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केवल वयस्कों के लिएः होली आ रही है

एक महोदय ने कहा होली आ रही है कुछ लिखिए। चलो भाई निराश नहीं करता लिखे देता हूं । लेख लिखने से पहले एक खुलासा करना जरूरी है। मेरे सिर के लम्बे बाल, लम्बी दाढ़ी-मूंछ देखकर कहीं आप इस भ्रम में न पड़ जायें कि मैं सन्त हूॅं , महन्थ हूॅं। मैं सोलहों आने या यों कहें कि सौ टन्च (शुद्ध) गृहस्थ हूॅं-वशिष्ठ की तरह, अत्रि जी की तरह, गौतम ऋषि की तरह। मैं यकीन भी इसी में करता हूॅं -सन्त, महन्थ का जीवन जिया जाये किन्तु जीवन संगिनी को साथ रखकर। मैं महन्थ की गद्दी सम्हाल और चिकनी-चिकनी शिष्याओं को परदे के पीछे बुलाऊं यह मेरे वश में नहीं। मैं गृहस्थ सन्त हूॅं ,महन्थ हूॅं। नाती-पोतों-परपोतों से हरे भरे परिवार वाला सन्त-महन्थ हूॅं। मेरा यह लेख इसी टाइप के गृहस्थ द्वारा लिखा गया लेख है।
मेरे इस लेख पर लेखक संघ का यह निर्णय कि यह लेख केवल वयस्कों के लिए है, कोई मायने नहीं रखता। फिल्म में अवयस्क ताक-झांक करते हैं इस लेख में भी ताक-झांक करेंगे, तो फिर ‘‘केवल वयस्कों के लिए’’ प्रमाणपत्र जारी करने की फार्मेलिटी वृथा है। अब तो इन्टरनेट का जमाना है, सबके लिए सब उपलब्ध है। यहां तक कि पे्रक्टिकल भी। बढ़ती आयु के साथ जो मीठा-मीठा दर्द आटोमेटिक बढ़ता था, सब कुछ आटोमेटिक होता था। कुछ पढ़ने पढ़ाने की आवश्यकता नहीं थी, उस स्व-उत्पन्न सेक्स को अब पाठ्यक्रमी कर दिया गया है। अब स्कूलों में सेक्स शिक्षा के बिना शिक्षा अधूरी है, ऐसा उन्नतिशील चिन्तक मानते हैं। ये उन्नतिशील चिन्तक, चिन्तक कम राजनेता अधिक हैं ,उस पर भी पाश्चात्य संस्कृति से सराबोर। मतलब करेला उस पर भी नीम चढ़ा। भला हो हमारे पूर्वजों का जिन्होंने बिना सेक्स शिक्षा के आटोमेटिक उत्पन्न मीठे मीठे दर्द के साथ स्वस्थ रहे-सण्ड मुसण्ड रहे और स्वस्थ सण्ड मुसण्ड सन्तानें पैदा की। अब शायद सरकार-सरकारें ऐसा नहीं मानती। उन्हें लगता है कि बिना पढ़ाई लिखाई के आटोमेटिक उपजने वाला मीठा दर्द बिना प्रेक्टिकल शिक्षा के किसी काम का नहीं। अब तो सरकार-सरकारें सभी प्रकार के सेक्स जायज करने पर तुली हैं जिसमें समलैंगिकता को मान्यता देना भी एक है।
स्कूलों में सेक्स शिक्षा दी जाती है। स्वाभाविक है, छात्र-छात्राओं का मन डोलेगा, अध्यापक-अध्यापिकाओं का मन डोलेगा। चंचल मन बाॅंध तोड़ेगा, बाॅंध तोड़कर बहेगा। उस आवेग को कौन रोक पाया है, कौन रोक पायेगा ? इससे तो ऋषि-मुनि भी परेशान रहे हैं। परमिट-शुदा रम्भा, उर्वशी, मेनका आदि तो अब हैं नहीं कि सब्र का बाॅंध उनके आगोश में टूटे। जो रम्भा, उर्वशी, मेनका इसका उपचार थीं आजकल इसे समाज का कलंक माना जाता है, समाज कितना भी कलंकित होता रहे किन्तु यह कलंक समाज को स्वीकार नहीं। पेट की भूख मिटाने को भोजन चाहिए। पेट के नीचे की भूख मिटाने के लिए विलोम शरीर चाहिए। इन दोनों के आवेग को रोकने से मानसिक विक्षिप्तता तो होगी ही। ये प्राकृतिक चर्याओं से सम्बंधित जरूरतें हैं।
पहले हम (छात्र-छात्रायें) महाकवि बिहारी के दोहे पढ़ते पढ़ते डोल जाते थे। व्याख्याता-व्याख्यातायें भी डोलते थे। महाकवि बिहारी दिलोदिमाग पर छा जाते थे-वे अपना काम कर जाते थे और गाहे बगाहे श्रृंगार काण्ड भी हो जाते थे। गुरू और शिष्या, गुरूआइन और शिष्य में बहुत से श्रृंगार काण्ड होते हमने देखे हैं।
कुत्ते और कुतियायें (क्षमा कीजिए, आजकल इनका प्रयोग आदमजातों के लिए होने लगा है, इसलिए कुक्कुर और उनकी पे्रमिकाएं कुक्करियां कहना उचित है।) जब गली में काम-क्रीड़ा करते दिख जाते हैं तब बिना कैलेण्डर देखे ही पता चल जाता है कि भादों और क्वांर का महीना चल रहा है किन्तु आदमजात के लिए तो बारहों महीने, तीसों दिन, चैबीसों घण्टे भादों और क्वांर रहता है। कोई स्थान, समय, आयु नियत नहीं है। शायद नियति की भी यह नियत करने की नियत नहीं थी। आदमजात के तूतक-तूतक तूतिया पर कोई लगाम नहीं है, कोई बन्धन नहीं है। आदमजात तो दिल्ली जैसे शहर में भी बाकायदे बसों, कारों में पूरी सड़के नापते हुए तूतक तूतक तूतिया करता है। जाये भी तो कहाॅं जाये। जिस ठिकाने में भी जाता है पुलिस छापा मारती है। लाइसेन्स शुदा उर्वशियां होतीं तो शायद अपनी ऐंठती नसों को वहां जाकर ढीला करता। नसें ऐंठती हैं किन्तु 21 साल की आयु के पहले वह विवाह भी नहीं कर सकता। वर्ण शंकरता बढ़े सो बढे, सामाजिक सरोकार से सरकार को कोई सरोकार नहीं। शरीर की प्राकृतिक जरूरतों से सरकार को क्या मतलब, उसे तो बस कानून बनाते रहना है। प्राकृतिक क्रियाएं कोई सरकारी कानून नहीं मानतीं, यह सब उसके ठेंगे से।
एक दिन झारखण्ड से मेरे बहुत पुराने परिचित का फोन आया कि अब उनका लड़का पूरी तरह सेटल हो गया है किसी कम्पनी में मैनेजर है उसके लिए योग्य बधू चाहिए। मैंने उसकी आयु पूछा तो उनने कहा कि वह अपना कैरियर बनाने में लगा रहा, विवाह की तरफ ध्यान नहीं दिया, अब चालीस साल का हो गया है। यह सब जानकर मुझे चक्कर आ गया। मैं जब चालीस साल का था तब मेरा बड़ा बेटा अठारह साल का हो चुका था। मेरे इस परिचित का बेटा अपने तन की उमड़ती घुमड़ती नसों को कैसे समझाता रहा होगा-मर्यादा की बात करना बेमानी है। अर्थ के महत्व में बहुत से अनर्थ हो रहे हैं। शारीरिक पवित्रता की बात करना तो आज के समय सरासर गलत है। विवाह के सम्बंध में मुझे एक मध्यकालीन कवि की यह कविता याद आ गई–
ब्याह की चाह उठे मन मांहिं तो पन्द्रह, बीस, पचीस लौ कीजे।
तीस भये जब खीस भये तब चालिस, पचास में नाम न लीजे।।
पचपना में न करिए बचपना, साठ में खाट कुलांच न लीजे।
समझाइश से गर माने नहीं मन, उठाकर पाथर कपाल में दीजे।।
तो मेरे प्रिय महोदय यदि आप कहें कि आपकी लड़की तीस साल की हो गई है, पैंतीस साल, चालीस की हो गई, अभी कुवारी है, या आपका लड़का पैंतीस, चालीस साल का हो गया है अभी कुवांरा है इनके लिए वर-बधू की तलाश कीजिए तो मैं इस कुवारी, कुवांरा थप्पे के साथ बर-बधू ढॅंूढ़ने में शायद आपकी मदद नहीं कर पाऊं। आजकल के तूतक तूतक तूतिया से मैं वैसे ही परेशान हूॅं। कृपया मुझे माफ करें। अन्त में इस टीप पर अवश्य ध्यान दें– ‘‘यह लेख उन कुवांरे-कुवांरियों के लिए नहीं हैं जो तूतूक तूतक तूतिया से परहेज करते हैं।’
(आचार्य शिवप्रसादसिंह राजभर राजगुरु, सिहोरा, जबलपुर म.प्र. )