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डाॅ0 आशा त्रिपाठी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘‘रामायण में राजनीति’’ का हुआ लोकार्पण

कोलकाता, जन सामना ब्यूरो। विगत दिनों कोलकाता में श्री बड़ा बाजार कुमारसभा पुस्तकालय, कोलकोता द्वारा आयोजित डा0 हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान समारोह में महामहिम  राज्यपाल प0बं0 केसरीनाथ त्रिपाठी के करकमलों से डा0 आशा त्रिपाठी, पूर्व प्राचार्या महिला महाविद्यालय द्वारा सम्पादित और सोशल रिसर्च फाउण्डेशन, कानपुर, उ0प्र0 द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘‘रामायण में राजनीति’’ का भव्य लोकार्पण किया गया। बहुत ही सुखद अनुभव रहा कि वहाँ पर लोगों ने जिज्ञासापूर्ण जानकारी के साथ पुस्तक को हाथों हाथ लिया।

रामायण में राजनीति: पुस्तक वाल्मीकि कृत ‘‘रामायण’’ पर आधारित है न कि तुलसीदास कृत ‘‘रामचरित मानस’’ पर। रामायण विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ है। धार्मिक दृष्टि से तो हिन्दुओं के लिए ‘‘रामायण’’ एक अनुपम ग्रन्थ है, परन्तु धार्मिक भावनाओं के अलावा भी उसमें बहुत कुछ है। जो लोग भगवान रामचन्द्र को ईश्वर मानने के लिए तैयार नहीं उनके मनन करने योग्य भी उसमें बहुत कुछ सामग्री है। राजनीतिक दृष्टिकोंण से देखने पर रामायण में धर्म आच्छादित राजनीतिक दाँव पेंच के दर्शन होते हैं। यद्यपि धर्म और राजनीति के दायरे अलग-अलग हैं पर दोनों की जड़े एक हैं। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है तो राजनीति अल्पकालीन धर्म है। धर्म का काम है कि अच्छाई करे और उसकी स्तुति करें, और राजनीति का काम है बुराई से लड़े और उसकी निन्दा करे। जब धर्म अच्छाई न करे और केवल स्तुति भर करता है तो वह निष्प्राण हो जाता है। और राजनीति जब बुराई से लड़ती नहीं केवल निन्दा भर करती है तो वह कलही हो जाती है। धर्म और राजनीति का अविवेकी मिलन दोंनों को नष्ट कर देता है फिर भी जरूरी है कि धर्म और राजनीति एक-दूसरे से सम्पर्क न तोड़ें और मर्यादा निभाते रहें। पुस्तक प्रारम्भ होती है पारिवारिक राजनीति से जो आज धीरे-धीरे सारे समाज को क्या, वैश्वीकरण के कारण अब सारे विश्व को प्रभावित कर रही है। इस पुस्तक में राजनीति से सम्बन्ध रखने वाली ऐसी ही कुछ घटनाओं जैसे राम-वनवास, बालि-वध, राम की नीति, लंका की चढ़ाई आदि का विवेचन किया गया है। यह पुस्तक समकालीन समाज और राजनीति में पनप रही पतोन्मुख भावनाओं और समस्याओं को समझने के लिये एक पारम्परिक संदर्भ स्वरूप है।