महाराजगंज/ रायबरेली,पवन कुमार गुप्ता। सड़क निर्माण की मांग को लेकर दूसरे दिन भी अनशनकारी बाबा का धरना शुरू रहा।इस दौरान क्षेत्रीय ग्रामीणों का समर्थन मौके पर दिखाई पड़ा।वहीं अनशनकारी बाबा के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने अहिंसा का मार्ग अपनाते हुए सड़क के बड़े-बड़े गड्ढों में भरे पानी में कागजी नाव चला अपना विरोध व्यक्त किया। बताते चले कि बुधवार को जर्जर हो चुके महाराजगंज इन्हौना वाया मऊ मार्ग एवं सिकंदरपुर से मऊ रोड निर्माण की मांग को लेकर पूरे सुखई तिराहे पर सैकड़ो की संख्या में समर्थको के साथ धरने पर बैठे रामकेवल उर्फ अनशनकारी बाबा द्वारा पहले दिन पैदल मार्च तो वहीं दूसरे दिन सड़क के गड्ढों में कागज की नाव चला सरकार के गड्ढा मुक्त अभियान की हवा निकाल दी है। अनशनकारी बाबा ने कहा कि जब तक सड़क निर्माण का स्टीमेंट पास नही हो जाता तब तक वह इस लड़ाई को जारी रखेंगे।उन्होने कहा कि सरकार गड्ढा मुक्त अभियान को लेकर करोड़ो रुपए वाहवाही में लुटा रही हैं।किन्तु इस सड़क के निर्माण में क्यूं देर की जा रही।इस दौरान जन सरोकार के इस मुद्दे पर अनशनकारी बाबा को जनता का समर्थन दूसरे दिन भी मिलता दिखाई पड़ रहा है।वहीं बुधवार को देर शाम एसडीएम सविता यादव एवं एक्सईएन डी के कुरील द्वारा धरना स्थल पहुंच प्रदर्शनकारियों से बात की गयी।किन्तु सड़क निर्माण को लेकर सिर्फ आश्वासन की घुट्टी देने के चलते वार्ता असफल रही।इस दौरान रणविजय सिंह,दिनेश श्रीवास्तव,राजकुमार उर्फ मोगा सिंह,भोलू सिंह,संतोष सिंह (बहादुरनगर),छेदीलाल पासी, डब्बू सिंह,सौरभ सोमवंशी, रमेश कुमार, सोहनलाल, राजेश कुमार, श्याम कुमार, राजेश पाल सहित सैकड़ो लोग मौजूद रहे।Read More »
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लालगंज/ रायबरेली,पवन कुमार गुप्ता।
ऊंचाहार/रायबरेली,पवन कुमार गुप्ता।
सलोन/ रायबरेली,पवन कुमार गुप्ता।
महाराजगंज/ रायबरेली,पवन कुमार गुप्ता।
उनकी स्वायत्तशासी का स्वीकार करो पितृसत्ता के पक्षधरों, अपनी लकीरों में खुद खुशियाँ भरना सीख गई है, आज की नारी प्रताड़ित होते देहरी के भीतर आँसू बहाना भूल गई है। था एक ज़माना जब महिलाएं कमज़ोर, बेबस, लाचार कहलाती थी। किसी और के तय किए हुए दायरे में सिमटी आज़ादी को तरसती, कोई भी निर्णय लेने से डरती हर हाल में जी लेती थी। तलाक और सेप्रेशन जैसे शब्दों से परहेज़ करती जैसे पति और ससुराल वालें रखें रह लेती थी। पर आज की लड़की मुखर हो गई है ज़िंदगी जीने का द्रष्टिकोण ही बदल लिया है। दहलीज़ के बाहर कदम धरने की फिराक में सदियों की जद्दोजहद से जूझते ख़्वाहिशों को परवाज़ देने कि हिम्मत बटोर ली है। नहीं घबराती अब ज़िंदगी की चुनौतियों से मर्द की प्रतिस्पर्धी बनकर उभर रही है।
कानपुर देहात।