Thursday, September 24, 2026
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विविधा

8वीं के बाद छोड़ दिया था स्कूल, आज हैं करोड़ों के मालिक

हर बच्चे के दिमाग की रचना ईश्वर ने अलग-अलग बनाई है। कोई खूब पढ़ कर डिग्रीयां हांसिल करके भी महज़ मैनेजर की पोस्ट तक पहुँच पाते है, तो कोई आठवीं या बारहवीं कक्षा तक भी मुश्किल से पहुँच पाते है, फिर भी अपनी पसंद के क्षेत्र में अपना परचम लहरा कर माँ-बाप का नाम रोशन करते है।
ऐसी ही एक हस्ती है जिसका नाम है त्रीशनित अरोड़ा जिसने पढ़ोगे तो ही आगे बढ़ोगे उक्ति को गलत साबित कर दिया है।

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लोगों की व्यथा, पर हमें क्या

आज हमारी मानसिकता ये है कि जब तक हमें दो वक्त की रोटी और जीवन जरूरत की चीजें उपलब्ध हो जाती है तो समाज में ओरों की ज़िंदगी कैसे कट रही है उससे हमें क्या सरोकार। आज कोरोना और लाॅक डाउन की वजह से कई लोगों के सर से साया छीन गया, कई लोगों की नौकरी चली गई, कई बच्चों की पढ़ाई छूट गई कितनी संघर्षरत ज़िंदगी जी रहे है लोग। आज मुझे ऐसी ही एक परेशान लड़की का ईमेल आया जो सबके साथ साझा कर रही हूँ, और साथ ही सरकार से अपील है की और किसी भी मुद्दे से ज़्यादा जरूरी है इस वक्त लोगों को गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से उपर उठाया जाए। मुझे नहीं पता इसमें कितनी सच्चाई है पर अगर सच है तो सरकार का फ़र्ज़ है कि ऐसे लोगों की परेशानी सुनकर उचित न्याय दिया जाए।
ये ईमेल कुछ इस तरह है,

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दर्द मिटा देती थी

जीवन के उलझन अपने सीखों से सुलझा देती थी
दिल के अंदर पैठ दर्द का तुम पता लगा लेती थी
अपने हाथ उठाके दुआओं में मां मेरे दर्द मिटा देती थी
वक्त ही तो है बदल जाएगा जख्म ही है भर जाएगा
अपने ऐसे ही बातों से मुझमें साहस जगा देती थी
अपने हाथ उठाके दुआओं में मां मेरे दर्द मिटा देती थी
दुनिया ने चाहे जो कहा पर तुमने मुझे हरदम समझा
अपने खट्टे-मीठे बातों से मुझे रोते रोते हंसा देती थी
अपने हाथ उठाके दुआओं में मां मेरे दर्द मिटा देती थी
बीना राय, गाजीपुर उत्तर प्रदेश

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला- कोरोना से मौत पर परिजनों को मिलेगा मुआवजा

प्रवासी मजदूरों को राहत – सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुआवजे सहित दो बड़े फैसले
कोरोना महामारी राहत पर दो दिन में सुप्रीम कोर्ट के 2 बड़े फैसले
मृत्यु पर परिजनों को मुआवजा और वन नेशन वन कार्ड, कम्युनिटी किचन से आम जनता को राहत – एड किशन भावनानी
भारत में कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर से हर नागरिक आर्थिक रूप से त्रस्त हुआ तथा संभावित डेल्टा प्लस प्रकोप से भयग्रस्त और चिंतित है। भारतीय परिवार जिन्होंने अपनों को खोया है उसमें हम सभी और और भी बहुत दुखी हैं। कई बच्चे अनाथ हुए हैं, कई परिवारों के कमाने वाले अब नहीं रहे, उनके सामने भविष्य रूपी पहाड़ खड़ा है उसे पार करने की दुविधा में फंसे हैं। हालांकि सरकारें भी अनेक राहतें उपलब्ध करवा रही है। 28 जून 2021 को ही 6.29 लाख करोड़ का पैकेज दिए हैं। परंतु अगर हम पिछले साल की बात करें तो 14 मार्च 2020 को केंद्र सरकार ने देश में कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों की सहायता के लिए मुआवजे का एलान किया था।

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भारत में वयस्क मताधिकार की कहानी

यह बहुत से लोगों को ज्ञात नहीं है कि प्राचीन भारत के कई हिस्सों में सरकार के गणराज्य के स्वरूप मौजूद थे और बौद्ध साहित्य में कई उदाहरण हैं। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, क्षुद्रक-मल्ला संघ के रूप में जाना जाने वाला एक गणतंत्र संघ था, जिसने सिकंदर महान को मजबूत प्रतिरोध की पेशकश की थी। यूनानियों ने भारत में कई अन्य गणतांत्रिक राज्यों का विवरण छोड़ा है, जिनमें से कुछ को उनके द्वारा शुद्ध लोकतंत्र के रूप में वर्णित किया गया था जबकि अन्य को “कुलीन गणराज्य” कहा गया था।

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टॉय कैथॉन 2021 – भारत को खिलौना निर्माण का वैश्विक हब बनाने की रणनीति

आत्मनिर्भर भारत अभियान में लोकल फॉर वाेकल के तहत भारत को खिलौना निर्माण में वैश्विक हब बनाने का रणनीति रोडमैप सराहनीय – एड किशन भावनानी
भारत की 135 करोड़ जनता ने कोरोना महामारी की दूसरी लहर को जन भागीदारी मंत्र के साथ रोकने में सफलता प्राप्त कर रहे हैं और तीसरी लहर को भी विफल करने और अर्थव्यवस्था को खोलने के लिए जनभागीदारी का मंत्र लगातार अपनाने के लिए संकल्पित हैं।…बात अगर हम अर्थव्यवस्था को खोलने और 5 ट्रिलियन अमेरिकन डॉलर की अर्थव्यवस्था का हमारा सपना साकार करने के लिए आत्मनिर्भर भारत, लोकल फॉर वोकल बनना है। हर भारत वासी को अपने लोकल के लिए वोकल बनना है। हमें न सिर्फ लोकल प्रॉडक्ट्स खरीदने हैं, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है। हमें पूरा विश्वास है कि हमारा देश ऐसा कर सकता है।

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पेरणा समुदाय की महिलाएं- शादी या कमाई का ज़रिया

पेरणा जाति की महिलाओं के लिए शादी एक अभिशाप है। इस जाति की महिलाओं का शादी के बाद अपने ही शरीर पर कोई हक नहीं रहता। इस अभिशाप से निकलना इस जाति की महिलाओं के लिए बहुत मुश्किल काम है। पैसों के लालच में कुछ माता-पिता अपनी बेटियों की कम उम्र में ही पेरणा समुदाय में शादी कर देते हैं।शादी के लिए पेरणा समुदाय के लोग लड़की के माता-पिता को एक रकम देते हैं। जिसकी कीमत को वसूलने के लिए ससुराल वाले अपनी बहुओं को देह व्यापार में धकेल देते हैं। यह देह व्यापार इस जाति की महिलाओं की गिरती दशा के लिए जिम्मेदार है। इस रिवाज को शादी का अर्थशास्त्र भी कहा जा सकता है। जहां शादी एक ऐसी सामाजिक घटना है जिसे पैसों के लेन-देन का एक क्रम बना दिया गया है।
कौन हैं पेरणा जाति की महिलाएं?

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ग्रामोफ़ोन से फसल बेचना हुआ आसान, हजारों किसानों ने उठाया लाभ

देश की अग्रणी एग्रीटेक स्टार्टप कंपनी ग्रामोफ़ोन पिछले पांच साल से किसानों को स्मार्ट खेती करने के लिए आधुनिक तकनीकों के माध्यम से सशक्त करने के उद्देश्य से कार्यरत है और उनके जीवन में समृद्धि ला रही है। कोरोना महामारी के चलते पिछले 2 साल सभी के लिए काफी मुश्किल रहे और किसान भाई भी इससे अछूते नहीं रहे हैं |
लॉकडाउन की वजह से सभी सब्जी व् अनाज मंडियां बंद रहीं और किसान भाईयो को अपनी फसल बेंचने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था | उतना ही मुश्किल ये दौर हमारे अनाज व्यापारियों के लिए रहा, वो किसानो से किसी भी तरह जुड़ ना सके | कोरोना की दूसरी लहर के समय किसान अपनी रबी फसलों की कटाई में व्यस्त थे। फसलों की कटाई के बाद किसान लॉकडाउन में फसलों को कैसे बेच पाएंगे इसे लेकर फिक्रमंद थे।

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किराये की यादें _

शहरों में मीठे – नमकीन से यादों के अनगिनत मकान अधिकतर किराए के हुआ करते हैं, जिनमें रहने वाले लोग जाने- अनजाने में कभी न भूल सकने वाले लम्हें जोड़ जाते हैं या फिर टूट-टूट के बिखरती रिसती कहानियों को छोड़ जाते हैं जिनकी साक्षी बनती हैं इन कमरों की बेजान दीवारें, जो न केवल ध्यान से सुनती हैं उन बातों को जो बोल दी गयी और जो चाहकर भी न बोली गयी बल्कि अपनी खुली आँखों से इन दृश्यों को देखती भी हैं अपने अनुभवों में सहेज लेने के लिए।

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जकड़न: इतने बंधन और इतनी रूढ़ियां क्यों बनाई गई है?

मेरे समझ में यह कभी नहीं आया कि इतने बंधन और इतनी रूढ़ियां क्यों बनाई गई है? जब सांसे घुटती हैं तब यह समाज दिखाई नहीं देता। जरा सा सुकून हासिल हुआ कि लोगों को खलने लगता। इस अवसाद भरी जिंदगी से बाहर निकल कर दो पल सुकून के क्यों अखर जाते सबको? आखिर इन्हें ढोने के लिए क्यों मजबूर हूं मैं? इन्हें ढोते-ढोते इक उम्र जाया हो गई और अब भी जंग जारी है। इस बारिश ने और कोरोना के कारण हुई लॉकडाउन में “घर में रहें सुरक्षित रहें” के नियमों का मैं पालन कर रहा था और बारिश में चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहा था। सन्नाटी सड़क और पेड़ों के पत्तों से गिरती हुई बारिश की बूंदें मेरे मन को और ज्यादा रीता हुआ सा कर रही थी और यही सब बातें मेरे जेहन में घूम रही थी।

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