दुविधा नदी को भारी है, सागर का पानी खारी है
डरती जाती, बहती जाती, क्या करे, बेचारी नारी है
बेबस मन की हलचल है, लहर नहीं ये धड़कन है
तड़प रही है मिलने को, मिलने में भी तड़पन है
मंजिल मेरी सागर है, मन में यह उच्चारी है
दुविधा नदी को भारी है………
बंधन तट के दोनों ओर, और नहीं है कोई ठौर
सागर में ही मिल जायेगी, नदी रही है ये ही सोच
मंजिल अपनी सागर करली, राहों में ही वो हारी है
दुविधा नदी को भारी है…………..
विविधा
छा गया जेहन पर
छा गया जेहन पर सुन्दर सा जो ये अक्स है
सिर्फ साया है किसी का या कोई सख्श है।
बुला रहा जो दूर से ही कर इशारे मुझे
है आसमाँ का चाँद या थाली में कोई अक्स है।
दिख रही है खूबसूरत आज फिर ये जमीं
जो जमीं पर छा रहा वो आसमाँ का अक्स है।
बज रही है मन की वीणा तार भी झंकृत हुए
सोच कर बस साथ मेँ जो किसी का अक्स है।
भूलकर सब जो जमीं नभ से है जा मिली
दिख रही है कुछ अलग कुछ अलग सा अक्स है।
तन भी सुंदर मन भी सुंदर सुंदर समां ये हो गया
छा रहा उस पर जो आज सुंदर सा ये अक्स है।
‘‘तेरा धीमे से कुछ कहना’’
परीशाँखातिरी दिल को जुदाई क्यूँ नहीं देता
पिघलती आग पर शब-ए-खुदाई क्यूँ नहीं देता।
मेरी तन्हाइयों में हर तरफ बिखरा है सन्नाटा
तेरा धीमे से कुछ कहना सुनाई क्यूँ नहीं देता।
फलक तक बादलों के संग चलती हैं थकी आँखें
तुम्हारा झूम कर आना दिखाई क्यूँ नहीं देता।
वो तय करता है जिद्दत से सफर आकाश से मन का
मगर सपनों के पंखों को ऊँचाई क्यूँ नहीं देता।
ये जो विश्वास फागुन-सा निखरकर गुनगुनाता है
निराशा के धुंधलके को विदाई क्यूँ नहीं देता।
Read More »
खुशियां बस यूं ही कायम रहें…..
रात की थकान से ग्रसित
आंखों में नींद की खुमारी लिये
सुबह उठते ही वो दौड़ती है
रसोई की ओर
खुले बालों का बनाते हुए
हाथों से जूड़ा
भागती है बेतरतीब सी
इधर से उधर
बिखरे घर को संभालते संभालते
भूल जाती है खुद को सम्हालना
फिर भी पाती है पूरे घर से
सिर्फ झिड़की और उलाहना
प्यार की मुहिम
छेड़ जायेगें प्यार की वो मुहिम दोस्तो
ना कहीं गम होगा ना कोई गमजदा होगा
खिलेगीं मुस्करहटें खामोश लवों पे फिर
उतर आयेगा आसमान भी-
प्यार की तमन्ना लिये दिल में
भर लेगा जमीं को अपनी बाहों मे
और चूमेगा टूट के तब
ना रुठेगीं खुशियां किसी के नसीब से
पूरा हर दिल का हर एक अरमां होगा
“ वह अँधेरा क्या फिर दीप्त हो पाएगा “
पंछियों का बसेरा नियत काल तक
पिंजड़े का बखेड़ा नियत काल तक
कौन आया है रहने यहाँ पर सदा
चक्रजीवन जजीरा नियत काल तक
वक्त की करवटों पर पिघल जाएँगे
कल चमकते सितारे भी ढल जाएँगे
आज अट्टालिकाएं हैं जो तनकर खड़ी
खण्डहर में इमारत बदल जाएँगे
तब ये पूजन ये तर्पण पितरपक्ष से
ताप मरुथल का क्या सिक्त हो पाएगा !
बुझ गया जो अतृप्ति में जलकर दीया
वह अँधेरा क्या फिर दीप्त हो पाएगा !!
सपना मांगलिक की कलम से……हिजड़े की व्यथा
कहते विकलांग उसे जिनका, अंग भंग हो जाता
मिलता यह दर्जा मुझको तो, क्यों मैं स्वांग रचाता
झूठ वेश खोखली ताली, दो कोठी बस खाली
जीता आया नितदिन जो मैं, जीवन है वो गाली।
घिन करता इस तन से हरपल, मन से भी लड़ता हूँ
कोई नहीं जो कहे तेरा, मैं दर्द समझता हूँ
तन-मन और सम्मान रौंदे, दुनिया बड़ा सताये
होता मेरे साथ भला क्यों, कोई जरा बताये।
अपनों ने ही त्याग दिया जब, मान गैर क्यों देते
जैसा भी है अपना है तू, गले लगाकर कहते
लिंग त्रुटि क्या दोष माँ मेरा, काहे फिर तू रूठी
फैंक दिया दलदल में लाकर, ममता तेरी झूठी।
खौफ का पर्याय
खौफ का पर्याय खाकी हो गई।
मुल्क की भीवत्स झाँकी हो गई।।
मखमली रिश्ते भी सारे गुम हुए,
अब यहाँ बदरंग राखी हो गई ।।
अब बला अबला बनी इस मुल्क में
बेहया दुश्मन जहाँ की हो गई ।।
अनवरत चिंघाड़ते इस शोर में,
अब मधुर लोरी भी माँ की खो गई।
धन कमाने की कबायद यूँ बढ़ी,
जिन्दगी अब जोड़-बाकी हो गई।।
ये मेरा मन…..
कभी गोटा किनारी लगाता जाता ये मेरा मन
कभी चुनरी लहराता जाता ये मेरा मन
कभी अरमान संजोता जाता ये मेरा मन
कभी टूट कर बिखरता जाता ये मेरा मन
कभी आग बनके दहकता जाता ये मेरा मन
कभी राख बनके सुलगता जाता ये मेरा मन
कभी आँखों में ख्याल बनके सो जाता ये मेरा मन
कभी पलकों में सपने बिखेर जाता ये मेरा मन
Jansaamna