Friday, April 26, 2019
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स्वास्थ्य परिदृश्य में सराहनीय पहल

आम आदमी का ध्यान रखते हुए सरकारों ने अनेकों जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित कीं हैं और की जा रहीं हैं लेकिन मगर ज्यादातर जनप्रतिनिधियों व सरकारी मशीनरी की नीति और नियत साफ ना होने के कारण ज्यादातर योजनाएं ढकोसला व ढाक के तीन पात वाली कहावात को सही साबित करतीं दिखीं हैं। नतीजन इन जनकल्याणकारी योजनाओं ने आम आदमी के बजाय योजनाकारों को ही लाभ पहुंचाया है। अभी स्वास्थ्य के क्षेत्र की ही चर्चा की जाए तो देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इलाज महंगा होने के कारण गरीब आदमी की पहुंच से बहुत दूर है। अनेकों लोग संसाधनों के अभाव में बिना इलाज के ही दम तोड़ जाते हैं। गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए आम आदमी अपना घर-बार, जमीन, जेवर आदि तक बेच डालता है। आम आदमी निजी अस्पतालों में इलाज करवाने में असमर्थ दिखता फिर भी अपना सबकुछ लुटाने पर तुला रहता है। सरकारी अस्पतालों में भरोसा नहीं दिखता और देश की विशाल व विविधता भरी जनसंख्या को सस्ता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बनी रही है।
इस गंभीर समस्या की ओर पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार ने ध्यान दिया। मोदी सरकार ने गरीबों को मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने के लिए ‘आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के रूप में एक क्रांतिकारी पहल की है। बिदित हो कि यह योजना विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है। इस योजना को केंद्रीय कैबिनेट ने 21 मार्च, 2018 को स्वीकृति दी थी और छह माह के भीतर 23 सितंबर, 2018 को यह पूरे देश में लागू कर दी गई। ऐसा कहा गया है कि इस योजना से देश के निर्धन वर्ग के 10 करोड़ से अधिक परिवारों अर्थात् पचास करोड़ की आबादी को प्रतिवर्ष पांच लाख तक का इलाज सरकारी व निजी अस्पतालों में मुफ्त मिलेगा। कहने का मतलब यह है कि इस योजना के तहत हमारे देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या कैशलेस उपचार का लाभ उठाएगी।
इस योजना में 1350 से अधिक बीमारियों को शामिल किया गया है। रोगियों की सुविधा के लिए अस्पतालों में आरोग्य मित्र तैनात किए जा रहे हैं। योजना के अंतर्गत कवर लाभार्थी को पैनल में शामिल किए गए देश के किसी भी सरकारी / निजी अस्पताल में इलाज की अनुमति होगी। आंकड़ों की मानें तो इस योजना के लागू होने के मात्र 100 दिन के भीतर देश भर में 6.85 मरीजों का मुफ्त इलाज किया गया अर्थात प्रभावी क्रियान्वयन अगर किया जायेगा तो इससे देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में गुणात्मक परिवर्तन होगा। सामाजिक असंतुलन को समाप्त कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सकेगा। बहरहाल, राजनीतिक आलोचना-प्रत्यालोचना को छोड़ दिया जाए तो किसी के लिए भी यह नकारना कठिन होगा कि इस योजना ने अपने समकालीनों के समक्ष एक लंबी लकीर खींच दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सबके लिए स्वास्थ्य बीमा के रूप में यह योजना एक नए परिवर्तन का कारक बनेगा। हालांकि सरकारी अस्पतालों के हालात अभी भी किसी से छिपे नहीं और उनके हालातों पर ध्यान देने की जरूरत है।