Saturday, April 5, 2025
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स्वागत योग्य एवं अनुकरणीय है शराबबन्दी

मध्य प्रदेश सरकार ने धार्मिक महत्व के 19 नगरों और ग्राम पंचायतों में एक अप्रैल से शराब बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के अनुसार उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मण्डलेश्वर, ओरछा, मैहर, चित्रकूट, दतिया, पन्ना, मण्डला, मुलताई, मंदसौर और अमर कण्टक की नगरीय सीमा में शराब नहीं बिकेगी। इसके अलावा सलकनपुर, कुण्डलपुर, बांदकपुर, बरमानकलां, बरमानखुर्द और लिंग ग्राम पंचायत सीमा में भी शराब की सभी दुकानें और बार बंद करवाने का आदेश दिया गया है। प्रदेश सरकार का यह कदम स्वागत योग्य और अनुकरणीय है। अच्छा होता यदि यह प्रतिबंध पूरे प्रदेश में लागू होता।
मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम नया और पहला नहीं है। बिहार, गुजरात, मिजोरम और नागालैंड में पहले से ही शराब बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है। शराब पर प्रतिबंध लगाने वाला गुजरात इस देश का पहला राज्य है, जहाँ 1960 से ही शराब का निर्माण, बिक्री और सेवन पूर्णतया प्रतिबंधित है। जबकि बिहार में अप्रैल 2016 में शराब बंदी कानून लागू हुआ था। हालांकि प्रतिबंध के बावजूद बिहार में मदिरा सेवन करने वालों की एक बड़ी आबादी है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा कराए गए सर्वे में बिहार के 17 प्रतिशत लोग मदिरा सेवन करते पाए गए।
परन्तु इससे शराब बिक्री पर प्रतिबंध लगाना निरर्थक नहीं हो जाता। उपरोक्त राज्यों में प्रतिबंध लागू होने के कारण ही भारत में शराब पीने वालों की संख्या में काफी हद तक कमी आई है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में 22.4 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं, जबकि 2015-16 में यह प्रतिशत 29.2 था। वहीं, शराब पीने वाली महिलाओं का प्रतिशत 1.2 से घटकर 0.7 हो गया है।
जिन राज्यों में शराब बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है, वहां की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बहुत आगे है। उदाहरण के तौर पर गोवा के 59.1 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश के 56.6 प्रतिशत, तेलंगाना के 50 प्रतिशत, झारखंड के 40.4 प्रतिशत, ओडिशा के 38.4 प्रतिशत, सिक्किम के 36.3 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ के 35.5 प्रतिशत, उत्तराखंड के 32.1 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश के 31.2 प्रतिशत, दिल्ली के 27.9 प्रतिशत, पंजाब के 27.5 प्रतिशत, असम के 26.5 प्रतिशत, केरल के 26 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल के 25.7 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं।
मदिरा व्यापार का प्रमुख पहलू सरकारों को इससे मिलने वाला भारी भरकम राजस्व है, जिसके कारण अन्य प्रदेश सरकारें शराब बंदी का साहस नहीं जुटा पा रही हैं। उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग ने वर्ष 2024-25 में 52,297.08 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है और चालू वित्त वर्ष में 55 हजार करोड़ रुपये से अधिक का लक्ष्य रखा है। पंजाब सरकार को 10,743.72 करोड़ रुपये का राजस्व बीते वित्तीय वर्ष में प्राप्त हुआ, जबकि दिल्ली की प्रदेश सरकार ने 5,068.92 करोड़ रुपये का राजस्व शराब से प्राप्त किया।
हालाँकि, शराब की बिक्री सरकारों के लिए राजस्व का एक बड़ा स्रोत हो सकती है, लेकिन इसका सेवन समाज के लिए किसी भी दृष्टि से हितकारी नहीं है। शराब के सेवन से समाज में आर्थिक और नैतिक पतन होता है। गृह कलह और घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों के पीछे शराब का हाथ है। हाल ही में हमीरपुर जनपद के मुस्करा कस्बे में शराबी पति की प्रताड़ना और गृह कलह से तंग आकर पत्नी ने चाकू से गला रेतकर उसकी हत्या कर दी।
दूसरी ओर, शराब के कारण अक्सर विवाद, मारपीट, हत्या और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं घटित होती हैं। शराब पीने से रोड दुर्घटनाओं की संख्या भी बढ़ी है। इसके बावजूद लोग शराब पीकर वाहन चलाते हैं, जबकि यह कानूनी अपराध है। बिहार जैसे राज्यों में शराब पर प्रतिबंध होने के बावजूद अवैध रूप से शराब बिक रही है, अन्यथा 17 प्रतिशत बिहारी शराबी नहीं होते।
कुल मिलाकर, शराब का सेवन समाज के लिए किसी भी दृष्टि से लाभकारी नहीं है। गुजरात राज्य का शराब मुक्त जीवन उसके विकास में एक अहम भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि गुजरात के विकास मॉडल की चर्चा हर जगह होती है, लेकिन वहां की शराबबंदी नीति की चर्चा कोई नहीं करता। उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
-डॉ. दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)