Tuesday, November 3, 2026
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लेख/विचार

जोशीमठ : प्रकृति के साथ खिलवाड़ या प्रशासन की लापरवाही ?

जोशीमठ (उत्तराखंड) में पड़ती दरारें और बहता हुआ पानी लोगों में दहशत और लोगों का जनजीवन असामान्य बना रहा है। क्या ये मंजर लोगों द्वारा प्रकृति के साथ किये खिलवाड़ का नतीजा है या प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है। 1976 में एक अट्ठारह सदस्यीय कमेटी ने जब इस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित कर दिया था और निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध, पेड़ों को काटने पर रोक और बारिश के पानी के निकासी की व्यवस्था की बात रखी थी तब इस बात को सरकार द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया था और आज लोग इस गल्ती का खामियाजा भुगत रहे हैं। इस कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जोशीमठ बालू और पत्थर के ढेर पर बसा हुआ है, इस दृष्टि से यह किसी टाउनशिप के लिए उपयुक्त नहीं है। धमाकों और भारी यातायात से उत्पन्न होने वाले कंपन यहां पर प्राकृतिक असंतुलन पैदा करेंगे। भारी निर्माण कार्य की अनुमति केवल मिट्टी का भार वहन करने की क्षमता के दृष्टिगत ही दी जानी चाहिए। सड़कों की मरम्मत या अन्य किसी प्रकार के निर्माण कार्य किसी भी स्थिति में पहाड़ों को खोदकर अन्यथा विस्फोट करके नहीं किये जाने चाहिए। भूस्खलन प्रभावित इलाकों में पत्थरों और बड़े शिलाखंडों को पहाड़ी की तलहटी से नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि इससे पहाड़ को मिलने वाली मजबूती खत्म होती है। 47 बरस पहले की इस रिपोर्ट को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और आज जोशीमठ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

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चिंताजनक स्तर तक बढ़ती अमीरी-गरीबी की खाई

दुनियाभर में अमीरी और गरीबी के बीच खाई निरन्तर बढ़ती जा रही है, जो कोरोना काल के बीच और तेजी से बढ़ी है। इसी बढ़ती खाई को लेकर पूरी दुनिया में एक नई बहस छिड़ी है। गरीबी उन्मूलन के लिए कार्यरत संस्था ऑक्सफैम इंटरनेशनल की वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक से ठीक पहले आई रिपोर्ट ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट : द इंडिया स्टोरी’ में इसे लेकर कई चौंका देने वाले खुलासे किए गए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 21 सबसे अमीर अरबपतियों के पास इस समय देश के 70 करोड़ लोगों से भी ज्यादा धन-दौलत है और वर्ष 2021 में भारत की कुल संपत्ति में से 62 फीसदी हिस्से पर देश के केवल 5 प्रतिशत लोगों का ही कब्जा था जबकि भारत की निचले तबके की बहुत बड़ी आबादी का देश की केवल तीन फीसदी सम्पत्ति पर ही कब्जा रहा। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, जो 2022 में 166 पर पहुंच गई पिछले साल नवम्बर तक भारतीय अरबपतियों की सम्पत्ति में 121 फीसदी तक बढ़ोतरी देखी गई। एक ओर जहां आम आदमी कोरोना महामारी के दौर में पेट भरने का जुगाड़ करने के लिए संसाधन जुटाने को तरसता रहा, नौकरी संबंधी समस्याओं का सामना करता रहा, वहीं उस दौर में भी भारत के अरबपतियों की दौलत में प्रतिदिन 3608 करोड़ रुपये प्रतिदिन बढ़े।
ऑक्सफैम की इस रिपोर्ट में पिछले दस वर्षों में देश में पैदा हुई सम्पत्ति के गैर-बराबर बंटवारे के मुद्दे को भी उठाते हुए कहा गया है कि 2012 से 2021 के बीच भारत में जितनी भी संपत्ति अस्तित्व में आई, उसका 40 प्रतिशत हिस्सा देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों के हाथ में गया जबकि 50 फीसदी जनता के हाथ में केवल तीन फीसदी सम्पत्ति ही आई। रिपोर्ट के अनुसार भारत के 100 सबसे अमीर लोगों की सम्पत्ति 54.12 लाख करोड़ रुपये के पार जा चुकी है, जिससे 18 महीनों तक देश का पूरा बजट चलाया जा सकता है। यही कारण है कि सरकार को सलाह दी जाती रही है कि यदि भारतीय अरबपतियों की कुल सम्पत्ति पर महज दो फीसदी टैक्स ही लगा दिया जाए तो उसी से आगामी तीन वर्षों तक कुपोषण के शिकार बच्चों की सभी जरूरतों को बहुत आसानी से पूरा किया जा सकता है। 1980 के दशक की शुरूआत में एक फीसदी धनाढ़यों का देश की कुल आय के छह फीसदी हिस्से पर ही कब्जा था लेकिन बीते वर्षों में यह लगातार बढ़ता गया है और तेजी से बढ़ी आर्थिक असमानता के कारण स्थिति बिगड़ती गई है।

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गोशालाओं में गो-पालन किया जा रहा है या गो-मारण ??

निराश्रित/आवारा गोवंश किसानों के लिये एक जटिल समस्या बन गये थे और अभी भी बने हुए हैं क्योंकि किसानों की फसलों को नष्ट कर उनकी मेहनत की कमाई पर पानी फेर रहे हैं। अनकहे दर्द से किसान परेशान हैं। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुये उप्र की योगी सरकार ने योजना तैयार की कि निराश्रित/आवारा गोवंशों (गायों/सांड़ों) से किसानों को छुटकारा दिलवाया जाये। इसी योजना के अनुरूप हर ग्राम पंचायत स्तर पर अथवा आवश्यकता के अनुसार गोशालाओं की स्थापनायें करना शुरू की गई। सूबे के ही जनपद में अनेक गोशालायें स्थाई अथवा अस्थाई रूप से निर्मित कर दी गईं और कुछ अभी निर्माणाधीन भी हैं।
अब कहा जा रहा है कि गोशालायें बन जाने से किसानों को निराश्रित/आवारा गोवंशों (गायों/सांड़ों) से छुटकारा मिल जायेगा!
ठीक बात है किसानों का दर्द समझा तो है उप्र की योगी सरकार ने, लेकिन इसी बीच सवाल यह भी उठता है कि ‘किसानों का दर्द’ तो सरकार की समझ मेें आ गया किन्तु क्या ‘निराश्रित गोवंशों का दर्द’, योगी सरकार समझ पा रही है अथवा नहीं ?
अब आप कहेंगे कि मैं यह क्यों लिख रहा हूं कि निराश्रित गोवंश किसी अनकहे दर्द से पीड़ित हैं तो स्पष्ट कर रहा हूं कि निराश्रित गोवंशों के ‘पेट की आग’ बुझाने की जो योजना या नीति निर्धारित है वह नाकाफी साबित हो रही है अथवा यूं कहें कि बिना सोंचे-विचारे तैयार की गई है। परिणामतः गोशालाओं में रखे गये गोवंश, भूख से तड़पने पर मजबूर हैं फिर नतीजा क्या होता होगा, इसकी कल्पना हर कोई कर सकता है…????
अनेक पशु पालकों ने बताया कि एक वयस्क पशु (गाय/भैंस) को औसतन 4-6 किलोग्राम सूखा चारा एवं 1-2 किलोग्राम दाना का मिश्रण जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। वहीं 1 किलोग्राम दाना मिश्रण प्रति 2.5 किलोग्राम, दूध उत्पादन के लिए निर्वहन आवश्यकता के अतिरिक्त देना चाहिए।

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लेट नाइट पार्टियाँ कितनी सुरक्षित ?

माना कि ज़िंदगी जश्न है, एक-एक पल को मस्ती से जीना चाहिए। पर मस्ती कहीं ज़िंदगी के उपर भारी न पड़ जाए इसलिए एक दायरा तय करते हर कदम बढ़ाना चाहिए। बिंदास जीवन का मतलब छिछोरापन हरगिज़ नहीं।
आजकल युवा लड़के-लड़कियां ज़िंदगी के मजे लेने के मूड़ में होते है। और अब तो बड़े शहरों के साथ छोटे शहरों के लड़के-लड़कियां भी पीछे नहीं। ऐसे में लेट नाइट पार्टी का क्रेज़ बहुत देखने को मिल रहा है। पर ऐसी पार्टियां कितनी सेफ़ है ये सोचे बगैर लड़कियां अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ निकल पड़ती है, जिसका परिणाम कभी-कभी ज़िंदगी बर्बाद कर देता है। ऐसी कई पार्टियों में शराब, सिगरेट, चरस, गांजा भी सरेआम परोसा जाता है। और हम सुनते भी हैं पढ़ते भी हैं कि ऐसी पार्टियों में लड़कियों के साथ जबरदस्ती भी होती है। लड़कियों को किसी भी अनजान लड़के पर भरोसा करके उसके हाथ से कोई भी खाने पीने की चीज़ का सेवन नहीं करना चाहिए।
लेटनाइट पार्टियों में युवाओं को एकदूसरे से खुल कर मिलने का मौका मिलता है। ऐसे में कई बार युवाओं के बहकने का खतरा भी होता है। यह उन पर भारी भी पड़ सकता है। जवानी का शुरुर ही ऐसा नशीला होता है। खासकर लड़कियों के लिए ऐसी पार्टियां खतरे से खाली नहीं होतीं। छेड़छाड़, बलात्कार और किडनैपिंग की संभावना भी नकारी नहीं जाती।
इसलिए जरूरत इस बात की है कि लेटनाइट पार्टी में लड़कियां ब्वॉयफ्रेंड के साथ समझदारी के साथ मौजमस्ती करें। पार्टी में मौजमस्ती बुरी नहीं होती पर मौजमस्ती किसी समस्या का कारण न बन जाए इस बात का ख़याल रखना जरूरी होता है और माँ-बाप का भी फ़र्ज़ बनता है कि अगर आपकी बेटी लेट नाइट पार्टी में जा रही है तो वहाँ के माहौल की जाँच पड़ताल कर लें, जगह कौन सी है, वहाँ का स्टाफ़ कैसा है और किसके साथ जा रही है। पब्स, होटल्स या कहीं भी हो शहर से बाहर ना हो इस बात का भी ध्यान रखें।

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प्यार, इश्क, मोहब्बत जैसे सुंदर एहसास अब हवस मिटाने का ज़रिया बन गया है

समय के चलते स्वतंत्रता को अपना नैतिक हक समझने वाली आजकल की पीढ़ी स्वच्छंदता का अंचला ओढ़े मनमानी कर रही है। या यूँ कहे कि, माँ-बाप के बनाए हुए दायरे को तोड़ कर आज़ाद ज़िंदगी जीने की होड़ में बर्बादी के पथ पर चल पड़ी है। खासकर लड़कियाँ अपने आप को बहुत एडवांस और होशियार समझते माँ-बाप के संस्कारों को निलाम करने पर तुली है। लड़कियों को जवानी के एक पड़ाव पर ठहरकर सोचने की जरूरत है कि वह क्या चाहती है। अपना लक्ष्य तय करते करियर बनाने की उम्र में प्रेम, प्यार के चक्कर में समय बर्बाद करते कहीं की नहीं रहती। एक उम्र के बाद जायज़ है शारीरिक विकास के साथ विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण होना; पर उस उन्माद को प्यार का नाम देकर मनचले लड़कों के हाथों की कठपुतली बनकर खुद के साथ-साथ माँ-बाप की इज़्जत की धज्जियां उड़ाने का हक आपको हरगिज़ नहीं। दर असल पारिवारिक संस्था की व्यवस्था ही डावाँडोल होने लगी है। पहले के ज़माने में घर में पिता का एक रुतबा हुआ करता था, जो परिवार के हर सदस्यों को अनुसाशन में रखता था। दिनभर कितने भी उछल कूद कर लेते थे शाम को पिता जी के ऑफ़िस से आने का वक्त होते ही बच्चें सावधान होकर एकदम शांत होकर अपने काम में व्यस्त हो जाते थे। डर कहो, या सम्मान कहो पर पिता का वो रोबिला अंदाज़ बच्चों को अनुसाशन में जरूर रखता था। आजकल तो माँ-बाप का कुछ भी कहना बच्चों को बंदीशें लादना और शोषण लगने लगता है। माँ-बाप भी अपने आप को खुले विचारों वाले आधुनिक समझते बेटियों को कुछ ज़्यादा ही छूट देने लगे है, जिसका कुछ ना समझ लड़कियाँ गलत फ़ायदा उठाते, मनमर्ज़ी करते ऐसे रास्ते पर चल पड़ती है जहाँ से उनकी लाशें ही वापस आती है। ऐसे किस्सों में कहीं पैसों की भूख, तो कहीं शारीरिक भूख ही मुख्य कारण होती है। वेब सीरिज़ों में लड़कियाँ जिस तरह बिंदास गालियाँ बक रही है, कपड़े उतारने लगी है क्या उसके परिवार वाले वो सब नहीं देखते होंगे? या पैसों के लिए सब नज़र अंदाज़ करते होंगे? बड़ी-बड़ी शादीशुदा हीरोइनें भी पैसों की ख़ातिर अंग प्रदर्शन करने से नहीं शर्माती। वही बिंदास अंदाज़ जब आम लड़की अपनाती है तब उसको लूटने वालों की दुनिया में कोई कमी नहीं है।
ज़िंदगी में कितना कुछ करने के लिए होता है, अपने भविष्य को सुरक्षित करने हेतु पढ़ लिखकर कुछ बनकर दिखाओ। अगर आप में कोई हुनर है तो उसे विकसित करो और आगे बढ़कर अपने माँ-बाप का नाम रोशन करो। लड़कियों संभल जाओ… खाने, खेलने और करियर बनाने की उम्र में शारीरिक आकर्षण को प्यार समझकर ऐसे लड़कों के बहकावे में आकर ज़िंदगी तबाह मत करो; जिनको प्यार, इश्क, मोहब्बत की परिभाषा ही पता नहीं।

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विरोध पाखंड का हो न कि रंगों का

आजकल पठान फ़िल्म सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। खासकर दीपिका के भगवा रंग के आउटफ़ीट को लेकर बवाल मचा हुआ है। सनातन हिन्दू धर्म में भगवा रंग को पवित्र माना जाता है, जो मंदिरों की ध्वजा से लेकर साधु संतों के द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों का रंग होता है। इसका मतलब ये तो नहीं की केसरी रंग और कोई पहन ही नहीं सकता या किसी और चीज़ों के लिए उपयोग में नहीं लिया जाना चाहिए।
मुद्दा यहाँ दीपिका ने भगवा रंग पहनकर डांस किया उसका नहीं, मुद्दा ये है कि क्या हर भगवे रंग के भीतर बैठा इंसान पवित्र है? निर्माेही है? साफ़ दिल और असल में साधू संतों वाला जीवन जी रहा होता है?
हमने पुराणों में एक कथा सुनी है कि, सीता जी जब बारह साल की बालिका थे तब शिवजी का धनुष आराम से उठाकर खेला करते थे। वही धनुष बलशाली रावण रत्ती भर हिला भी नहीं पाया था और सीता जी को वनवास के दौरान वही रावण फूल की तरह कँधे पर उठाकर ले गया था। रावण भी भगवा धारण करके साधु के भेष में आया था न? तो कहाँ उस रंग का सम्मान हुआ? इस मुद्दे पर तो आज तक कोई बहस कहीं नहीं सुनी।
हमारे यहाँ सदियों से भगवा के सामने झुकने की परंपरा चली आ रही है। जिस परंपरा को निभाने से सीता जी भी नहीं चुके और रावण की फैलाई जाल का शिकार हो गए। कहने का मतलब ये है की भगवा रंगधारी हर चीज़ हर इंसान की नीयत साफ़ नहीं होती। न हर भगवाधारी गलत या राक्षस होता है।
हमारे देश में कई भगवाधारीओं के कांड आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनते रहते है, रंग मायने नहीं रखता इंसान की नीयत और पवित्रता पूज्य होती है। बहुत सारे संत भगवा धारण करके असल में साधु सा जीवन जीते भी है।

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जल संकटः समझनी होगी बेशकीमती पानी की महत्ता

पिछले सप्ताह देश में जल सप्ताह का आयोजन किया गया, जिसमें जल संरक्षण, जल के उपयोग एवं जल स्रोतों को संरक्षित करने के विषय पर चर्चा के लिए विभिन्न देशों के दो हजार से भी ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए। जल सप्ताह के दौरान जल शोधन तथा जल को बचाने के लिए गंभीरता से चर्चा हुई। ग्रेटर नोएडा में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग, जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित भारत जल सप्ताह का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कहना था कि आने वाली पीढ़ियों को बेहतर और सुरक्षित कल देने में सक्षम होने का एकमात्र तरीका जल संरक्षण ही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पानी की कमी को लेकर व्याप्त संकट अकेले भारत की ही समस्या है बल्कि जल संकट अब दुनिया के लगभग सभी देशों की विकट समस्या बन चुका है। राष्ट्रपति का भी कहना था कि पानी का मुद्दा केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। इस अवसर पर केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत का कहना था कि देश में जनसंख्या और जल की उपलब्धता में विषमता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। देश में आज कई इलाके ऐसे हैं, जो जल संकट की भयावह स्थिति से गुजर रहे हैं। इसके अलावा कुछ राज्यों के बीच बरसों से पनप रहे जल विवाद भी समस्या को विकराल बनाते रहे हैं। इसीलिए उपराष्ट्रपति ने भारत जल सप्ताह के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि राज्यों के बीच जल विवाद से कोई लाभ नहीं होगा और उन्हें जल विवादों से बचना चाहिए तथा इनका हल निकालना चाहिए। देश में जल संकट को लेकर अब जिस प्रकार की स्थितियां निर्मित होने लगी हैं, ऐसे में देश में हर साल जल सप्ताह मनाने की नहीं बल्कि पूरे साल ‘जल वर्ष’ मनाने की सख्त दरकार है।

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उफ़्फ ये स्त्रियाँ भी ना

क्या स्त्रियों के उपर हुए शारीरिक अत्याचार ही घरेलू हिंसा कहलाता है? मानसिक प्रताड़ना का क्या? जो एक होनहार महिला को अवसाद का भोग बना देता है। लगता है कुछ स्त्रियाँ प्रताड़ना सहने के लिए ही पैदा हुई होती है। ऐसी स्त्रियों को पता भी नहीं होता घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के बहुत सारे प्रकार होते है।
शारीरिक अत्याचार को ही हिंसा समझने वाली स्त्रियों को मौखिक अत्याचार, लैंगिक अत्याचार और आर्थिक अत्याचारों के बारे में जानकारी ही नहीं होती। नां हि स्त्रियों के हक में कायदे कानून के बारे में पता होता है। कोई-कोई स्त्रीयाँ तो स्वीकार कर लेती है आधिपत्य भाव! कि पति है तो उसका हक बनता है हमारे साथ अत्याचार करने का।
साथ ही जरूरी नहीं की शादी के बाद पति जो अत्याचार करे उसे ही घरेलू हिंसा मानी जाए। पिता या बड़े भाई द्वारा लड़की को पढ़ने से रोकना, पहनावे पर रोकटोक करना, बाहर आने जाने पर रोक लगाना या उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी करवा देना भी प्रताड़ना का ही हिस्सा कहलाता है। लड़की ज़ात सहने का भाव लेकर ही पैदा होती है।
पत्नी को बात-बात पर कम अक्कल कहना, ताने मारना, दोस्तों-रिश्तेदारों के सामने ज़लिल करना और बेइज़्जती के साथ लात, थप्पड़ या घूसा मारना हिंसा ही है और धमकी देना या घर से निकाल देना अत्याचार ही है।

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लघुकथाः स्त्री बनना है जरूरी

जब रमा का विवाह एक प्रतिष्ठित और सम्पन्न परिवार में तय हुआ तब मन में अजीब सी कशमकश थी कि मेरी उम्र तो छोटी है। इतना बड़ा संयुक्त परिवार है। मैं कैसे सामंजस्य बैठा पाऊँगी। अभी तो किसी भी कार्य में दक्षता नहीं है। पारिवारिक रिश्ते-नाते, रीति-रिवाजों की पर्याप्त समझ आने में तो बहुत समय लगेगा। उसके मन भी बड़ी उलझन थी, पर विवाह उपरांत जब घर में गई तो सारी स्त्रियाँ केवल स्त्रियाँ ही थी। वे धौंस, रोब और अकड़ से परे थी। उन्होंने रमा से कहा कि सारे रिश्ते बाद में आते है, हम सबसे पहले स्त्री है; तुम्हारी सास, जैठानी और ननंद बाद में। तुम सबसे पहले इस घर में सहज हो जाओ। यहाँ पर कोई भी तुम्हें किसी तराजू में नहीं तौलने वाला है। वह अपनी हर छोटी से छोटी समस्या परिवार में रहने वाली स्त्रियों को बताती और सभी मिलजुलकर उस समस्या का समाधान करते। वहाँ पर सभी का सबसे बड़ा गुण माफ करना था। पुरानी बातों को छोड़कर कुछ नया सोचना था। सभी अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे।
रमा अपनी माँ से कहती है कि मेरे ससुराल में सुंदरता, गुणों और अवगुणों को तौलने के लिए कोई तराजू नहीं है। सास अपनी पुरानी कहानियाँ नहीं सुनाती कि मेरे जमाने में ऐसा होता था, मैंने यह किया था, मैंने वह किया था। जेठानी अपनी श्रेष्ठता नहीं सिद्ध करती कि मैंने इस घर को संभालने में इतने वर्ष झोंक दिए। ननंद हर समय मान-सम्मान की दुहाई नहीं देती। हर कोई मुझे सहज महसूस कराने में लगा रहता है। माँ यदि हर परिवार में ऐसी ही परम्परा स्थापित हो जाए तो हर लड़की अपने परिवार को आसानी से अपना लेगी। माँ वहाँ की एक और विशेषता है कि वहाँ पर दोषों पर चर्चा करना स्वीकार नहीं है। दोषों पर ध्यान केन्द्रित करने से उन्नति रुक सकती है, पर समाधान और चिंतन करने से हमारी दृष्टि विकसित होती है। वहाँ पर अपनी गलती को स्वीकार करके हल्का महसूस करने पर भी बल दिया जाता है। माँ मैं भी अब अपने ससुराल के सहयोग के साथ आगे बढ़ना चाहती हूँ। अपनी सोच को उदार बनाना चाहती हूँ। माँ रमा के वाक्य सुनकर मन-ही-मन उस परिवार के प्रति धन्यवाद और मन से दुआएँ दे रही थी, जिस परिवार ने उसकी बेटी की जिंदगी आसान कर दी।

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पहली पंक्ति वाले बेदाग अपराधी दंडित हों

हम मानसिक रूप से आज भी गुलाम हैं और इस गुलामी को बनाये रखने में हमारी असफल शिक्षा व्यवस्था की भूमिका अहम है। वास्तविक रूप से शिक्षित हुए बिना ही कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ मिल जाती हैं और येन केन प्रकारेण उच्च पद या उच्च सफलता को हथियाने में सफलता मिल जाती है। कम पढ़े लिखे, संघर्षमय दौड़ में शामिल न हो सकने वाले लोग या मनचाही सफलता से वंचित लोग तथाकथित सफल एवं उच्च पदस्थ लोगों को अपना आदर्श मान लेते हैं। यही से एक प्रछन्न अपराध जन्म लेता है।
आइये, जरा विचार करें। किसी आशाराम, कामुक मौलवी, रेपिस्ट पादरी या रामरहीम के पास भक्तों की अगली पंक्ति में कौन होते हैं ? निःसंदेह हमारा इशारा कुछ डी एम, एस पी, न्यायाधीश, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, सी ए, प्रोफेसर, पूँजीपति एवं राजनेताओं की ओर होगा। बेचारी जनता जब बाबाओं के पास ऐसे महाभक्तों को देखती है तो खुद। अपने दिमाग से सोचना छोड़ देती है और आँखें बंद करके उनके पीछे लग जाती है क्योंकि अग्रिम पंक्ति की तथाकथित महान हस्तियों की अंधभक्ति उसके विवेक पर भारी पड़ती है। फलस्वरूप भीड़ बढ़ने लगती है और बाबाओं के आशीर्वाद की रोचक व चमत्कारी कथाएँ जंगल में लगी आग की तरह फैलने लगती हैं। अपार आत्मसुख देती है। शक्तिशाली चुम्बल की तरह अपनी ओर खींचे रहती है।
फिर तो भक्तों की जमात देखकर ये तथाकथित बाबा भी खुद को जगद्नियंता परमेश्वर या पैगम्बर समझने लगते हैं। उनकी वाणी ईश्वर – इच्छा सी हो जाती है। उनके भक्त बाबा/पीर की आलोचना या मूल्यांकन पर मारने – मरने के लिए तत्पर हो जाते हैं……। कालान्तर में भक्ति परिवर्तित होते हुए शक्ति बन जाती है। लोकतन्त्र पर भीड़तन्त्र प्रभावी हो जाता है और साथ ही प्रभावी हो जाता है अनशन, प्रदर्शन और हिंसा का भयावह खेल। पापलीला का अभ्युदय, ब्लैक बिजनेस की तरक्की और बेकाबू शक्ति प्रदर्शन शुरु हो जाते हैं ।

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