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ग़ज़ल आग में मुफलिसी….

ऐनुल बरौलवी

आग में मुफलिसी की हम जलते रहे
और दर्दे जिगर से बिलखते रहे
चाक दामन किए जो थे अपने सभी
रोज उनकी जो नजरों में खलते रहे
जिन्दगी का भयानक बुरा वक्त था
बेबसी में फिसलते सँभलते रहे
बेवफा है जमाना नहीं काम का
जो थे अपने वो नजरें बदलते रहे
गैर से है गिला और शिकवा नहीं
क्या कहें रोज अपने ही छलते रहे
वक्त की आँधियाँ ले उड़ी सब खुशी
गम की राहों में हम रोज चलते रहे
आँसुओं की नदी मेरी आँखों में थी
खार चुभते रहे फूल हँसते रहे
मुश्किलें जिन्दगी की नहीं कम हुईं
शम्अ की तरहा श्ऐनुलश् पिघलते रहे
ऐनुल बरौलवी