Wednesday, October 17, 2018
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अस्मिता की लड़ाई कोरे गांव

कोरे गांव में बिगत दिनों घटित बवण्डर को लेकर पूरे देश की मीडिया ने इस घटना को जिस तरह से पेश करने की कोशिश की है उसमें राजनीति ‘बू’ पैदा होने की अपार सम्भावनाएं पनप गईं। जबकि उस पर वर्तमान में विचार करने की जरूरत है कि तत्कालीन ऐसा वातावरण क्यों पनप गया कि महार जाति के योद्धाओं को विदेशियों का साथ देना पड़ा? ऐसे लोगों को न्यूज रूम में स्थान दे दिया गया जिन्हें शायद कोरेगांव का इतिहास ही ना मालूम हो। हां इतना तो जरूर है कि वो मीडिया के माध्यम में समाज में जहर उगलने का कार्य कर सकते हैं। जबकि एक कटु सच्चाई 1818 का घटनाक्रम बयां करता है कि कोरेगांव का वह युद्ध देश विरोधी कृत्यों को नहीं बल्कि एक अस्मिता की लड़ाई को बयां करता है। विचारणीय तथ्य यह है कि ऐसे हालात क्यों पनपने दिए गए थे कि अपनो को अपनों के विरुद्ध युद्ध लड़ना पड़ा था। अतीत पर नजर डालेे तो कोरेगांव का युद्ध उन पाॅच सौ महार दलित योद्धाओं की बहादुरी को व्यक्त करता है जिन्होंने बाजी राव पेशवा के अट्ठाईस हजार सैेनिकों को युद्ध में छक्के छुड़ा दिये थे। उस घटनाक्रम को इस नजरिये से देखा जाना उचित है कि आज हीं बल्कि उस समय भी अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले बहादुरों की कमी नहीं थी।
गौरतलब हो कि 19वीं सदी में भारत की दलित जातियों में शुमार महारों पर कानून लागू किया था जिसमें महारों को कमर पर झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके दूषित और अपवित्र पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक मटका भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई उच्चवर्णीय प्रदूषित और अपवित्र न हो जाए। असहनीय यातनाओं व तत्कालीन नियमावली से महार उकता गए थे। और ऐसा उकताना किसी के लिए आज भी संभव है जिसका जीना बद से बदतर कर दिया जाये चाहे फिर वह महार हो या अन्य कोई भी वर्ग या सम्प्रदाय। इसीलिए तत्कालीन व्यवस्था में अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के साथ हो गए थे। एक तरफ ब्रिटिश अधिकारियों की नजर महारों पर टिकी थी जो कद काठी में अच्छे खासे थे। नतीजन अंग्रेजों ने अपनी सेना में महारों के लिए दरबाजे खोल दिए क्योंकि अंग्रेजों को पेशवाओं का राज खत्मकर अपना राज कायम करना था। तत्कालीन चर्चाओं पर अगर नजर डालें तो अंग्रेजी सेना द्वारा पेशवाओं पर आक्रमण की तैयारी शुरू हो चुकी थी और यह खबर महारों के मुखिया सिद्धनाथ तक पहुॅची तो सिद्धनाथ, बाजीराव पेशवा से मिलने पहुंच गए और पेशवा से कहा था कि अगर हम आपकी ओर से लड़कर अंग्रेजों को यहां से भगा दें तो हमें राज्य में और सेना में स्थान क्या मिलेगा? यह सुन पेशवा ने सिद्धनाथ को जवाब देते हुए कहा कि सुई की नोक के बराबर भी स्थान तुम महारों के लिए हमारे पास नहीं है। तुम लोग हमारे पैरों की धूल के समान हो और वही रहोगे। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि ऐसा जवाब पाकर शान्त रहने वाले भी कायर ही कहलाते लेकिन ऐसा नहीं हुआ था और महारों ने अपनी बहादुरी पेशकर देश विरोधी नहीं अपितु अपनी अस्मिता को बचाने का उदाहरण पेश किया था। किसी भी नजरिये से अपने न्याय व हक के लिए युद्ध लड़ना गलत नहीं कहा जा सकता है। आज भी न्याय और हक की लड़ाई के तमाम उदाहरण सामने आ रहे हैं और माननीय न्यायालयों की शरण लेकर अपने हक की लड़ाइयां लड़ी जा रहीं हैं, बिल पेश किए जा रहे हैं। ऐसे में तत्कालीन घटित कोरे गांव के युद्ध को देश विरोधी नहीं बल्कि अस्मिता की लड़ाई कहना उचित है।