Sunday, November 8, 2026
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विविधा

मोटा अनाज खाओ सेहत बनाओ

सांवा, मकरा, मकई , बाजरा, कोदो,
कुटकी, जौ, मक्का, चीना, ज्वार लो।
इनको खाकर स्वास्थ्य संवार लो,
मोटे अनाज की उपज अपना लो।
सारे व्यंजन तुम इससे बना लो,
चाहे इडली डोसा और अप्पम हो।
रोटी कचौड़ी दलिया और खिचड़ी हो,
यह बहुत ही रुचकर लगता सबको।
मालपुआ लड्डू बर्फी खीर शकरपारा,
बेहिसाब भाता है बूढ़े बच्चों को सारा।

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भारत को स्वर्ग बनाना है!

भारत को स्वर्ग बनाना है,
जन-जन में संयम लाना है।
पोशाक ज्ञान का द्योतक है,
यह मिथ्या भाव मिटाना है।
पश्चिमी सभ्यता भूलाना है ,
भ्रम उनका दूर भगाना है।
स्वार्थ में फंसा जग सारा है,
ये भ्रमित सबको करता है।
जो सोए हैं उन्हें जगाना है,
जो जगे है उन्हें समझना है।
भ्रम की नींद से उठाना है,
सत्कर्म में इनको लगाना है।

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‘अभिनंदन’

उपवन से चुन-चुन फूलों का,
यह गुलदस्ता तैयार किया।
हे अतिथि आपके स्वागत का,
हम नेह बिछाए इंतजार किया।
है आज प्रफुल्लित हृदय हमारा,
हम करते हैं अभिनंदन तेरा।
तू मालिक हो सब खुशियों का,
जीवन में तेरे ठहरें खुशियां।

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संकटशाला

अभिनंदन और वंदन तेरा,
तुझे समर्पित तन मन मेरा।
मैं खुश रंग हूं नवल सवेरा,
जिससे गहरा ये नाता मेरा।
कण-कण में प्रभु ध्यान तेरा,
सत्कर्म करना है काम मेरा।
जग में सब कुछ मिथ्या तेरा,
यह क्षण भंगुर सा डेरा मेरा।

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बुढ़ापे की लाठी

मैंने सोचा था तुमको ,
तुम मेरे बुढ़ापे की हो लाठी।
जो जोड़ा था तिनका-तिनका ,
आज यहां सब बिखर गया ।
भौतिकता की चमक में तू बेटा ,
माता-पिता को भूल गया।
ख़ुद भूखे रहकर हम दोनों ने,
तुम बच्चों को अच्छी शिक्षा दी।
तुम कैसे भूल गए उनको,
जिसने जीवन तेरा संवारा।
आज उनके अपने बच्चों ने,
बेसहारा करके छोड़ दिया।
छोड़ उन्हें वृद्ध आश्रम में,
ख़ुद जाकर परदेस बसा।

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शक्ति आराधना पर्व नवरात्रि

माँ शब्द में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है। यह सृष्टि भी तो हमारी माँ ही है, जो हमारा लालन-पालन और भरण-पोषण करती है। उदार भाव से हमारे उत्थान को प्रबलता प्रदान करती है। इसी भाव के कारण हम सदैव पूजा-अर्चना में सर्वप्रथम पृथ्वी माँ को ही प्रणाम करते है। इस समय तो ममतामयी माँ शेर पर सवारी कर भक्तों के कल्याण के लिए आई है। हमें सकारात्मक ऊर्जा एवं शक्ति प्रदान करने के लिए माँ अखंड ज्योत के द्वारा हमारे जीवन के अंधकार का भी समूल नाश कर देती है। करुणामयी, भक्तवत्सल माँ तो शुभता प्रदान करने वाली है। मन के संशय को नाश करने एवं हमारी अभिलाषाओं को साकार रूप देने माँ नौ दिन विभिन्न-विभिन्न रूपों से हमें गुण, ऊर्जा, उत्साह एवं उमंग से भर देंगी। हमें अपने आनंद का विस्तार करने के लिए माँ के सच्चे दरबार पर अडिग विश्वास करना होगा। भक्तिभाव में मग्न होकर हमें माँ की पूजा-अर्चना एवं उपासना करनी है। विघ्नों को हरने वाली माँ, नव उत्साह जननी माँ, धन-धान्य के भंडार देने वाली माँ, त्रिभुवन में निवास करने वाली माँ, मन के द्वार को आलौकित करने वाली माँ की स्तुति हम मंगल कलश की स्थापना के साथ करेंगे। भय हारिणी एवं भव तारिणी माँ के प्रत्येक स्वरुप का नमन और वंदन करेंगे।
देवी दुर्गा तो दुर्गति का भी विनाश कर देती है। हर नवरात्रि की तरह इस बार भी हम देवी के दर्शन, उनकी दया, कृपा, करुणा एवं आशीर्वाद के अभिलाषी होंगे। उत्साह, उमंग और भक्ति भाव से ओत-प्रोत होकर हमें देवी के आराधना पर्व को उत्सव का स्वरुप देना होगा। बच्चों को भी माँ के विभिन्न स्वरूपों से अवगत कराना होगा। माँ की आराधना हमें बहन-बेटी के सम्मान को सुरक्षित रखने की भी प्रेरणा देती है। माँ के प्रति अगाध श्रृद्धा हमें एक सम्मानित समाज के निर्माण की ओर अग्रसर करती है, जिसमें समस्त प्राणियों में नारी के प्रति सम्मान का भाव सदा जीवंत रहें। माँ तो धैर्य, साहस, शक्ति एवं वात्सल्य का अप्रतिम रूप है। माता हमें जीवन में नवीन दिशा प्रदान करें।

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हवा भी रुख बदलेगी

हवा भी रुख बदलेगी
मेरे हौसलों के सामने ,
हवा भी रुख बदलेगी।
दुश्वारियां कितनी भी आए,
यह जज़्बा मगर न बदलेगा।
आज भी न्याय में है शक्ति,
अन्यायी खुद पानी भरेगा ।
ऐ कमज़ोर समझने वालों,
मेरी शक्ति का है अंदाज़ा।
मैं मुई ख़ाल की धौंकनी,
तुझको जला राख कर दूंगी।
मुझे कुम्हार की चाक समझ
हर रूप में ढ़ालना है पता ।

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बारिश की एक बूंद ने….

बारिश की एक बूंद ने, तपती जमीन से पूछा।
क्यों बन गई हो आतिश, क्यों बन गई हो आतिश।
आवाज़ सुनकर उसकी, ये तपती ज़मीं है बोली।
बेटी- बहू को लेकर सब, कर रहे हैं साज़िश ।
तो होगी क्यों ना आतिश, तो होगी क्यों ना आतिश।
है हर घरों में माचिस तो, होगी क्यों ना आतिश।
अंग्रेजियत के फैशन अब, हो रहे हैं देखो काबिज़।
कम हर घरों में माजिद, तो होगी क्यों ना आतिश।
दिल के चिरागों की यहां, कम हो रही है ताबिश।

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प्रेम दीवानी

तुम मेरे उर के सागर हो
मै प्रेम दीवानी सरिता हूँ
तुम गीत गजल रस छंद मेरे
मै तुम में बहती कविता हूँ

पर्वत से तो निकल पड़ी हूँ
मिलन की आस लिए मन में
जाने कब तक पड़े भटकना
कंकड़ पत्थर के वन में

विरह वेदना की अग्नि में
पल – पल जलती वनिता हूँ

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प्यासी प्यासी भोर

एक नयनजल नभ पर अटका
एक नयन के कोर
रात गई न बरसा सावन
प्यासी प्यासी भोर
फूलों की रतजागी आँखें
टेर सुनाए बेकल
प्रीत तुम्हीं मनमीत तुम्हीं
तुम हीं सावन मैं मोर ।।
छुपा मेघ में चाँद दीवाना
रजनी रोई रोई
ये सब बादल सूखे सूखे
बरसे कोई कोई
जादूगर से उस बादल का
निरा अनूठा तौर।
रात गई न बरसा सावन
प्यासी प्यासी भोर ।।

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