♦ हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर वर्धा में राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
♦ पत्रकारिता में संवेदना, लोककल्याण और राष्ट्रीय चेतना को बताया गया जरूरी
वर्धा। पत्रकारिता का वास्तविक धर्म सत्ता या विपक्ष के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि जनता के हितों और सरोकारों को प्राथमिकता देना है। पत्रकारिता न पक्ष है और न विपक्ष, बल्कि उसका असली स्वरूप जनपक्ष है। यह विचार सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक एवं पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में व्यक्त किए।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जनसंचार विभाग की ओर से बुधवार, 4 नवंबर को ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष: विरासत, सरोकार और विकसित भारत का संकल्प’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कस्तूरबा सभागार में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बलदेवभाई शर्मा सारस्वत अतिथि तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति प्रो. मनोज दयाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सुरेन्द्र गादेवार भी मंचासीन रहे।
पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास और मुद्रित माध्यमों की विकास यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में भाषा, अभिव्यक्ति, शैली और कौशल की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण है। युगल किशोर शुक्ल, भारतेंदु हरिश्चंद्र और बाबूराव पराड़कर जैसे पत्रकारों के योगदान को हिंदी पत्रकारिता की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत बताते हुए उन्होंने पत्रकारिता की विभिन्न परंपराओं का स्मरण किया।
मुख्य अतिथि प्रो. मनोज दयाल ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि आज पत्रकारिता में अर्थशास्त्र के सिद्धांत हावी होते जा रहे हैं और उससे संवेदनाएं तथा भावनाएं लुप्त हो रही हैं। समाचार की परिभाषा भी पश्चिम से ली गई है, जिसे भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप देखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संवेदना और भावनाएं पत्रकारिता के केंद्र में होनी चाहिए। साथ ही हिंदी समाचार पत्रों का डिजिटल संग्रहालय स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा।
प्रो. बलदेवभाई शर्मा ने कहा कि भारतीय हिंदी पत्रकारिता का 200 वर्षों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है, लेकिन स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के इतिहास को पत्रकारों और विद्यार्थियों को पर्याप्त रूप से नहीं पढ़ाया गया। उन्होंने पत्रकारिता के इतिहास के अध्ययन और अध्यापन पर जोर देते हुए कहा कि इससे केवल मीडिया पर्सन नहीं, बल्कि वास्तविक पत्रकार तैयार होंगे। पत्रकार का दायित्व सरकार हो या समाज, हर स्तर पर गलत का विरोध करना है। लोककल्याण और राष्ट्रीय चेतना को पत्रकारिता के प्रमुख स्तंभ बताते हुए उन्होंने आत्मचिंतन का संदेश दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास औपनिवेशिक दासता से मुक्ति और संघर्ष की गाथा है। स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता एक प्रमुख हथियार बनी थी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन और संरक्षण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पत्रकारिता पर है।
कार्यक्रम में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. के. बालराजु ने स्वागत वक्तव्य दिया। जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश लेहकपुरे ने संगोष्ठी का प्रास्ताविक प्रस्तुत किया। संचालन सहायक प्रोफेसर डॉ. रेणु सिंह ने किया तथा डॉ. संदीप कुमार वर्मा ने आभार व्यक्त किया।
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