Sunday, March 24, 2019
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स्कूल जाने की खुशी में रात भर जागता रहा-प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘

प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘

बात 1988 की है। मेरी इंटरमीडिएट की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं और मैं बेसब्री से रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा था। जून के मध्य में परिणाम आ गया। उस जमाने में आज के जैसी नेट की कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी। परीक्षा परिणाम अखबारों के विशेष संस्करण में छपा करते थे। और दूसरे दिन देखने को मिला करते थे। रिजल्ट देखा, द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था, मुहल्ले के कुछ सहपाठी फेल हो गये थे और कालेज का रिजल्ट भी द्वितीय श्रेणी का था।। मुझे याद है, मेरी इस उपलब्धि पर भी घर और पास-पडोस में लड्डू बांटे गये थे। जुलाई आया और बी.ए. में स्थानीय महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया था। एक दिन बस ऐसे पिता जी ने पूछ लिया था कि मुझे आगे क्या करना है। मेरा उत्तर उन्हें खुश कर गया था क्योंकि मैंने परिवार की शिक्षकीय परम्परा को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। मैंने कहा था,‘‘ मुझे सरकारी प्राईमरी स्कूल में शिक्षक बनना है। और अभी जल्दी बीटीसी प्रशिक्षण के लिए आवेदन हेतु विज्ञापन आने वाला है, मैं फाॅर्म डाल दूंगा।‘‘ ध्यान देना होगा कि उस समय प्राइमरी शिक्षक को बहुत कम वेतन मिलता था और बहुत कम बच्चे प्राथमिक शिक्षा में एक शिक्षक के रूप में जाना चाहते थे।
मुझे अच्छी तरह से याद है, मुझे प्रारम्भ से ही बच्चों के साथ खेलना-कूदना, गाना और नई-नई चीजें बनाना अच्छा लगता था। अपने बचपन तक तो ठीेक था पर आगे किशोर और युवावस्था में भी मैं बच्चों के साथ खेलता, गाता और उन्हें पढ़़ाता रहा। न जाने क्यों, मुझे बच्चों से बातें करना, उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। शायद वे दिल से बात करते थे, दिमाग से नहीं। उनके व्यवहार में अपनेपन की एक मोहक महक बसी रहती थी, बनावटीपन की चमक नहीं। जैसा जो मन में आया बस बोल दिया। दूसरे, उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी होती थी। कई बार मेरे पास उनके साथ खेलने के लिए कोई नया खेल नहीं होता था तो बच्चे वहीं पर तुरन्त कोई नया खेल रच लेते थे। सच, बड़ा मजा आता था। मैं सोचता कि बच्चे ऐसा कैसे कर लेते हैं। उनकी कल्पनाशीलता उन्हें ऐसे मौके देती थी। उनमें से कई बच्चे आज नौकरियों और अपने व्यवसाय में जम गये हैं। जब उनसे कभी कभार भेंट-मुलाकात होती है तो वे कहना नहीं भूलते, उन दिनों की बहुत याद आती है, सर। आप और हम बच्चे, खेलना, सीखना-सिखाना और मौज-मस्ती। आज हम सोचते हैं कि हम अपने बच्चों को वैसा खुला और निश्चिंत बचपन क्यों नहीं दे पा रहे, जो हमने जीया था।
1995-96 में मैंने बीटीसी प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी। दो वर्ष के प्रशिक्षण के उपरान्त नियुक्ति के इन्तजार में घर पर बैठ गया था। सुनने में आ रहा था कि दो-तीन महीनों में नियुक्ति होने वाली है। मैं रोज अपने सपने की ओर एक एक कदम बढ़ रहा था। 1998 की सर्दियां बीत चुकी थीं और वातावरण सुहावना होने लगा था। सूरज आकाश में थोड़ा ऊपर तक चढ़ने लगा था। चारो ओर बसन्त की मादकता छायी थी। उन दिनों दोपहर को डाकिया मुहल्ले में डाक बांटने आया करता था और उसकी राह ताकना भी मेंरी दिनचर्या में शामिल हो गया था। फिर एक दिन, नियुक्ति पत्र मेरे हाथ पर था और मैं स्वप्न लोक में। लगा वर्षों से देखा सपना सच हो गया था। बहुत प्यार और जतन से खोला था लिफाफे को मैंने। पूरा घर घेर कर खड़ा था मुझे। मैंने पत्र पढ़ा, फिर बारी बारी से सबने पढ़ा। मेरी नियुक्ति प्रा. वि. बिल्हरका, क्षेत्र नरैनी में हुई थी। यह गांव मैंने या मेरे किसी परिवारी जन ने कभी भी नहीं सुना था। कुछ परिचित शिक्षकों से जानकारी की तो पता चला कि प्रा0 वि0 बिल्हरका मेरे निवास स्थान अतर्रा से लगभग 45-50 किमी दूर मघ्यप्रदेश की सीमा से लगा हुआ केन नदी के किनारे स्थित है। मैंने अनुभव किया कि मेरे पैरों के नीचे से किसी ने चादर खींच ली हो और मैं औंधे मुंह धड़ाम से गिर पड़ा होऊं। इतनी दूर स्कूल मिलेगा, यह मैंने कभी सोचा ही नहीं था। पर मैंने दूसरे दिन विद्यालय की पुख्ता जानकारी के लिए बीआरसी नरैनी जाना उचित समझा। वहां से सटीक जानकारी मिली कि अतर्रा से वाया नरैनी होते हुए करतल कस्बे तक 40 किमी बस द्वारा जाना होगा और फिर वहां से स्कूल तक 6 किमी कच्चे मार्ग पर पैदल, साईकिल या अन्य किसी निजी साधन से। मैं घर लौट आया और अगले दिन स्कूल जाने की तैयारियों में लग गया। विद्यालय जाने की खुशी पूरे तन-मन में छायी थी और रात में सोता-जागता रहा। पिता जी के एक परिचित करतल में रहते थे, उनसे सम्पर्क कर कोई दूसरी व्यवस्था होने तक एक साईकिल का जुगाड कर लिया गया था। अगले दिन सुबह करतल से होकर छतरपुर जाने वाली पहली बस पकड़ खुशी-खुशी अपनी शिक्षकीय जीवन की शुरुआत करने निकल पड़ा।