Friday, October 19, 2018
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’एक टुकड़ा आज’ से

शक से देखी गयी भूमिका हर कदम।
ढूँढते जो रहे फायदा हर कदम।
बावफा से रखो राबिता हर कदम।
बेवफा को करो अनसुना हर कदम।
साथ उसके रहो साथ उसके चलो,
जो रहे हम कदम आपका हर कदम।
जिन्दगी के लिये जिन्दगी भर करो,
खूब हालात का सामना हर कदम।
हर कदम पर मिली कामयाबी उसे,
जो बना कर चला योजना हर कदम।
पा सका वो नहीं अपनी मंजिल कभी,
ठिठकता जो रहा काफिला हर कदम।
इस कदर डर गया आज हालात से,
ढूंढता फिर रहा आसरा हर कदम।
दिग्विजय हम उसे किस तरह से कहें,
है जिसे संघ का फोबिया हर कदम।
हमीद कानपुरी