Monday, December 17, 2018
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लेख/विचार

‘‘एड्सः रोग के प्रकोप संग सामाजिक तिरस्कार का दंश’’

इसे आधुनिक जीवन के खुलेपन का अवदान कहें या रोग द्वारा विज्ञान को पहली बार परास्त करने की दास्तान कि दुनिया भर के डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी एक बीमारी ऐसी है जिसकी अभी तक कोई औषधि विकसित नहीं हो पाई है। इस रोग का नाम है ‘एड्स’। एक ऐसी भयंकर और प्राणघातक बीमारी कि जिसका नाम सुनते हीं हम सब दहशत, उद्वेग, डर, घृणा और घबराहट से भर उठते हैं। दरअसल एच.आई.वी नामक इस बीमारी का वायरस एक बार शरीर में प्रवेश करने के बाद शरीर के प्रतिरक्षक पिंड व्यवस्था को तोड़ना शुरू करता है। जैसे-जैसे प्रतिरोधक क्षमता जीर्ण होती जाती है, वैसे-वैसे शरीर में अनेक प्रकार के संक्रमण उत्पन्न होते जाते हैं। ‘एड्स’ एच.आई.वी संक्रमण की अंतिम अवस्था है जिसमें रोगी की प्रतिरक्षक पिंड व्यवस्था पूर्णरूपेण ध्वस्त हो जाती है और वह बेहद हीं छोटी, साधारण-सी बीमारी से भी नहीं लड़ पाता, अत्यंत दुर्बल होकर सदैव घोर रूप से थका हुआ महसूस करता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद एच.आई.वी रोगी व्यक्ति तीन-चार वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहता। वायरस जनित अन्य बीमारियों और इस बीमारी में एक विशेष फर्क है कि जहाँ अन्य बीमारियाँ कुछ दिनों या कुछेक हफ्तों में अपने लक्षण प्रकट कर देती है वहीँ एड्स का वायरस बिना किसी प्रत्यक्ष लक्षण के महीनों / वर्षों तक शरीर के अन्दर चुपचाप टी-सेल में छुपा पड़ा रहता है, रोग से अनजान रोगी ऊपर से न केवल पूर्णतया स्वस्थ दिखता है, बल्कि वह स्वस्थ महसूस भी करता है। इसके विषाणु आठ से नौ वर्ष में विकसित होते हैं, जबकि इस अवधि के दौरान संक्रमित व्यक्ति बीमारी के वायरस को न जाने कितने लोगों में हस्तांतरित कर उन्हें भी संक्रमित कर चुका होता है। इसके वायरस के द्रुत गति से फैलने और रोग के महामारी का स्वरुप धरने के पीछे भी यही कारण है। इलाज शुरू होने से पहले हीं देर हो चुकी होती है जबकि वक्त रहते इलाज शुरू कर देने से रोग की उग्रता को काफी हद तक काबू में रखा जा सकता है, एक रिसर्च के मुताबिक भारत में 2.1 मिलियन लोग एच.आई.वी से प्रभावित हैं (2015) तथा दक्षिण अफीका और नाईजीरिया के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा एड्स प्रभावित देश है।
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भाजपा के लिए खतरा हो सकते हैं बाबा !

हेमलता त्रिपाठी
वैसे तो फिलहाल बाबा रामदेव की छवि एक कारोबारी की है जिनका पिछले कुछ सालों से एकमात्र लक्ष्य है हर्बल उत्पाद व उपभोक्ता वस्तुओं की अपनी कंपनी पतंजलि के मुनाफे को आसमान तक पहुंचाना।
बाबा इस कंपनी के ब्रांड एंबेसडर हैं और उनके करीबी सहयोगी बालकृष्ण इस कंपनी का संचालन करते हैं। पतंजलि उत्पादों के प्रचार के लिए योग गुरु अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल करने में माहिर हैं। यही कारण है कि कुछ ही वर्षों में यह कंपनी देश व विदेश की नामी-गिरामी कंपनियों को टक्कर देने लगी है। पर फिलहाल की बात अलग है। 
 सूत्रों के अनुसार पतंजलि ने देश के सभी छह लाख गांवों में शाखाएं खोलने वाली है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह। शाखाएं भारत स्वाभिमान खोलेगा। गांवों में संघ की शाखाओं की तर्ज पर प्रस्तावि इन कैंपों में योग-प्राणायाम की ट्रेनिंग तो दी ही जाएगी। युवाओं को नैतिक शिक्षा का ज्ञान भी दिया जाएगा। इससे करोड़ों लोग जुड़ेंगे। पर इन शाखाओं के जरिए कहीं बाबा जी अपनी राजनितिक महत्वाकांक्षा तो नहीं पूरी करने वाले हैं।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ समय पहले भाजपा शासित राज्यों से केंद्र के गरीब समर्थक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कहा था। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस सबक का मतलब यह निकाला कि पतंजलि के स्वदेशी उत्पाद को बढ़ावा देना ही उनका गरीब समर्थक कार्यक्रम है। तब से पतंजलि के उत्पादों के प्रचार की ऐसी होड़ लगी कि असम, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर छत्तीसगढ़ तक सभी भाजपा के मुख्यमंत्रियों का यह एकसूत्रीय अभियान बन गया। भाजपा शासित राज्य बाबा रामदेव के प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देने में जुटे हैं। पतंजलि ट्रस्ट को सस्ती दरों पर या मुफ्त में जमीन मुहैया कराई जा रही है, करों में छूट दी गई है और सबकुछ बीजेपी के स्वदेशी एजेंडे के नाम पर हो रहा है। पतंजलि के उत्पादों में वृद्धि को बाबा रामदेव ‘आर्थिक स्वाधीनता अभियान’ का नाम देते हैं। 
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मेरा भारत महान …!!!

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश भारत और यहाँ के निवासी महासर्वश्रेष्ठ। यहाँ की मान्यता है कि ईश्वर जब भी अवतार (जन्म) लेता है तो वो भारत में ही लेता है क्योंकि यहाँ की भूमि पावन - पवित्र है। यहाँ सबसे अधिक भगवान पाये जाते हैं और सभी बड़े शक्तिशाली होते हैं। इनके भक्त आये दिन आपस में लड़ - लड़ कर कट - मर जाते हैं पर इनके भगवान कभी इन्हें बचाने - समझाने या बीच - बचाव भी कराने नहीं आते । आश्चर्य की बात तो यह है कि यहाँ हर रोज एक - दो नये भगवान पैदा हो जाते हैं। यहाँ भगवानों का निवास रेलवेस्टेशनों पर और पटरियों के बीच में भी पाया जाता है। भारतीय भगवान लखपती नहीं, करोड़पति नहीं, अरबपति नहीं खरबपति और इससे भी ज्यादा अमीर हैं, लेकिन आप विश्वास कीजिये कि यहाँ गरीबी भी इतनी ज्यादा है कि लोगों को कूड़े के ढेरों में कुत्ता - बिल्ली, सुअरों के साथ खाते हुए देखा जा सकता है। अब कुछ अंग्रेज वंशज मुझपर भौंकेगे कि हमने तो कभी नहीं देखा। मैं उनसे कहना चाहूंगा कि पहले वो अपनी आंखों पर से अमीरी के घमण्ड वाला चश्मा उतारें फिर सबकुछ साफ - साफ दिखाई देगा। खैर यह सब छोड़िये अब बाकी मुद्दों पर बात करते हैं। भ्रष्टाचार कोई बुरा शब्द नहीं है। भारत में तो सारे के सारे भगवान ही भ्रष्टाचारी हैं फिर यहाँ के खूंसट नेताओं, अधिकारीयों की बात ही करना बेकार है। अब देखिये यहॉ ऐसा कोई मठ - मंदिर, मस्जिद, चर्च या गूरूद्वारा नहीं जहाँ चढ़ावा - बढ़ावा न होता हो द्य यहाँ लोगों में होढ़ मची रहती है कि वह सबसे ज्यादा चढ़ायेगा ताकि उसकी मनोकामना पहले पूरी हो जाये। कुलमिलाकर भगवान भी भ्रष्टाचारी हैं फिर दल्लों की तो बात ही करना बेकार है। अब कुछ लोग दलील देंगे कि भगवान कभी किसी से कुछ नहीं मांगते। मेरा जवाब - भईया सीधे - सीधे तो यहाँ के मंत्री - संत्री, अधिकारी भी कुछ नहीं मांगते। देखिये पिछले दिनों मैंने एक इण्टरव्यू दिया, मैं इंटरव्यू में पास भी हो गया, किसी ने मुझसे इशारों - इशारों में चालीस हजार का चढ़ावा चढाने को कहा मैंने कोई ध्यान नहीं दिया। सूची लगी पर मेरा नाम नहीं था, कारण... चढ़ावा न चढ़ाना ही रहा होगा।
  
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विपक्ष के बयान सही या विदेशी रिपोर्टें

डाँ नीलम महेंद्र

देश के आम आदमी के मन में इस समय जितने सवाल उठ रहे हैं इतने शायद इससे पहले कभी नहीं उठे। वो समझ ही नहीं पा रहा है कि किस पर यकीन करे, विपक्ष के बयानों पर या फिर विदेशी रिपोर्टों पर।
परिणामस्वरूप अखबारों की रोज बदलती सुर्खियों के साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी हालात तेजी से बदल रहे हैं और देशवासी हैरान परेशान!
वैसे भी इस समय दो राज्यों में चुनावों के चलते देश की राजनीति दिलचस्प दौर से गुजर रही है खासकर तब जब उनमें से एक राज्य प्रधानमंत्री का गृहराज्य हो।
हिमाचल में जनता अपना फैसला ले चुकी है गुजरात में परीक्षा अभी बाकी है। कहा जा रहा है कि इन राज्यों के चुनावी नतीजे, खास कर गुजरात के, आगामी लोकसभा चुनावों के दिशा निर्देश तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
ऐसा कुछ समय पहले इसी साल फरवरी में होने वाले यूपी चुनावों के समय भी कहा गया था। तब नोटबंदी से उपजे हालातों के मद्देनजर विशेषज्ञों की नजर में भाजपा की राह कठिन थी लेकिन उसने 404 सीटों की संख्या वाली विधानसभा में 300 का आंकड़ा पार करके अपने विरोधियों ही नहीं तमाम चुनावी पंडितों को भी चौंका दिया था। § Read_More....

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कहानीः हिन्दी

हिन्दी की प्रोफेसर हिमानी तेजवानी जी के घर आज सुन्दर सी बच्ची ने जन्म लिया। हिमानी अपनी बच्ची का चेहरा देख बेहद खुश थीं। उन्होंने अपनी बच्ची का नाम हिन्दी रख दिया। एक दिन दुर्भाग्य से ट्रेन दुर्घटना में हिमानी और उनके पति केशव की मौत हो जाती है। धन के लालच में हिमानी की भाभी हिन्दी को गोद ले लेती है। हिन्दी का बचपन अपनी मामी की डांट और फटकार में बीत रहा है। वह अपना दुख कविता, कहानी, गजल, गीत और लेख को लिखकर हमेशा कम रहती है। एक दिन उसकी मामी चिल्लाकर कहतीं हैं कि यह सब हिन्दी में ना लिख कर अंग्रेजी में लिखा कर, तुझे इतने मंहगे स्कूल में पढ़ा रहे फिर भी तू अंग्रेजी में बात करना नहीं सीख पायी। देखो! पड़ोस में सब के बच्चे अंग्रेजी बोलते हैं। हिन्दी ने दबी आवाज में कहा,‘हिन्दी में हमने स्कूल टाॅप किया है मामी जी।’ मामी ने उसका मुँह दबाते हुये कहा, ‘जब तक अंग्रेजी बोलना नही आता तब तक तेरी पढ़ाई – लिखायी सब बेकार है समझी। अब इस साल भी तू अंग्रेजी में बात करना नही सीखी तो अगली साल तेरी पढ़ाई छुड़वा देगें समझी। समाज में मेरी नाक कटा रखी है बिल्कुल और हाँ तेरे ये किस्से-कहानी की नोटबुक भी जला देगें। यह कहते हुये वह वहां से चली गयीं। हिन्दी को उसके मामा जी ने एन्ड्रायड फोन लाकर दिया था। उसने मामी के डर से अपना ज्यादा से ज्यादा साहित्य सोसल साइट्स पर अपलोड कर दिया। § Read_More....

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क्या बीजेपी मप्र में ऐसे जाएगी 300 पार ?

मध्य प्रदेश के चित्रकूट उपचुनाव में भाजपा ने जिस प्रकार अपनी हार को स्वीकार किया है उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जहाँ एक तरफ काँग्रेस इस जीत से उत्साहित है और इसे प्रदेश में अपने वनवास की समाप्ति और भाजपा के वनवास की शुरुआत का संकेत मान रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा इसे अपनी हार ही मानने को तैयार नहीं है।
उसका कहना है कि यह सीट तो कांग्रेस की पारंपरिक सीट थी जो अभी तक कांग्रेस के ही पास थी और फिर से उसी के पास चली गई। हमारे पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं तो खोने का सवाल ही नहीं। भाजपा की इस सोच पर गालिब का एक शेर गुस्ताखी माफ, कुछ फेरबदल के साथ अर्ज है,
‘तुमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है ।’
क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के तीन दिन के प्रचार, 64 सभाएँ और रोड शो, आदिवासी के यहाँ रात ठहरना, भोजन करना, इसके अलावा सरकार के 12 मंत्री, संगठन के नेताओं, यहाँ तक कि उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की जनसभाओं के बाद भी अगर यह नतीजे भाजपा को अपेक्षित थे तो फिर इतने तामझाम करके शिवराज सिंह ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के संकेत क्यों दिए? और अगर इस उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए अपेक्षित नहीं थे तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि केवल अपनी हार को ‘शिरोधार्य’ करने के बजाय शिवराज इस हार का आत्ममंथन करते? § Read_More....

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मिसाइल क्षेत्र में ताकतवर होता भारत

– डाॅ0 लक्ष्मी शंकर यादव
भारत की प्रथम स्वदेश निर्मित परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल निर्भय का 7 नवम्बर को सफल परीक्षण किया गया। यह परीक्षण सुबह 11.20 बजे ओडिशा के चांदीपुर के एकीकृत परीक्षण रेंज (आइटीआर) के लांच पैड-3 से विशेष रूप से डिजाइन किए गए एक मोबाइल लांचर के द्वारा किया गया जो कि सफल रहा। भारत के पास अभी तक 300 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस है। इसे भारत और रूस ने संयुक्त रूप से मिलकर बनाया है। अब इस नए परीक्षण के बाद भारत के पास लम्बी दूरी तक मार करने में सक्षम निर्भय मिसाइल हो गई है। इसकी मारक क्षमता 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा है। निर्भय मिसाइल को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने पूर्णतया अपने दम पर बनाया है। इसके परीक्षण के मौके पर डीआरडीओ एवं आइटीआर से जुड़े अनेक वरिष्ठ अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों का दल मौजूद था। मिसाइल परीक्षण के तुरन्त बाद डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने जानकारी दी कि परीक्षण की सभी शुरूआती प्रक्रिया सफल रही और विस्तृत आॅकलन के लिए ट्रैकिंग प्रणाली से डेटा हासिल किया जा रहा है। इसके कुल तीन परीक्षण किए जाने थे जिन्हें नौ नवम्बर तक पूरा कर लिया गया है। § Read_More....

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क्या हार्दिक मान सम्मान की परिभाषा भी जानते हैं?

डाँ नीलम महेंद्र

मैं वो भारत हूँ जो समूचे विश्व के सामने अपने गौरवशाली अतीत पर इठलाता हूँ।
गर्व करता हूँ अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति पर जो समूचे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अभिमान होता है उन आदर्शों पर जो हमारे समाज के महानायक हमें विरासत में देकर गए हैं।
कोशिश करता हूँ उन आदर्शों को अपनी हवा में आकाश में और मिट्टी में आत्मसात करने की ताकि इस देश की भावी पीढ़ियाँ अपने आचरण से मेरी गरिमा और विरासत को आगे ले कर जाएं। लेकिन आज मैं आहत हूँ, क्षुब्ध हूँ, व्यथित हूँ, घायल हूँ, 
आखिर क्यों इतना बेबस हूँ?
किससे कहूँ कि देश की राजनीति आज जिस मोड़ पर पहुंच गई है या फिर पहुँचा दी गई है उससे मेरा दम घुट रहा है?
मैं चिंतित हूँ यह सोच कर कि गिरने का स्तर भी कितना गिर चुका है।
जिस देश में दो व्यक्तियों के बीच के हर रिश्ते के बीच भी एक गरिमा होती है वहाँ आज व्यक्तिगत आचरण सभी सीमाओं को लांघ चुका है?
लेकिन भरोसा है कि जिस देश की मिट्टी ने अपने युवा को कभी सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस,राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह जैसे आदर्श दिए थे, उस देश का युवा आज किसी हार्दिक पटेल या जिग्नेश जैसे युवा को अपना आदर्श कतई नहीं मानेगा। § Read_More....

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क्या विश्व महाविनाश के लिए तैयार है

डाँ नीलम महेंद्र

अमेरीकी विरोध के बावजूद उत्तर कोरिया द्वारा लगातार किए जा रहे हायड्रोजन बम परीक्षण के परिणाम स्वरूप ट्रम्प और किम जोंग उन की जुबानी जंग लगातार आक्रामक होती जा रही है।
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब जुलाई में किम जोंग ने अपनी इन्टरकाँन्टीनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
क्योंकि न तो ट्रम्प ऐसे उत्तर कोरिया को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जिसकी इन्टरकाँटीनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइलें न्यूयॉर्क की तरफ तनी खड़ी हों और न ही उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम बन्द करने के लिए।
इस समस्या से निपटने के लिए ट्रम्प का एशिया दौरा महत्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इस यात्रा में उनकी विभिन्न एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से उत्तर कोरिया पर चर्चा होने का भी अनुमान है।
मौजूदा परिस्थितियों में चूंकि दोनों ही देश एटमी हथियारों से सम्पन्न हैं तो इस समय दुनिया एक बार फिर न्यूक्लियर हमले की आशंका का सामना करने के लिए अभिशप्त है।
निश्चित ही विश्व लगभग सात दशक पूर्व द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए न्यूक्लियर हमले और उसके परिणामों को भूल नहीं पाया है और इसलिए उम्मीद है कि स्वयं को महाशक्ति कहने वाले राष्ट्र मानव जाति के प्रति अपने दायित्वों को अपने अहं से ज्यादा अहमियत देंगे। § Read_More....

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प्रत्येक भारतीय के लिए राष्ट्रधर्म ही होना चाहिए सर्वोच्च धर्म

आशीष शुक्ला

एक राष्ट्र तब तक परास्त नहीं हो सकता जबतक वह अपनी संस्कृत, सभ्यता और संस्कृतिक मूल्यों की रक्षा कर पाता है, इतिहास गवाह है कि, जब-जब हमने अपनी संस्कृतिक विरासत को छोड़ा है तब-तब हमारा राष्ट्र खंड-खंड में विभाजित हुआ है। और इसी का लाभ उठाकर तमाम आक्रंताओं ने हमारे राष्ट्र में कइयों बार लूट-खसोट मचाई है। हमने अपने इतिहास से भी सीख न लेते हुए वैदिक काल से चली आ रही वर्ण व्यवस्था को आज भी अपने समाज में स्थान दे रखा है। भले ही हम इक्कीसवीं शताब्दी में रह रहे हों और खुद को आधुनिक मान रहे हों लेकिन, जिस प्रकार आज हमारा राष्ट्र जाति और धर्म के नाम पर खंड-खंड में बंटा हुआ है इससे हमारी आधुनिकता का खूब पता चल रहा है। निश्चित रूप से भारतीय समाज ने विश्व के तमाम क्षेत्रों में जाकर इस समाज के मान को बढ़ाया है, किंतु जब हम धरातल पर आकर किसी निष्कर्ष को निकालते हैं तब हमारे हाथ सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी विचार धारा का खोखला पन ही हाथ आता है।
यह अलग बात है कि हाल ही में केरल राज्य ने समानता का एक नया उदाहारण पेश किया है, केरल के ट्रावनकोर देवास्वामी मंदिर की नियुक्ति समिति ने अपने पुजारियों के रुप में 36 गैर-ब्राह्मणों का चुनाव किया है, जिसमें छः दलित श्रेणी के हैं, केरल के धार्मिक स्थानों पर जातिगत भेदभाव का एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन जिस प्रकार का यह नया अभूतपू्र्व कदम उठाया गया है इसको देखकर कहा जा सकता है कि देश में समानता की लव जल चुकी है। हालांकि यह देखना होगा कि किस प्रकार गैर-ब्राह्मण पुजारियों को वहां के श्रद्धालु स्वीकार करते हैं।
सदियों से हमारा समाज जातिवाद, असमानता, वह अस्पृश्यता का शिकार रहा है। अगर हम इतिहास पर गौर करें तो वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था को निम्न चार भागों में बांटा गया था, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र। जिसमें ब्राह्मण वर्ण का कार्य लोगों को शिक्षा देने का, क्षत्रिय का लोगों की रक्षा करने, वैश्य का व्यापार एवं शूद्र का इन सभी की सेवा करने का कार्य हुआ करता था। § Read_More....

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