आज जब एशिया के एक देश चीन के एक शहर वुहान से कोरोना नामक वायरस का संक्रमण देखते हीअंतर्राष्ट्रीय राजनीति का कुत्सित रूप कोरोना वायरस
आज जब एशिया के एक देश चीन के एक शहर वुहान से कोरोना नामक वायरस का संक्रमण देखते ही
आज जब एशिया के एक देश चीन के एक शहर वुहान से कोरोना नामक वायरस का संक्रमण देखते ही
दिल्ली के चुनाव आज देश का सबसे चर्चित मुद्दा है। इसे भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य कहें या लोकतंत्र का, कि चुनाव दर चुनाव राजनैतिक दलों द्वारा वोट हासिल करने के लिए वोटरों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देना तो जैसे चुनाव प्रचार का एक आवश्यक हिस्सा बन गया है। कुछ समय पहले तक चुनावों के दौरान चोरी छुपे शराब और साड़ी अथवा कंबल जैसी वस्तुओं के दम पर अपने पक्ष में मतदान करवाने की दबी छुपी सी अपुष्ट खबरें सामने आती थीं लेकिन अब तो राजनैतिक दल खुल कर अपने संकल्प पत्रों में ही डंके की चोट पर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। मुफ्त बिजली पानी की घोषणा के बल पर पिछले विधानसभा चुनावों में अपनी बम्पर जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी अपने उसी पुराने फॉर्मूले को इस बार फिर दोहरा रही है। मध्यप्रदेश राजिस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के कर्जमाफी की घोषणा के कारण सत्ता से बाहर हुई बीजेपी भी इस बार कोई खतरा नहीं लेना चाहती।

भारत का अभ्युत्थान अर्थात भारत के विकास का अभ्युदय। भारत आज विकास के जिस पायदान पर खड़ा है वहां तक पंहुचने का आधार यदि शिक्षा, संस्कृति, तकनीक, श्रम, समर्पण रहा है, तो इस आधार को सुदृढ़ता प्रदान करने का काम हमारी मीडिया ने किया है। विकास और मीडिया अन्योन्याश्रित है। जब तक ज्ञान का प्रचार प्रसार नहीं होगा वह लोगों तक नहीं पंहुच पायेगा। सूचनाएं ही यदि प्रचारित नहीं होंगी तो लोग उन पर काम कैसे कर पाएंगे। जब हम भारत के अभ्युदय की बात करते हैं तो यह किसी एक बिंदु की नहीं बल्कि इसके बहुआयामी कलेवर की बात होती है अर्थात भारत का सर्वांगीण विकास।इस बहुआयामी अभ्युदय में हमारी मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह भूमिका हमारा संचारतंत्र तीन तरह से निभाता है- इलेक्ट्राॅनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और मुखाग्र मीडिया।
भारत के अभ्युदय को दो श्रेणी में विभाजित कर देखते हैं-शहरी विकास, ग्रामीण विकास: शहरों में सुविधाओं की सहज उपलब्धता के चलते इलेक्ट्राॅनिक व प्रिंट मीडिया की महती महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत अभ्युदय से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य, भौगोलिक जानकारी, आर्थिक स्थिति, देश व समाज की वर्तमान स्थिति,वैश्विक स्तर पर भारत अभ्युदय की स्थिति, राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में तथ्यों को उजागर करने, तत्संबंधित आंकड़े जुटाने, उन्हें जन जन तक पंहुचाने, जन मानस को जागरूक बनाने में मीडिया उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जहाँ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया स्रोतों में मोबाइल, कंप्यूटर, टी वी, इन्टरनेट, सैटेलाइट चैनल का बड़ा योगदान है, वहीं प्रिंट मीडिया, पत्रकारिता,संपादन दैनिक पत्र, पत्रिकाओं व लेखन के माध्यम से शिक्षित प्रबुद्ध वर्ग तक विविध क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराती है। शहरों में जीवन की व्यस्तताओं के चलते प्रिंट मीडिया के मुकाबले इलेक्ट्राॅनिक मीडिया अधिक सक्रिय भूमिका में है। मोबाइल पर चलते फिरते सामाचर पत्र पढ़े जा सकते हैं, कोई भी पुस्तक सर्च कर कभी भी,कहीं भी पढ़ी जा सकती है। ज्ञानार्जन के साथ व्यक्ति अपने व समाज के अभ्युदय-विकास के साथ साथ देश की उन्नति में भी अपना अमूल्य योगदान करता है। यह मीडिया के कारण ही संभव है। मीडिया के बिना व्यक्ति तथ्यों व परिस्थितिजन्य जानकारी से अनभिज्ञ रहता है और अपने दायित्व निर्वहन मात्र अपने जीवन की आधारभूत आवश्यकता पूर्ति के अतिरिक्त क्षमतावान, सामर्थ्यवान होने के उपरांत भी देश व समाज के अभ्युदय उत्थान में अपना कोई योगदान देने की स्थिति में नहीँ होता।
सीएए को कानून बने एक माह से ऊपर हो चुका है लेकिन विपक्ष द्वारा इसका विरोध अनवरत जारी है। बल्कि गुजरते समय के साथ विपक्ष का यह विरोध “विरोध” की सीमाओं को लांघ कर हताशा और निराशा से होता हुआ अब विद्रोह का रूप अख्तियार कर चुका है। शाहीन बाग का धरना इसी बात का उदाहरण है। अपनेराजनैतिक स्वार्थ के लिए ये दल किस हद तक जा सकते हैं यह धरना इस बात का भी प्रमाण है। दरअसल नोएडा और दिल्ली को जोड़ने वाली इस सड़क पर लगभग एक महीने से चल रहे धरने के कारण लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी सड़क पर इस प्रकार से धरने पर बैठे हैं कि लोगों के लिए वहाँ से पैदल निकलना भी दूभर है। लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे, स्थानीय लोगों का व्यापार ठप्प हो गया है, रास्ता बंद हो जाने के कारण आधे घंटे की दूरी तीन चार घंटों में तय हो रही है जिससे नौकरी पेशा लोगों का अपने कार्यस्थल तक पहुंचने में असाधारण समय बर्बाद हो रहा है।
बैताल ने सम्राट विक्रमादित्य से कहना प्रारम्भ किया। हे! सम्राट, दो चार दिन पहले बासठ-त्रेसठ साल की एक देहाती अनपढ़ औरत सरकारी बैंक से बाहर निकली। बाहर निकलते ही उसे चक्कर आ गया। उसके मुँह से निकला ‘‘हे! राम अब मैं क्या करूँ ?’’ ऐसा कहते हुए वह जमीन पर गिर गई। पास से गुजर रहे लोग उसके पास पहुँचे। पास ही चाय की दूकान थी। चाय वाला गिलास में पानी लेकर दौड़ा और उस वृद्धा के मुँह पर पानी के छींटे मारे। जब वह वृद्धा कुछ समाचेत हुई तो लोगों ने उसे बैठाया और कुछ पूछा। लोगों के कुछ पछते ही वह वृद्धा फफक फफक कर रो पड़ी। बमुष्किल उसने रोते रोते अपनी राम कहानी बताई।
बैताल ने सम्राट विक्रमादित्य से पूछा-हे! राजन वह देहाती अनपढ़ औरत आखिर किस पीड़ा से पीड़ित हो गई जिसके कारण वह बेहोष होकर गिर पड़ी और समाचेत होने के बाद लोगो द्वारा कुछ पूछे जाने पर फफक फफक कर रो पड़ी, इस विषय में कुछ प्रकाश डालिए।
नए साल पर बुंदेलखण्ड से एक बड़ा संदेश आया है। प्यास और भुखमरी का पर्याय बन गए बुंदेलखण्ड की धरती पर एक अनूठा संकल्प साकार हुआ। कुओं की पूजा और तालाबों के उद्धार की मुहिम छेड़ने वाले बांदा के जिलाधिकारी हीरालाल ने युवाओं के समूह के साथ आधी रात को केन नदी के तट पर नए साल का स्वागत किया। नदी संरक्षण का समवेत संकल्प लिया गया। एक नई उम्मीद के साथ, एक नई ऊर्जा के साथ। औरों से अलग, अनूठे रूप में जल संरक्षण का जो पाठ जिलाधिकारी ने बाँदा में शुरू कराया है, वह एक बेहतर भविष्य की तरफ इशारा करता है। केन नदी की पूजा के साथ ही उसके तट वाले 22 गांवों में एक साथ चौपाल लगवाई गई और वहाँ जलवायु परिवरतन के खतरे बताये गए। ग्रामीणों से पूछा कि नदी का दुश्मन कौन? जवाब मिला कि नदी में हुआ भारी खनन और खत्म हुए जंगलात के कारण नदी की दुर्दशा हुई है। राज और समाज का संकल्प हुआ कि सब मिलकर केन को बचायेंगे। उसका जंगल वापस लाएंगे। उसको पानी देने ताल-तलैया और कुओं को फिर भरेंगे। कैसे होगा यह सब? इन चौपालों में तय हुआ कि बारिश का पानी खेत में, तालाब में, कुओं में रोककर भूजल भंडार बढ़ाएंगे और पौधे लगाएंगे। जिले में तालाबों और कुओं को ठीक करने का काम पहले से भी चल रहा था, मगर नए साल से इसे जनांदोलन की शक्ल देने का रास्ता तय हो गया है। जिलाधिकारी ने राज और समाज को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया। नए साल के पहले हफ्ते में ही एक और अनूठी मुहिम शुरू हुई। गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व पर जिलाधिकारी ने सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में पौधे दिये। गुरुद्वारा कमेटी ने अब हर रोज प्रसाद में पौधे देने का कर्म शुरू कर दिया है। यह काम मंदिरों में भी शुरू हुआ है। जन मानस में यह बात बैठी है कि प्रसाद में मिले पौधों का अनादर न हो। ऐसे में प्रसाद में मिले पौधे का रोपा जाना और उसकी देखभाल तय है। रोपने वाला परिवार समेत इसकी देखरेख भी करता रहेगा; इसी विश्वास के साथ बुंदेलखण्ड की धरती में एक नई मुहिम शुरू हुई है। यह सिर्फ तुलसी के पौधों तक सीमित नहीं। प्रसाद में नीम, बेर, नींबू, मीठी नीम से लेकर फूल और छायादार पौधे दिये जा रहे हैं। बुंदेलखण्ड की हालत किसी से छिपी नहीं है। वीरों की यह भूमि दशकों से जल संकट से जूझ रही है।
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स्ट्रेस यानी तनाव। पहले इसके बारे में यदा कदा ही सुनने को मिलता था। लेकिन आज भारत समेत सम्पूर्ण विश्व के लगभग सभी देशों में यह किस कदर तेज़ी से फैलता जा रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज हर जगह स्ट्रेस मैनेजमेंट अर्थात तनाव प्रबंधन पर ना सिर्फ अनेक जानकारियाँ उपलब्ध हैं बल्कि इस विषय पर अनेक रिसर्च भी की जा रही हैं। कहा जा सकता है कि आज तनाव ने एक ऐसी महामारी का रूप ले लिया है जो सीधे तौर पर भले ही जानलेवा ना हो लेकिन कालांतर में अनेक बीमारियों का कारण बनकर हमारे जीवन को जोखिम में अवश्य डाल देती है। हमारे बुजुर्गों ने भी कहा है, “चिंता चिता समान होती है”। लेकिन दिल थाम कर रखिए तनाव कितना भी बुरा हो लेकिन इस लेख के माध्यम से आपको तनाव के विषय में कुछ ऐसी रोचक जानकारियाँ दी जाएंगी जिससे तनाव के बारे में आपकी सोच ही बदल जाएगी और आप अगर तनाव को अच्छा नहीं कहेंगे तो यह तो जरूर कहेंगे कि “यार तनाव है तो होने दे, इसमें बुरा क्या है?”
हालांकि हमारी आदत में शुमार है भेड़चाल में चलना जैसे ही कोई मुद्दा तेजी से उभरता है हम उस पर चिल्लाना शुरू कर देते हैं और कुछ दिन बीतते ही जब सब शांत हो जाता है तो हम भी शांत हो जाते हैं। यह हमारी आदत में शुमार है और हम इसके आदी भी हैं लेकिन कुछ घटनाएं दिलोदिमाग से हटती नहीं बल्कि अक्सर याद आती रहती है। बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा का मसला कोई आज से है ऐसा नहीं है.. बरसों से चला आ रहा है। महिलाओं के प्रति अपराध भी होते आ रहे हैं लेकिन अब इनमें निरतंर बढ़ोत्तरी होती जा रही है और जब सरकार अपने काम में नकारा साबित होने लगे तो जरूरी है कि उस मुद्दे पर ध्यान दिलाया जाये।Read More »
नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद से ही देश के कुछ हिस्सों में इस कानून के विरोध के नाम पर जो हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं वो अब गंभीर चिंता ही नहीं चिंतन का भी विषय बन गए हैं। हर बीतते दिन के साथ उग्र होते जा रहे आन्दोलनों और आंदोलनकारियों के हौंसलों के आगे घायल होती पुलिस और लाचार से प्रशासन तंत्र से ना सिर्फ विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठे बल्कि सरकार की नाकामी भी सामने आईं। विपक्ष इसलिए कठघड़े में है क्योंकि बात बात में गाँधी की विरासत पर अपना अधिकार जमाने वाला विपक्ष आज इन हिंसक आंदोलनकारियों के समर्थन में खड़ा है लेकिन उनसे अहिंसा और शांति के साथ अपनी बात रखने की समझाइश नहीं दे रहा। लोकतंत्र की दुहाई देने वाला विपक्ष जब लोकतंत्र के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाती अराजक होती भीड़ के समर्थन में उतरता है तो वो लोकतंत्र की किस परिभाषा को मानता है इसका उत्तर भी अपेक्षित है। संविधान की रक्षा की दुहाई देता विपक्ष जब नागरिकता कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाता तो है लेकिन कोर्ट के फैसले का इंतजार किए बिना सड़कों पर उतरता है और लोगों को भृमित करने का काम करता है तो संविधान और न्यायतंत्र के प्रति उसकी आस्था पर भी उत्तर अपेक्षित हो जाता है।