Wednesday, October 17, 2018
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क्यों नहीं थम रहा हादसों का दौर?

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली और उन्हें कभी ना भूलने वाला गम दे दिया। साथ ही उन लोगों के दिलो दिमाग पर उन तसवीरों ने अपनी अमिट छाप छोड़ दी होगी जो उस हादसे के दौरान काल के गाल में समाने से बच गए। हादसा जो हुआ उस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए बल्कि उस पर गहनता से विचार-विमर्श होना चाहिए कि जो दुर्घटना हुई उसके लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है ? साथ ही वाराणसी के अलावा लखनऊ, कानपुर महानगर सहित अन्य तमाम जगहों में भी ऐसे निर्माणाधीन अनेक पुलों से लोग आज भी गुजर रहे हैं। इतना ही नहीं हर कहीं खुले में निर्माणकार्य चल रहा है। इस दौरान धूल व गर्द सबओर उड़ती देखी जा सकती है। साथ ही उनके नीचे से लोग चल रहे देखे जा सकते हैं और ऊपर काम चल रहा होता है। इससे सवाल यह उठता है कि निर्माणाधीन स्थानों पर किसी प्रकार की सुरक्षा क्यों नहीं होती? आखिर इन जिम्मेदार लोगो को दुर्घटना से पहले क्यों नहीं दिखता कुछ? इतना बड़ा हादसा घटित होने के बावजूद अभी भी तमाम निर्माणाधीन स्थलों पर न तो सुरक्षा के मानकों का पालन हो रहा है, न ही आम आदमी की जान की परवाह। यह कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि रिश्वत और भ्रष्टाचार ने सभी को किनारे लगा दिया है।
यह सवाल भी जेहन में आता है कि जिस एमडी को अखिलेश यादव की सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया था, उसी एमडी को भाजपा की सरकार में फिर एमडी क्यों बनाया गया? घटित हादसों पर हो हल्ला तो बहुत मचता है लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि जब दुर्घटनायें घटित होती हैं तो निचले स्तर के कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है लेकिन उच्च स्तर वाले अधिकारी मलाई खाते रहते हैं। वहीं यह भी देखने को मिला है कि शायद ही कोई हादसा ऐसा रहा हो जिसमे कोई बड़ी कार्रवाई हुई हो और कभी किसी को कोई बड़ी सजा दी गई हो।
घटना होने के कुछ समय के अंतराल पर एक नए हादसे के हम गवाह बनते हैं। हर बार सबक सीखने की बात भी कही जाती है, पर अनुभव यही बताता है कि किसी ने कोई सबक नहीं सीखा है। उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो पिछले 10 वर्षों में करीब आधा दर्जन ऐसी ही घटनाएं घटित हो चुकी हैं और सावधानी बरत कर इन घटनाओं से आसानी से बचा जा सकता था।
यह भी सोचने की बात है कि हर थोड़े दिन पर मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री से लेकर मुख्य सचिव, सचिव और स्थानीय प्रशासन के बड़े अधिकारी भी समीक्षाएं करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ये लोग किस बात की समीक्षा करते हैं ? इनकी समीक्षा में होता क्या है ? इनकी जिम्मेदारियां क्या हैं ? क्या जिले के अधिकारियों को यह नहीं पता रहता कि उनके शहर में क्या क्या हो रहा है? यह कटु सत्य है कि जिले के आलाधिकारी अपने वातानुकूलित कैम्प कार्यालयों में ही ‘‘समीक्षा और निर्देश’’ का खेल खेला करते हैं। वो अपने अपने कक्षों से बाहर निकलकर हकीकत देखना ही नहीं चाहते। वहीं यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जब वो भ्रमण या निरीक्षण पर निकलते हैं तो वो उतना ही देख पाते हैं जितना उन्हें दिखाया जाता है। उन्हें स्वयं कुछ नहीं दिखता। यह सभी पर लागू है चाहे वह अधिकारी हो या मन्त्री।
अगर समय रहते शिकायतों या समस्याओं पर गौर किया जाये और सावधानियां बरती जायें तो तमाम हादसों को रोका जा सकता है लेकिन इस ओर लगातार लापरवाही देखने को मिल रही है। आये दिन हादसे घटित हो रहे हैं और फिर घड़ियाली आंसू बहाकर सहायता रूपी मरहम लगाने का कार्य किया जाता है।
लापरवाही के नतीजे ही है कि कहीं स्कूली बच्चे हादसे का शिकार हो रहे हैं, कहीं जहरीली शराब लोगों की खुशियां छीन रही है, अस्पतालों में मासूम काल के गाल में समा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी को निभाने में लापरवाही बरतने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अधिकारियों को कानून का भय ही नहीं क्योंकि उन्हें ‘‘भ्रष्टाचाररूपी कवच’’ की सुरक्षा जो प्राप्त है।