Monday, August 3, 2026
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आखिर कब रुकेगा आवारा गोवंश का आतंक ?

जब किसी किसान की महीनों की मेहनत कुछ ही घण्टों में आवारा पशुओं के झुण्ड द्वारा बर्बाद कर दी जाती है, तब उसके आँसुओं की कोई कीमत तय नहीं होती। जब गली, सड़क पर चलते किसी बुजुर्ग, महिला या बच्चे पर अचानक कोई आवारा पशु हमला कर देता है, तब यह महज दुर्घटना नहीं रहती, बल्कि सरकारी व्यवस्था की विफलता का जीवन्त प्रमाण बन जाती है।
उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में ‘आवारा पशु, विशेषकर गोवंश’ अब केवल कृषि संकट का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह जनसुरक्षा का गम्भीर प्रश्न बन चुका है।
अभी हाल ही में राजधानी लखनऊ में शुक्रवार को सामने आया वह हृदय विदारक दृश्य मन को झकझोर देने वाला है, जिसमें उग्र गोवंश ने एक मासूम बच्ची को बेरहमी से कुचल-कुचल कर घायल कर दिया। आसपास मौजूद लोग उसे बचाने की भरसक कोशिश करते रहे, लेकिन आक्रामक पशु लगातार हमला करता रहा। नतीजन, बच्ची अस्पताल पहुंच गई, लेकिन यह घटना, सूबे की व्यवस्था के मुंह पर कई सवाल छोड़ गई।
सवाल उठता है कि आखिर ऐसी स्थितियाँ पैदा क्यों हो रहीं ?
क्या केवल कथित गौशालाएं अथवा गोआश्रय केन्द्र बनवा देने से ‘समस्या का समाधान’ हो गया?
यदि हाँ, तो फिर सड़कों, बाजारों, स्कूलों और मोहल्लों में खुलेआम घूमते सैकड़ों आवारा गोवंश किसकी जिम्मेदारी हैं ?
सबसे बड़ा प्रश्न उन लोगों से भी है जो दूध देना बंद होने या नर गोवंश का खेती-बाड़ी में उपयोग समाप्त होने के बाद अपने पशुओं को सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं!
क्या केवल धार्मिक भावनाओं का प्रदर्शन ही पर्याप्त है ?
यदि किसी पशु की सेवा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई जा सकती, तो उसे खुले में छोड़ देने का अधिकार किसने दिया ? मेरे नजरिये से ऐसा करना, न केवल अमानवीय है, बल्कि एक गम्भीर अपराध भी है।लेकिन, दुर्भाग्य का पहलू यह है कि ऐसा करने वाले लोगों के विरुद्ध कार्रवाई ‘नगण्य’ दिखाई देती है। कहने भर के लिये कानून हैं, नियम हैं, लेकिन उनका प्रभावी पालन हकीकत से बहुत दूर है अर्थात जमीन पर नहीं दिखता ! परिणाम यह है कि आवारा पशु (गोवंश) फसलें उजाड़ रहे हैं, सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं और बड़े-बुजुर्ग और मासूम बच्चों की जान तक पर बन आ रही है।
स्थानीय प्रशासन भी इस प्रश्न से बच नहीं सकता ! क्योंकि नगर निकाय, पंचायतें, पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन, सभी की जिम्मेदारी तय है। लेकिन सभी नकारा दिख रहे हैं। क्योंकि यदि किसी क्षेत्र में आवारा पशुओं का आतंक निरन्तर बना हुआ है, तो यह केवल ‘तंत्र’ की लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता भी है।
वहीं, यह देखा जाता है कि हर दुर्घटना के बाद आवारा पशुओं (गोवंशों) को पकड़ने का अभियान शुरू कर दिया जाता है। मेरी दृष्टि से आवारा पशुओं को केवल पकड़ने का अभियान चलाना स्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि इस समस्या की जड़ पर प्रहार करना होगा। जो लोग अपने पशुओं को जानबूझकर आवारा छोड़ते हैं, उनके पशु जब्त करने के साथ-साथ, उनके खिलाफ कठोर आर्थिक दण्ड, आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिये। कम से कम उन्हें 14 दिनों तक कारागार की शरण में रखना अनिवार्य किया जाना चाहिये ताकि ऐसा करने वालों के मन में कुछ डर पैदा हो। वहीं, प्रत्येक गोवंश की पहचान और उसके स्वामी का रिकॉर्ड सुनिश्चित किया जाए, ताकि उसकी जिम्मेदारी तय हो सके।
सरकार द्वारा, गौशालाओं की वास्तविक क्षमता, संसाधनों और संचालन की भी नियमित समीक्षा आवश्यक है। अनेक उदाहरण सामने आ चुकें हैं जिनमें जिस किसी ने गौशालाओं की बदहाली व अनियमितता दिखाई, उनके खिलाफ, सरकार को बदनाम करने, छवि खराब करने का मामला दर्ज करवाकर सच्चाई को दबाने का कुत्सित कृत्य, स्थानीय अधिकारियों द्वारा किया गया है, यह बहुत ही निन्दनीय व शर्मनाक है।
हम मानते हैं कि, ‘गाय, भारतीय समाज में श्रद्धा का विषय है।’ लेकिन, इस श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि, ‘उसे सड़कों पर बेसहारा अथवा आवारा छोड़ दिया जाए।’ मानते हैं कि पशु भी सुरक्षा और देखभाल के अधिकारी हैं लेकिन, देश का हर नागरिक भी सुरक्षित जीवन का अधिकार रखता है।
अब समय केवल संवेदनाएं व्यक्त करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। हर नई घटना के बाद अफसोस जताना आसान है, अभियान चलवाना समस्या का हल नहीं दिख रहा। बल्कि जरूरत इस पहलू की दिख रही है कि पशुओं को आवारा छोड़ देने वालों पर कठोर कार्रवाई और कानूनन कठोर सजा का प्रावधान हो। नहीं तो किसानों की फसलों के उजड़ने वाले नजारे दिखते रहेंगे। किसी न किसी राहगीर की जान जाती रहेगी। बड़े-बुजुर्ग और मासूम अस्पताल के बिस्तर पर जिन्दगी की जंग लड़ते दिखाई देते रहेंगे।

-श्याम सिंह ‘पंवार’