Saturday, September 19, 2026
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लेख/विचार

शिक्षक का भटकता उत्तरदायित्व

प्रत्येक वर्ष के सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह मे 5 सितम्बर को हम शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते है। जिस महान शख्शियत के जन्मदिन को हम इस विशेष दिवस का दर्जा दिए है वो थे हमारे स्वतन्त्र भारत के उपराष्ट्रपति ड़ॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन। भारत मे गरीबी और शिक्षा जैसे विषयो पर बहुत काम हुए किन्तु उक्त विषय पर जो काम राधाकृष्णन जी ने किया वो खुद मे अद्वितीय है। आज के वर्तमान समय मे शिक्षा की जो व्यवस्था लागू है वो बेहद निराशाजनक और खेदपूर्ण है। आजकल अयोग्य को योग्य बनाकर उच्च वेतनमान पर धड़ल्ले से नियुक्त किया जा रहा जबकि योग्य संसाधन विहीन होकर दुर्गम जीवन व्यतीत कर रहा।
शिक्षा विभाग पूरी तरह जर्जर और शिक्षक पूरी तरह मानसिक अपंग हो चुके है। मैं ऐसे कई उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण और किदवन्ति दे सकता हूँ जिसमे योग्य और मेहनती शिक्षक कम वेतनमान पर जीतोड़ मेहनत कर रहे और अयोग्य और लाख पचास हजार वेतन लेने वाले शिक्षक शिक्षा व्यवस्था को धाराशायी कर रहे। प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों तेजी से चरमराई है कारण शिक्षको की दबंगता और शिक्षण कार्य के पीछे नीरसता है। कई विद्यालयो मे तो शिक्षक विद्यालय खुलने के कई घण्टे बाद पहुचते है ऐसे मे अभिवाहक कैसे उस विद्यालय के प्रति आश्वस्त होकर अपने पाल्य को वहाँ पढ़ने भेजे।

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आखिर गणपति विसर्जन क्यों करते हैं….

गणेशोत्सव करीब ही है। बड़े मनोयोग और श्रद्धा से लोग गणपति को घर लाते हैं। दस दिन तक विराजने वाले गणपति की पूजा आराधना करते हैं। वैसे इस उत्सव को बाल गंगाधर तिलक ने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए और भारतीयों को एकता के सूत्र में बांधने के लिए शुरू किया था जोकि अब उत्सव के रूप में देश में कई जगहों पर बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने लगा है। वैसे तो गणपति के विषय में बहुत सी कथाएं प्रचलित है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणपति का विसर्जन क्यों किया जाता है? पुराणों में एक कथा प्रचलित है कि वेद व्यास जी ने गणेश चतुर्थी से महाभारत की कथा दस दिन तक लगातार सुनाई थी और इस कथा को गणेश जी ने अक्षरशः लिखा था। दस दिन बाद जब वेदव्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि दस दिन की अथक मेहनत से गणेश जी का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है तो वेदव्यास जी ने तुरंत गणेश जी को एक कुंड में ले जाकर ठंडा किया। इसीलिए गणेश जी की स्थापना करके चतुर्दशी को उन्हें शीतल किया जाता है।

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‘एक ही छत के नीचे हो, अब सब धर्मों की प्रार्थना’‘

अब समय आ गया है जबकि सभी धर्मों के लोगों को एक ही स्थान पर एकत्रित होकर एक ही परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करनी चाहिए। अर्थात एक ही छत के नीचे हो-अब सब धर्मों की प्रार्थना’ हो। अज्ञानता के कारण आज एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये अवतारों को अलग-अलग मानने के कारण ही धर्म के नाम पर चारों ओर जमकर दूरियां बढ़ रही है, जबकि सभी अवतार एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये हैं। इस प्रकार हम सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं। लैटिन भाषा में रिलीजन के मायने जोड़ना होता है। अर्थात जो जोड़े वह धर्म है तथा जो तोड़े वह अधर्म है। रामायण में तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा है कि ‘जब जब होई धर्म की हानि – बाढ़हि असुर, अधम अभिमानी। तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा – हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है और संसार में असुर, अधर्म एवं अन्यायी प्रवृत्तियों के लोगों की संख्या सज्जनों की तुलना में बढ़ जाने के कारण धरती का संतुलन बिगड़ जाता है, तब-तब परम पिता परमात्मा कृपा करके धरती पर अपने प्रतिनिधियों (अवतारों) कृष्ण, बुद्ध, अब्राहीम, मुसा, महावीर, जरस्थु, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि को मानवता का मार्गदर्शन कर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए युग-युग में विविध रूपों में भेजते रहे हैं।

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निर्दोष कानूनी प्रक्रिया से साबित होते हैं प्रेस कांफ्रेंस से नहीं

“गैरों में कहाँ दम था हमें तो अपनों ने लूटा, हमारी कशती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।“
आज कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के पूर्व वित्तमंत्री चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे। क्योंकि 2007 के एक मामले में जब वे 2019 में गिरफ्तार होते हैं तो उसी के बयान के आधार पर जिसकी मदद करने का उनपर आरोप है। जी हाँ वो “इंद्राणी मुखर्जी” जो आज अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में जेल में हैं अगर इंद्राणी मुखर्जी आज जेल में नहीं होतीं तो भी क्या वो सरकारी गवाह बनतीं? जवाब हम सभी जानते हैं और शायद यह खेल जो खुल तो 2007 में ही गया था बोफ़ोर्स घोटाले, 2जी घोटाले, यूटीआइ घोटाले, ताज कॉरिडोर घोटाले, यूरिया घोटाले एयरबस घोटाले, स्टैम्प पेपर घोटाले जैसे अनेक घोटालों की ही तरह सबूतों और गवाहों के अभाव में कागजों में ही दफन हो जाता। चिदंबरम दोषी हैं या नहीं ये फैसला तो न्यायालय करेगा लेकिन खुद एक वकील होने के बावजूद उनका खुद को बचाने के लिए कानून से भागने की कोशिश करना, सीबीआई के लिए अपने घर का दरवाजा नहीं खोलना, उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई के अफसरों का उनसे घर की दीवार फांद कर अंदर जानासमझ से परे है।

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कश्मीर अभी इम्तिहान आगे और भी है।

कश्मीर में “कुछ बड़ा होने वाला है” के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा लेकिन यह समझ से परे है कि कश्मीर के राजनैतिक दलों के महबूबा मुफ्ती फ़ारूख़ अब्दुल्ला सरीखे नेता और कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष जो कल तक यह कहता था कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य कार्यवाही नहीं है बल्कि राजनैतिक है, वो मोदी सरकार के इस राजनीतक हल को क्यों पचा पा रहे हैं। शायद इसलिए कि मोदी सरकार के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था ? घरेलू मोर्चे पर भले ही मोदी सरकार ने इसके संवैधानिक कानूनी राजनैतिक आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी है।

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शिक्षा की नीतियाँ शिक्षकों को बनाने दें – डॉ. दीपकुमार शुक्ल

व्यापक अर्थ में शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व को विकसित करने वाली एक सतत एवं सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के तहत व्यक्ति समाज में वयस्क की भूमिका निभाने के योग्य बन पाता है। शिक्षा शब्द शिक्ष धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है सीखना और सिखाना। सीखने सिखाने की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनवरत चलती रहती है। अनेक विद्वानों का यह भी मत है कि गर्भस्थ शिशु भी माँ के माध्यम से ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता है। इसकी प्रामाणिकता के लिए प्रायः लोग अभिमन्यु का उदाहरण देते हैं। गर्भवती स्त्रियों को महापुरुषों की कथाएँ तथा सदविचार सुनाने की परम्परा भारतवर्ष में प्राचीन काल से रही है। जिसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु में सदविचारों का प्रत्यारोपण करना होता था। जन्म के पूर्व से मृत्यपर्यन्त चलने वाली शिक्षा प्रक्रिया के इस व्यापक स्वरूप को किसी भी मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि तथा व्यवहार में परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। इससे पृथक शिक्षा प्रक्रिया का एक संकुचित स्वरूप भी है। जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को एक निश्चित समय व स्थान (विद्यालय आदि) पर सुनियोजित ढंग से एक निश्चित पाठ्यक्रम तथा निश्चित प्रक्रिया के तहत शिक्षित किया जाता है। परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रमाण-पत्र प्राप्त करना इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य होता है।

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ट्रिपल तलक आस्था नही, अधिकारों की लड़ाई है

ट्रिपल तलाक पर रोक लगाने का बिल लोकसभा से तीसरी बार पारित होने के बाद एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में ही इसे असंवैधानिक करार दे दिया था लेकिन इसे एक कानून का रूप लेने के लिए अभी और कितना इंतज़ार करना होगा यह तो समय ही बताएगा। क्योंकि बीजेपी सरकार भले ही अकेले अपने दम पर इस बिल को लोकसभा में 82 के मुकाबले 303 वोटों से पास कराने में आसानी से सफल हो गई हो लेकिन इस बिल के प्रति विपक्षी दलों के रवैये को देखते हुए इसे राज्यसभा से पास कराना ही उसके लिए असली चुनौती है। यह वाकई में समझ से परे है कि कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष अपनी गलतियों से कुछ भी सीखने को तैयार क्यों नहीं है। अपनी वोटबैंक की राजनीति की एकतरफा सोच में विपक्षी दल इतने अंधे हो गए हैं कि यह भी नहीं देख पा रहे कि उनके इस रवैये से उनका दोहरा आचरण ही देश के सामने आ रहा है। क्योंकि जो विपक्षी दल राम मंदिर और सबरीमाला जैसे मुद्दों पर यह कहते हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उसके फैसले को स्वीकार करने की बातें करते हैं वो ट्रिपल तलाक पर उसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध खड़े हो कर उसे चुनौती दे रहे हैं।

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निजीकरण की ओर बढ़ते सरकारी संस्थान…

सरकारी विभागों के निजीकरण की बात आते ही हम भड़क जाते हैं फिर चाहे वह एयर इंडिया की हो या आजकल रेलवे के निजीकरण को लेकर जो विवाद चल रहा है। निजीकरण क्यों हो रहा है कोई इस बात पर विचार करना ही नहीं चाहता। सरकार व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं ला पा रही है और जिसका आसान विकल्प निजीकरण के रूप में अपना रही है। पहली वजह तो यही है कि अधिकारी वर्ग भ्रष्ट है। वो काम करना ही नहीं चाहते। सुबह 9 से शाम 6 बजे तक की हाजिरी वाली ड्यूटी पूरी कर अपना दिन पूरा कर अपनी तन्ख्वाह जमा करते हैं। ये काम के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही नहीं चाहते। आम आदमी इनकी अकर्मण्यता से त्रसित हो रहा है, हालांकि निजीकरण के बारे में ऐसा तर्क दिया जा रहा है कि यह सिर्फ विशुद्ध मुनाफाखोरी वाली नीति है क्योंकि सुविधाएं तो बढ़ती नहीं लेकिन हर चीज पर अलग से भुगतान का भार बढ़ जाता है।
दूसरी बात रोजगार पर आती है। निजीकरण द्वारा नौकरियां सीमित कर दी जाती है और अनावश्यक लोगों और खर्चों पर नियंत्रण कर लिया जाता है लेकिन निजीकरण के जरिए एक बात देखी जाती है कि जिस काम को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं वह तयशुदा समय सीमा में पूरी हो जाती है। सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ है। मुफ्तखोरी, घूसखोरी, सामानों की चोरी लाइलाज बीमारी बन कर रह गयी है। अकर्मण्यता इस हद तक बढ़ गई है कि लोगों को सुविधाएं नहीं मिल पाती है और उनकी तकलीफों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। टैक्स भरने के बाद भी आमजन की जेब पर बोझ तो पड़ता ही है। निजीकरण द्वारा इन बातों पर लगाम लग जाती है।
इन बातों पर गौर करने के बाद एक बात सवाल उठता है कि सरकार द्वारा दी गई सेवाओं का लाभ अगर जनता सही ढंग से इस्तेमाल करें तो किसी भी विभाग के निजीकरण की समस्या नहीं आएगी। हम खुद जिम्मेदार हैं निजीकरण व्यवस्था को प्रोत्साहित करने में। आज सरकारी बसें चल रही है जो काफी अच्छी सुविधाएं देती है लेकिन जनता प्राइवेट बस में दुगना भुगतान करके उसमें जाना पसंद करती है। जनता द्वारा सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल से सरकार का राजस्व तो बढ़ेगा ही साथ में जनता की सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जाएगा। सरकार को भुगतान करके हम देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बना सकते हैं। कुछ सरकारी विभागों की बात छोड़ दें तो कई जगहों पर सुधार भी हुआ है लेकिन इसमें जनता का सहयोग अपेक्षित है। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के चलते निजीकरण को बढ़ावा मिल रहा हैं। हम विदेशों में जनता को मिल रही सुविधाओं की बात तो करते हैं लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं देते कि वहाँ के लोग भी नियमों का पालन करते हैं। यहाँ जनता ऐसी है ट्रेन में चेन से बंधा मग्गा चुरा कर ले जाते हैं। टू टायर में मिलने वाली नैपकिन, चादर तक चुरा लेते हैं और कोच में ही गंदगी फैलाते हैं।

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जरूरत एक मजबूत विपक्ष की…

कांग्रेस अब भी लोकसभा की चुनावी हार के बाद राहुल के इस्तीफे पर ही बहस-मंथन में जुटी है। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी को अब इससे उबरना चाहिए। कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें पार्टी को स्वयं के आंकलन की जरूरत है। आज देश में एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है। चुनावी दौर में जो सियासी हथकंडे अपनाए गए वो बड़े अजब-गजब थे। यह जो ढकोसले वाली राजनीति का चलन शुरू हुआ है, उससे आप जनता का दिल नहीं जीत सकते, फिर चाहे वह मंदिर जाने से लेकर यज्ञोपवीत पहनना हो या फिर टोपी पहनना। चाहे वह कोई भी दल हो। आज जनता मुद्दे पर ही बात करना चाहती है।
कर्नाटक में इन दिनों नेताओं के इस्तीफे का दौर शुरू है और गठबंधन टूट रहे हैं, इससे साफ जाहिर होता है कि देश में सत्ता का केंद्रीकरण हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस को सियासी रणनीति बदलने की जरूरत है। यह लोकतंत्र के प्रति उसकी जिम्मेदारी है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी की सत्ता पक्ष की आलोचना के लिये एक मजबूत विपक्ष हो। कांग्रेस के लिये जरूरी है कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वह यह जगह भरे। विलाप नहीं, संघर्ष के जरिये। दिखावे की राजनीति से दूर होकर आप काम करिए… लोगों से जमीन पर जुड़िये… एसी कमरे में बैठकर राजनीति नहीं होती… जनता की तकलीफ, दर्द और परेशानियों को समझे। सिर्फ दिखावे की राजनीति के जरिये नहीं। जनता का दिल जीतिए… दूसरे पर कीचड़ उछालने से कुछ नहीं होगा.. अभी सिर्फ जमीं पर पैर जमाइए..खड़े होइए… हमारे भारत को जानिये पहचानिए।

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स्वर्णिम भविष्य के स्वप्न दिखाती नयी शिक्षा नीति

बच्चे देश का भविष्य ही नहीं नींव भी होते हैं और नींव जितनी मजबूत होगी इमारत उतनी ही बुलंद होगी। इसी सोच के आधार पर नई शिक्षा नीति की रूप रेखा तैयार की गई है। अपनी इस नई शिक्षा नीति को लेकर मोदी सरकार एक बार फिर चर्चा में है। चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है जाहिर है इसके विरोध में स्वर उठना भी स्वाभाविक था, तो अपेक्षा के अनुरूप स्वर उठे भी। लेकिन मोदी सरकार इस शिक्षा नीति को लागू करने के लिए कितनी दृढ़ संकल्प है यह उसने अपनी कथनी ही नहीं करनी से भी स्प्ष्ट कर दिया है। दरअसल उसने इन विरोध के स्वरों को विवाद बनने से पहले ही हिन्दी को लेकर अपने विरोधियों की संकीर्ण सोच को अपनी सरकार के उदारवादी दृष्टिकोण से शांत कर दिया। लेकिन बावजूद इसके नई शिक्षा नीति की राह आसान नहीं है। इसके लक्ष्य असंभव भले ही ना हों लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में मुश्किल तो अवश्य ही लग रही हैं। वैसे अब तक की अपनी राजनैतिक यात्रा में मोदी जी ने कई असंभव चीजों को संभव करके दिखाया भी है। और अब यह नई शिक्षा नीति जो कई बुनियादी बदलावों पर आधारित है मोदी सरकार की नई परीक्षा है।

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