पर गहनता से विचार-विमर्श होना चाहिए कि जो दुर्घटना हुई उसके लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है ? साथ ही वाराणसी के अलावा लखनऊ, कानपुर महानगर सहित अन्य तमाम जगहों में भी ऐसे निर्माणाधीन अनेक पुलों से लोग आज भी गुजर रहे हैं। इतना ही नहीं हर कहीं खुले में निर्माणकार्य चल रहा है। इस दौरान धूल व गर्द सबओर उड़ती देखी जा सकती है। साथ ही उनके नीचे से लोग चल रहे देखे जा सकते हैं और ऊपर काम चल रहा होता है। इससे सवाल यह उठता है कि निर्माणाधीन स्थानों पर किसी प्रकार की सुरक्षा क्यों नहीं होती? आखिर इन जिम्मेदार लोगो को दुर्घटना से पहले क्यों नहीं दिखता कुछ? इतना बड़ा हादसा घटित होने के बावजूद अभी भी तमाम निर्माणाधीन स्थलों पर न तो सुरक्षा के मानकों का पालन हो रहा है, न ही आम आदमी की जान की परवाह। यह कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि रिश्वत और भ्रष्टाचार ने सभी को किनारे लगा दिया है।
यह सवाल भी जेहन में आता है कि जिस एमडी को अखिलेश यादव की सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया था, उसी एमडी को भाजपा की सरकार में फिर एमडी क्यों बनाया गया? घटित हादसों पर हो हल्ला तो बहुत मचता है लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि जब दुर्घटनायें घटित होती हैं तो निचले स्तर के कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है लेकिन उच्च स्तर वाले अधिकारी मलाई खाते रहते हैं। वहीं यह भी देखने को मिला है कि शायद ही कोई हादसा ऐसा रहा हो जिसमे कोई बड़ी कार्रवाई हुई हो और कभी किसी को कोई बड़ी सजा दी गई हो।

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बिजली का मसला

आज हर क्षेत्र में बिजली का दायरा व महत्व बहुत बढ़ गया है। ऐसे हालात बन चुके हैं कि चाहे ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी दोनों को बिजली की आवश्यकता है। बिजली का उत्पादन होने के बाद जितना उपयोग हो रहा है लगभग उसी अनुपात में दुरुपयोग भी किया जा रहा है। लेकिन बिजली बनाने को लेकर और बचाने को लेकर समाज को जितना आगे आना चाहिए और बिजली के क्षेत्र में कोशिश करनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई। आज वो लोग जो बिजली को चोरी छिपे उपयोग में ला रहे हैं और उन्हें उसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ रही है वास्तव में वो लोग बिजली का दुरुपयोग कहीं ज्यादा कर रहे हैं। लोगों को समझना चाहिए कि जिस तरह से अचानक बिजली जाते ही हर घर के लोग अपने अपने घरों में उजाला करने की कोशिश अपने अपने हिसाब से करते हैं ठीक उसी तरह से हमें कारोबारों व घरों में भी बिजली बचाने की ओर सोंचना चाहिए और छोटी छोटी परियोजनाएं लगाकर बिजली का उत्पादन करने के बारे में प्रयास करना चाहिए। इससे सरकार के प्रयासों को काफी मदद मिलेगी। उप्र में पिछली सरकार ने भी बिजली के उत्पादन की ओर काफी प्रयास किए और वर्तमान सरकार भी इस ओर कार्य कर रही है।
हकीकत यह है कि घरों में, दफ्तरों में और औद्यौगिक क्षेत्रों बिजली की खपत बढ़ती ही जा रही है। साथ ही अब तो ग्रामीण क्षेत्रों में घरों में उपयोग के अलावा कृषिकार्य में भी बिजली का महत्व दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। फसलों की सिचाई का एक बेहतर विकल्प भी बिजली बनती जा रही है। लेकिन यह सच है कि शहरों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों में जितनी बिजली की जरूरत है उतनी नहीं हो पा रही है इस लिए बिजली उत्पादन व उसके सदुपयोग पर हम सबको ध्यान देने की जरूरत है।
समय समय पर बिजली उत्पादन के कई उपायों पर कार्य किया गया लेकिन वो सफल नहीं दिखे जैसे कूड़े कचरे से बिजली उत्पादन का कार्य प्रभावी तरीके से सफल नहीं हो पाया। लेकिन सौर्य ऊर्जा सफल होती दिख रही है और लोग इस ओर रुचि भी ले रहे हैं। वहीं बिजली बचाने के लिए आधुनिक यन्त्रों का उपयोग भी काफी कारगर साबित हो रहा है लेकिन खास बात यह है जो लोग अवैध रूप से बिजली का संयोजन किए हैं वो लोग बिजली का दुरूपयोग ज्यादा कर रहे हैं और सरकारी मशीनरी इसे रोकने में सिर्फ खानापूर्ति करती दिखती है। इससे वैध उपभोक्ताओं को बिजली की ज्यादा कीमत अदा करनी पड़ रही है। इस ओर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है ताकि ईमानदार लोगों को अपनी जेब ना ढीली करनी पड़े।

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दिनों दिन बढ़ता प्रदूषणः चिन्ता का विषय

पर्यावरण में दिनों दिन बढ़ता प्रदूषण अब हर एक के लिए चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। पर्यावरण में असन्तुलन का ही नतीजा कहा जा सकता है कि असमय बारिस, सूखा पड़ना, हिम स्खलन, भू-कम्पन आदि जनजीवन को प्रभावित कर रहे हैं। तमाम तरह की बीमारियां भी अपने पैर पसार रहीं हैं और तन व धन दोनों को क्षतिग्रस्त कर रहीं हैं। नतीजन पिछले दो दशको में पर्यावरण ने नीति निर्माताओं वैज्ञानिकों और विश्व के अनेक देशों में आम आदमी का ध्यान आकर्षित किया है। सूखा, ईंधन की कमी, जलाने की लकड़ी और चारा, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, रासायनिकों के प्रयोग से मृदा प्रदूषण और विकिरणों की भयावह समस्या, प्राकृतिक संसाधनों, वन्य जीवन का लुप्त होना एवं वनस्पति तथा जीव-जंतुओं को खतरे जैसे मुद्दों के प्रति अधिक सतर्क होते जा रहे हैं। लोग अब वायु, जल, मृदा और पौधों जैसे प्राकृतिक ससाधनों की रक्षा करने की आवश्यकता के प्रति सजग दिखाई देने लगे हैं ।
वास्तव में पर्यावरणीय मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके समाधान के बिना स्थिति बहुत भयावह हो सकती है। यदि समय रहते पर्यावरणीय समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया गया और उनको हल नहीं किया गया तो यह पृथ्वी भावी पीढ़ी के रहने योग्य नहीं रहेगी। इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भविष्य को संभव बनाने के लिए पर्यावरण की रक्षा एवं बचाव करना अनिवार्य है और इस कार्य में जन जन की भागेदारी की जरूरत है। हां वास्तव में मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ गई है और उनके अनुरूप पर्यावरण में परिवर्तन किए जा रहे है। फिर भी पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति अनदेखी उचित नहीं कही जा सकती है। विशेष रूप से जब बढ़ती जनसंख्या और प्रौद्योगिकी का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। आज अक्षय विकास तथा परिवर्तनशील पर्यावरण के सुधार एवं संरक्षण की आवश्यकता है।

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सरकार को गुमराह करते अधिकारी

देश या प्रदेश सभी सरकारों को अधिकारी गुमराह तो कर ही रहे हैं, साथ ही आमजन का दर्द अनदेखा कर सीएम व पीएम के सपनों को पलीता लगा रहे हैं। इसकी पुष्टि उत्तर प्रदेश में की जा सकती है। देश के पीएम ने देश की जनता की समस्याओं को सुनने व उनका निस्तारण करने के लिए पोर्टल चालू किया जिससे कि लोग अपनी शिकायतों को आॅन लाइन दर्ज करवा सकें और उनका निस्तारण उन्हें घर बैठे प्राप्त हो जाये लेकिन यह कटु सत्य है कि आम जन की ज्यादातर शिकायतों का निस्तारण गुणवत्तापरक नहीं किया जा रहा है। कमोवेश यहीं हाल उत्तर प्रदेश के सीएम पोर्टल/आईजीआरएस पोर्टल का है जिसमें आम जन शिकायतें तो खूब दर्ज करवा रहे और अपनी समस्या का निस्तारण होने का इन्तजार करते रहते हैं। लेकिन आमजन को निराशा उस समय हांथ लगती है जब उसकी शिकायत का निस्तारण करने के नाम पर जांच करने वाला अधिकारी खाना पूर्ति कर अपनी जादुई कलम से उच्चाधिकारियों को गुमराह कर देते हैं और भ्रष्टाचारियों को बचा रहे हैं। यही हाल लगभग हर विभाग का है। वहीं खास बात यह भी है कि जिस अधिकारी की शिकायत की जाती है, जांच भी उसी अधिकारी को सौंपी जाती है जिससे साफ जाहिर होता है कि शिकायत कर्ता की समस्या को तो नजरअन्दाज किया ही जा रहा है साथ ही सरकार को भी गुमराह किया जा रहा है। आॅन लाइन शिकायतों का गुणवत्तापरक हल ना होना जहां एक ओर आम आदमी को निराश तो कर ही रहा है साथ ही दूसरी ओर सरकारों के प्रति नाराजगी भी आमजन के मन में बढ़ाने का कार्य भी स्थानीय अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है। शिकायतों के निस्तारण सम्बन्धी आख्याओं को देख कर यह कहना कदापि अनुचित नहीं है कि जांच करने के नाम पर सरकार को गुमराह किया जा रहा है।

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अस्मिता की लड़ाई कोरे गांव

कोरे गांव में बिगत दिनों घटित बवण्डर को लेकर पूरे देश की मीडिया ने इस घटना को जिस तरह से पेश करने की कोशिश की है उसमें राजनीति ‘बू’ पैदा होने की अपार सम्भावनाएं पनप गईं। जबकि उस पर वर्तमान में विचार करने की जरूरत है कि तत्कालीन ऐसा वातावरण क्यों पनप गया कि महार जाति के योद्धाओं को विदेशियों का साथ देना पड़ा? ऐसे लोगों को न्यूज रूम में स्थान दे दिया गया जिन्हें शायद कोरेगांव का इतिहास ही ना मालूम हो। हां इतना तो जरूर है कि वो मीडिया के माध्यम में समाज में जहर उगलने का कार्य कर सकते हैं। जबकि एक कटु सच्चाई 1818 का घटनाक्रम बयां करता है कि कोरेगांव का वह युद्ध देश विरोधी कृत्यों को नहीं बल्कि एक अस्मिता की लड़ाई को बयां करता है। विचारणीय तथ्य यह है कि ऐसे हालात क्यों पनपने दिए गए थे कि अपनो को अपनों के विरुद्ध युद्ध लड़ना पड़ा था। अतीत पर नजर डालेे तो कोरेगांव का युद्ध उन पाॅच सौ महार दलित योद्धाओं की बहादुरी को व्यक्त करता है जिन्होंने बाजी राव पेशवा के अट्ठाईस हजार सैेनिकों को युद्ध में छक्के छुड़ा दिये थे। उस घटनाक्रम को इस नजरिये से देखा जाना उचित है कि आज हीं बल्कि उस समय भी अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले बहादुरों की कमी नहीं थी।
गौरतलब हो कि 19वीं सदी में भारत की दलित जातियों में शुमार महारों पर कानून लागू किया था जिसमें महारों को कमर पर झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके दूषित और अपवित्र पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक मटका भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई उच्चवर्णीय प्रदूषित और अपवित्र न हो जाए। असहनीय यातनाओं व तत्कालीन नियमावली से महार उकता गए थे। और ऐसा उकताना किसी के लिए आज भी संभव है जिसका जीना बद से बदतर कर दिया जाये चाहे फिर वह महार हो या अन्य कोई भी वर्ग या सम्प्रदाय। इसीलिए तत्कालीन व्यवस्था में अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के साथ हो गए थे। एक तरफ ब्रिटिश अधिकारियों की नजर महारों पर टिकी थी जो कद काठी में अच्छे खासे थे।

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निर्वाचन आयोग कुत्ते की दुम !

यूपी में निकाय चुनाव का दौर चल रहा है। इस दौरान कहीं ईवीएम मशीन में गड़बड़ी तो कहीं लोगों के नाम मतदान सूची से गायब होने की तमाम खबरें आई। आलम यह देखने को मिल रहा है कि शेषजन (आम नागरिक) ही नहीं बल्कि वीआईपी यानीकि विशेष जनों तक के नाम मतदाता सूची में गायब होने की खबरें मिलीं। मतदाता सूची से सांसद, मंत्री, मेयर तक के नाम गायब मिले। पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा देवरिया से बीजेपी सांसद कलराज मिश्र, साक्षी महाराज, उन्नाव जिले की चर्चित नेता अन्नू टंडन, सपानेता चो. सुखराम सिंह के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया सुलखान सिंह का नाम मतदाता सूची से गायब मिलने की बात कही गई। इनके साथ ही वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक रहे वीरभद्र निषाद का नाम भी मतदाता सूची में शामिल नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि सालदर साल चुनाव सम्पन्न कराने का जिम्मेदार आयोग यानि की निर्वाचन आयोग ‘कुत्ते की दुम’ क्यों बना हुआ है? लोकतन्त्र के महाकुम्भ में ऐसा कोई चुनाव सम्पन्न नहीं हो पाया है जिसमें हजारों मतदाताओं से उनका अधिकार छिन नहीं गया हो।
मतदाता सूची की गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए आयोग द्वारा जारी किए गए तमाम दिशा निर्देशों की अवहेलना होती देखी जा सकती है, इसी लिए जब भी चुनाव का वक्त आता है तो ऐसा दिखता है कि चुनाव आयोग उस बूढ़े कुत्ते के जैसा ही दिखेगा जो दांत रहित होता है और वह सिर्फ भौंक सकता है लेकिन काट नहीं सकता है। नतीजन तमाम दिशा निर्देशों के बावजूद सभी दलों के प्रत्याशी आचार संहिता का उल्लंघन करने से जरा भी हिचकिचाते हैं वहीं चुनाव को सम्पन्न कराने में जुटी सरकारी मशीनरी भी लापरवाही करने से नहीं चूकती।

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