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निजी स्कूल प्रबन्धन बने परेशानी का सबब

⇒परेशान अभिभावकों में व्याप्त है रोष
⇒स्कूलों से ही पाठ्य सामग्री खरीदने का दबाव
कानपुरः राजीव रुहेला। निजी स्कूलों की मनमानी को लेकर शहर के लगभग सभी अभिभावक चिन्तित व परेशान दिखने लगे हैं। इसका मुख्य कारण है कि शहर के ज्यादातर निजी स्कूलों से ही पाठ्य सामग्री बेची जा रही है। पाठ्य सामग्री को स्कूल से खरीदने के लिए ही बाध्य किया जा रहा है जबकि स्कूलों से बेंची जा रही कापियां व किताबों सहित अन्य वस्तुएं बाजार में कम दाम पर उपलब्ध हैं फिर भी अभिभावकों की जेब ढीली करने के लिए प्रबन्धतन्त्र सिकंजा कसे हुए है।
नाम ना छापने की शर्त पर शहर के एक बड़े स्कूल में पढ़ने वाले छात्र के अभिभावक ने बताया कि स्कूल से काॅपी व किताबें ना खरीदने के कारण बच्चों को अन्य तरीकों से प्रताड़ित किया जा रहा है। इस बावत जब मैंने मुख्यमन्त्री जी से शिकायत की तो उसके जवाब में स्कूल प्रबन्धन ने कहा कि आप जहां से चाहो अपने बेटे के लिए पुस्तकें खरीद लो और यह दबाव बनाया कि आप अपने बच्चे को किसी अन्य स्कूल में दाखिला दिलवा लो क्योंकि मेरे यहां जो नियम नियत हैं उनके अनुसार ही आपको चलना पड़ेगा।
ऐसे मामलों से साफ जाहिर होता है कि सरकार के आदेशों व निर्देशों का असर नहीं हो रहा है। निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने में सरकारें घुटने टेकती दिखती हैं।
निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए शहर में कई बार स्वयं सेवी संस्थाएं प्रदर्शन कर चुकी हैं और निजी स्कूलो की मनमानी रोकने के लिए सरकार से मांग कर चुकी हैं। वहीं अभिभावक संघ की मांगों पर भी जरा सा ध्यान नहीं दिया जा रहा है नतीजन निजी स्कूलों के प्रबन्धन का हौंसला बुलन्दी पर है।
खास बात यह है कि कमीशन खोरी के चलते किताबों व कापियों का मूल्य अधिक प्रिंट किया जाता है और अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है और प्रदर्शनों के बावजूद जन प्रतिनिधियों के दावे हवाहवाई साबित हो रहे हैं।
निजी स्कूलों में कोचिंग का चलन भी अभिभावकों को परेशान किए है क्योंकि स्कूलों में ही कार्यरत शिक्षकगण कक्षाओं में उचित शिक्षा नहीं देते है इससे भी कोचिंग व्यवसाय को बढ़ावा मिल रहा है। साथ ही अभिभावकों को शिक्षकगण अपनी कोचिंग में बच्चों को भेजने के लिए दबाव बनाते रहते हैं। अगर बच्चा अपने स्कूल के शिक्षक से कोचिंग नहीं पढ़ता है तो समझिए कि बच्चे का भविष्य सवालों के घेरे में है। कई मामले प्रकाश में आए है जिनमें मेधावियों को कम नम्बर दिए गए जबकि कोचिंग में पढ़ने वाले फिसड्डी छात्रों को ज्यादा अंक दिए गए। इससे मेधावी बच्चों का मनोबल प्रभावित हो रहा है।