Saturday, September 19, 2026
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लेख/विचार

आपकी बातः भूमाफियाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं!

sanjay katiyarउत्तर प्रदेश में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रथम दिन से ही ऐलान किया था कि अब प्रदेश में भूमाफियाओं की खैर नहीं होगी। इसी ऐलान के तहत प्रदेश की सरकारी मशीनरी जैसे विकास प्राधिकरण, नगरनिगम, नगरपालिका और ग्राम पंचायतों आदि ने ज्यादातर जिलों में भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। अभियान की सफलता और असफलता अथवा उसके औचित्य पर यदि ईमानदारी से आकलन किया जाये तो एक जो तस्वीर दिखाई देती है वह यह है कि असली भूमाफिया और उनसे जुड़े वो सरकारी कर्मचारी, अधिकारी जिनकी सरपरस्ती पर भूमि की अवैध बिक्री और अवैध कब्जे करके आमजनता के लोगों को धोखे से कूट रचित अभिलेख बनाकर बिक्री करके जनता की जीवनभर की गाढ़ी कमाई पर डाका डाला गया। उनपर कोई भी कार्यवाही नहीं होती दिखाई देती, जबकि भूमाफियों ने अधिकारियों से मिलकर जनता से करोड़ों रुपये लूटकर अपने घर तो भर लिये और अब जब सरकार भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान चलाने की बात कर रही है तब बेचारे वो निम्न मध्यम वर्ग की जनता, गरीब जनता परेशानी में आ रही है जिसने किसी प्रकार से मेहनत की गाढ़ी कमाई से भूमि का एक टुकड़ा खरीदकर अपने सपनों का एक छोटा सा घर बनाया था।

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सरकार डाल-डाल तो करचोर पात-पात डॉ. दीपकुमार शुक्ल

deep shuklaसन 1998 में अमिताब बच्चन और गोविंदा की एक फिल्म आयी थी बड़े मियां छोटे मियां। उसमें ट्रेन में टप्पेबाजी करके यात्रियों से लूटे गये सामान के बारे में जब टिकट चेकर पूंछता है तो बड़े और छोटे मियां बताते हैं कि इस बैग्वा के अन्दर में हमारे दाँयें पाँव का मोजा है और इसमें बाएं पाँव का मोजा है। उसके अन्दर हमारे दायें पांव का जूता है। इसमें बाएं पाँव का जूता है। उसके अन्दर हमारी धोती-धोती है और इसमें हमारा कुर्ता-कुर्ता है। ये डायलाग सुनकर दर्शक मुस्कराए बिना न रहे होंगे। कर चोरी की आदत से मजबूर कपड़े और जूता-चप्पल के कुछ कारोबारियों ने देश में जी.एस.टी.लागू होने के बाद से कुछ ऐसा ही तरीका अपनाया है। गौरतलब है कि वस्तु एवं सेवा कर नियमावली के अनुसार पांच सौ रुपये तक की कीमत के जूते-चप्पल और एक हजार रुपये तक की कीमत वाले कपड़ों पर पांच प्रतिशत टैक्स का प्राविधान है। 

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कृषकों के खून से प्यास बुझाती राजनीति

किसान और किसानी के विकास, सुरक्षा तथा बेहतरी के लिए न जाने कितनी सरकारी योजनाओं और घोषणाओं के अम्बार लगे हुए हैं पर इन अम्बारों की तह के नीचे अब भी अगर कुछ है तो वह है बैंक के ऋण, साहूकारों के कर्ज, दलालों और व्यापारियों की मनमानी, बीज खाद और कीटनाशकों की निष्ठुर कीमतें, बिचैलियों के मौज-मजे, बरसाती नदी के पानी की तरह लगातार बढ़ती लागत और बदले में मुनाफा-दर शून्य, मौसम के बदलते मिजाज का कहर तो है ही, सही कृषि-नीतियों के अकाल के साथ हीं और भी है बहुत कुछ … एवं इन सब की तहों के नीचे पड़े हुए हैं व्यवस्था की खामी से चोटिल, स्तब्ध और टूटे हुए किसानों के नरकंकाल, कपाल, लाशें स हाँ .. इन सब के नीचे है हताश, निराश और डरावने भविष्य के अन्धकार में लिपटा किसानों का सशंकित, संत्रासित और अशांत मन स दिन-रात अपने शारीरिक सामर्थ्य से बढ़कर मेहनत करनेवाले उस किसान को जब खाने के लिए दो निवाला सुकून और तसल्ली का नहीं मिल पाता तो लाचारी में हारकर वह सल्फास की गोली खा लेता है।

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मिसाइल डिफेन्स सिस्टम से मजबूत होगी सुरक्षा

प्रधानमंत्री मोदी की हाल की रूस यात्रा में यह साफ हो गया है कि रूस भारत को अत्यन्त खतरनाक हवाई मिसाइल डिफेंस सिस्टम एस-400 देगा। दोनों देशों के बीच इस पर बातचीत हो चुकी है। इसके अलावा दोनों देशों ने एक साथ मिलकर एयरक्राफ्ट और आॅटो मोबाइल्स बनाने पर भी सहमति जताई है। इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम को दुनिया का सबसे खतरनाक मिसाइल सिस्टम माना जाता है। रूस के उप प्रधानमंत्री दमित्री रोगोजिन ने कहा कि रूस भारत को एस-400 ट्रायम्फ विमान रोधी मिसाइल प्रणालियों की आपूर्ति करने की तैयारी कर रहा है और दोनों पक्ष बिक्री की शर्तों पर चर्चा कर रहे हैं। पिछले साल गोवा में ब्रिक्स समिट के दौरान भारत और रूस के मध्य लगभग 40000 करोड़ रुपये की इस डिफेंस डील पर चर्चा हुई थी। तब भारत ने 15 अक्टूबर को रूस के साथ ट्रायम्फ वायु रक्षा प्रणालियों पर पांच अरब डाॅलर के एक करार की घोषणा की थी। भारत ने उसी समय चार अत्याधुनिक फ्रिगेट के अलावा कामोव हेलीकाॅप्टरों के निर्माण के लिए एक संयुक्त उत्पादन सुविधा स्थापित करने की भी घोषण की थी।

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क्यों न फिर से निर्भर हो जाए

2017.06.29. 1 ssp DR NEELAM MAHENDRAआज की दुनिया में हर किसी के लिए आत्मनिर्भर होना बहुत आवश्यक माना जाता है। स्त्रियाँ भी स्वावलंबी होना पसंद कर रही हैं और माता पिता के रूप में हम अपने बच्चों को भी आत्मनिर्भर होना सिखा रहे हैं।
इसी कड़ी में आज के इस बदलते परिवेश में हम लोग प्लैनिंग पर भी बहुत जोर देते हैं। हम लोगों के अधितर काम प्लैनड अर्थात पूर्व नियोजित होते हैं। अपने भविष्य के प्रति भी काफी सचेत रहते हैं इसलिए अपने बुढ़ापे की प्लैनिंग भी इस प्रकार करते हैं कि बुढ़ापे में हमें अपने बच्चों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। यह आत्मनिर्भरता का भाव अगर केवल आर्थिक आवश्यकताओं तक सीमित हो तो ठीक है लेकिन क्या हम भावनात्मक रूप से भी आत्मनिर्भर हो सकते हैं?

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अलगाववाद को प्रोत्साहन

Pankaj k singhनिश्चय ही कश्मीर मुद्दे पर अब भारत सरकार को निर्णायक कूटनीतिक कदमों की ओर आगे बढ़ना चाहिए। सरकार ने पर्यवेक्षकों के कामकाज की उच्चस्तरीय समीक्षा में पाया है कि पर्यवेक्षकों की अब कोई जरूरत नहीं है। उनकी मौजूदगी में भी ‘एलओसी’ (लाइन आॅफ कंट्रोल) पर लगातर पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी और खून-खराबा हो रहा है। जिस उम्मीद के साथ कभी ‘संयुक्त राष्ट्र’ के सैन्य पर्यवेक्षकों का कार्यालय भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम समझौते का पालन सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया गया था, उसमें वह खरा नहीं उतर सका है। कश्मीर मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र का रुख बेहद ढुलमुल रहा है। संयुक्त राष्ट्र कश्मीर मुद्दे को लेकर अमेरिकी नीतियों से प्रभावित रहता है। कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक प्रायः मूकदर्शक ही बने रहे हैं और आज तक उन्होंने कभी भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और भारतीय सीमाओं में घुसपैठ के मुद्दे को संपूर्ण शक्ति के साथ मजबूत ढंग से नहीं उठाया है। भारत को इस संदर्भ में एक कठोर रुख अपनाने की आवश्यकता है। 

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अन्नदाता आखिर कब तक केवल मतदाता बना रहेगा

dr. neelamअब किसान जागा है तो पूरा जागे
इस बात समझे कि भले ही अपनी फसल वो एक या दो रुपए में बेचने को विवश है लेकिन इस देश का आम आदमी उसके दाम एक दो रूपए नहीं कहीं ज्यादा चुकाता है तो यह सस्ता अनाज किसकी झोलियाँ भर रहा है?
किसान इस बात को समझे कि उसकी जरूरत कर्ज माफी की भीख नहीं अपनी मेहनत का पूरा हक है, वह सरकार की नीतियाँ अपने हक में माँगे बैंकों के लोन नहीं चाहे तमिलनाडु हो आन्ध्रप्रदेश हो महाराष्ट्र हो या फिर अब मध्यप्रदेश पूरे देश की पेट की भूख मिटाने वाला हमारे देश का किसान आज आजादी के 70 साल बाद भी खुद भूख से लाचार क्यों है?
इतना बेबस क्यों है कि आत्महत्या करने के लिए मजबूर है?

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यू. पी. में बेलगाम अपराधी

2017.05.30 01 ravijansaamnaसमाजवादी पार्टी की सरकार का तख्ता पलट करने के बाद उत्तर प्रदेश की जनता ने एक तरह से राहत की साँस ली थी। लोगों को लगा था कि और कुछ हो या न हो किन्तु अपराधियों के हौसले जरुर पस्त होंगे परन्तु दुर्भाग्य से बीते ढाई माह में ऐसा कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा है। नयी सरकार बनने के बाद सैकड़ों पुलिस अधिकारी इधर से उधर हो गये परन्तु अखबार के पन्नों पर अपराध की खबरें आज भी वैसे ही जमी हुयीं है जैसे सपा सरकार के समय थीं। उसके बाद सत्ता पक्ष के नेताओं के गैरजिम्मेदाराना बयान प्रदेशवासियों को मुंह चिढ़ा रहे है। प्रदेश सरकार के एक मन्त्री का बयान आया कि पिछली सरकार के मुकाबले हमारी सरकार में हत्याएं कम हो रही हैं तो दूसरे मन्त्री ने उनसे भी दो कदम आगे जाकर कह दिया कि सरकार यू.पी. में क्राइम रेट जीरो नहीं कर सकती है। जबकि सरकार के छोटे मुखिया को आपराधिक घटनाओं में विपक्ष का षड्यंत्र दिखायी दे रहा है। प्रदेश में अपराधियों के बुलन्द हौसलों का प्रमाण देने के लिए ग्रेटर नोएडा तथा रामपुर की घट्नाएं पर्याप्त हैं। भाजपा सरकार की इस अल्प अवधि में हत्या, लूट, डकैती, अपहरण, बलात्कार, साम्प्रदायिक तथा जातीय संघर्ष तक की बड़ी-बड़ी घटनाएँ घट चुकी हैं। 

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खबरदार, मोदी नही इंदिरा और नेहरू

2017.05.29 01 ravijansaamnaभारतीय राजनीति में आम जनता के दिलों दिमाग में लंबे समय तक राज करने वाले नेताओं की अब खासी कमी होती जा रही है। अब नेता केवल लोगों के दिलों में उतने समय तक जिंदा रहता है जितने समय तक एक इंसान को शराब या अन्य व्यसन का नशा होता है। मतलब साफ है कि जो नेता जितने समय तक पद पर बने रहेगा तब तक याद किया जाएगा जैसे ही पद से हटा उसके बाद जनता के जैहन से भी हट जाएगा। हालाकि देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का मोदी सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर एक किताब के विमोचन पर यह कहना कि ‘पीएम मोदी सबसे प्रभावी वक्ता हैं, पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से उनकी तुलना की जा सकती है। इसके साथ ही आगे कहा कि जब तक कोई प्रभावी वक्ता नहीं बनता, उससे करोड़ों लोगों का नेतृत्व करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। 

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आखिर क्यों सुलग रहा पूरब का ऑक्सफोर्ड..?

2017.05.04 ravijansaamna Ashish shuklaदिन बदल रहा है अब इलाहाबाद में कुछ छात्रों की विश्वविद्यालय में राजनीति जोरों पर है कुछ का तो पढ़ाई से कोई वास्ता ही नहीं, केवल टाइम पास और गुन्डई करने के लिए विश्वविद्यालय में किसी तरह एडमिशन ले लिए हैं। एडमिशन में जब विश्वविद्यालय ने पारदर्शिता लाने की कोशिश की थी और प्रवेश परिक्षाओं का मॉडल चेंच करके ऑनलाइन कर दिया तब इन फुटकरिया लोगों के घुसने के चांस काफी कम हो गये जिसके चलते स्वतंत्रता के नाम पर खूब अनशन किये गये।आपको याद दिला दें यह वही लोग हैं जो सरकार के डिजटल-इंडिया प्रोग्राम को प्रमोट करने के लिए गला फाड़कर वाट्सअप फेसबुक पर डिजटलाइजेशन की बात करते थे, लेकिन जब अपनी लुटिया डूबती महसूस हुई तब खुलकर ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा का विरोध किया गया, हलांकि यूजी में एडमिशन लेने वाले कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को इससे परेशानियां आई। सही मयानेमें यहीं से ही विश्वविद्यालय में मौजूदा अराजकता की पहले कड़ी की शुरूआत होती है। विवि. का आलम किसी से छिपा नहीं है, प्रो. की क्या मजाल किसी छात्र से थोड़ी ऊंची आवाज में बात कर लें, अगर बहुत बद्तमीजी कर दी और प्रो. साहब ने कुछ बोल दिया तो उनका बाहर मिलना तय है। सवाल उठता है कि , क्या उनके परिवार और गुरू ने जो संस्कार उन्हें दिए वह सब बेकार हो गये? 

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