राजीव रंजन नागः नई दिल्ली। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव एक उच्च जोखिम वाली लड़ाई है, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा और कांग्रेस, जिन्होंने कमल नाथ को अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया है, सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। पार्टियां आदिवासी, ओबीसी और महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त सुविधाएं और गारंटी दे रही हैं।
मध्य प्रदेश में अपनी नई सरकार चुनने से दो हफ्ते से भी कम समय पहले, एनडीटीवी-सीएसडीएस लोकनीति पोल से पता चला है कि मतदाता कांग्रेस के कमल नाथ के मुकाबले मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पसंद करते हैं, जो उनसे पहले राज्य का नेतृत्व कर रहे थे। हालाँकि, मार्जिन भाजपा को थोड़ा विराम दे सकता है, क्योंकि यह केवल चार प्रतिशत अंक है।
राज्य के 230 विधानसभा क्षेत्रों में से 30 में 24 अक्टूबर से शुरू होने वाले सप्ताह में 3,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया गया और नतीजे भाजपा को उत्साहित करेंगे क्योंकि लोगों का मानना है कि चौहान सरकार के तहत सड़कों, बिजली और अस्पतालों में सुधार हुआ है। उत्तर पार्टी को सोचने का अवसर भी देंगे क्योंकि लोग इस बात पर समान रूप से विभाजित हैं कि क्या इसके तहत महिला सुरक्षा में सुधार हुआ है या बदतर हुई है, और 36 % ने कहा है कि दलितों की स्थिति खराब हो गई है।
जब सर्वेक्षण में शामिल लोगों से पूछा गया कि क्या 2018-2020 की कमलनाथ सरकार ने बेहतर प्रदर्शन किया या 2020-2023 की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने बेहतर प्रदर्शन किया, तो कांग्रेस उस मामूली अंतर से भी उत्साहित हो सकती है। जहां 36 प्रतिशत ने कहा कि चौहान सरकार ने बेहतर काम किया, वहीं 34 प्रतिशत ने नाथ सरकार के पक्ष में बात की।
कांग्रेस ने 2018 में सरकार बनाई थी लेकिन 2020 में वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में विद्रोह के बाद कमल नाथ को पद छोड़ना पड़ा, जो भाजपा में शामिल हो गए।
लेख/विचार
धर्म जाति पर भारी पड़ने लगी जेंडर राजनीति
भारत में धर्म, जाति की राजनीति के बाद जेंडर आधारित राजनीति का चलन तेजी से लोकप्रिय हुआ है जिसमें महिला मतदाताओं में पैठ बनाना लक्ष्ये होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केंद्र में आने के बाद चुनाव में जीत के इस छुपे राज पर से धीरे – धीरे पर्दा उठने लगा है। दरअसल जेंडर राजनीति की गंभीर शुरूआत गुजरात में 2002 में शुरू हुई और इसे भुनाने की सुनियोजित पहल नरेन्द्र मोदी ने की थी जो वह वहां के मुख्यमंत्री थे। मोदी के मुख्य मंत्री बनने के बाद चुनावी सभाओं में महिलाओं की उपस्थिति निरंतर बढती गई जिसकी एक वजह यह भी थी कि गोधराकांड और उसके बाद हुये दंगों के बाद पहली बार गुजरात में चुनाव हो रहे थे। दंगों से निबटने में मोदी की भूमिका का लेकर विपक्ष खासकर कांग्रेस ने आरोपों की झडी लगा दी थी और उन्हें घेरने के लिये कोई कसर नहीं छोडी गई थी।
मोदी गुजरात विधानसभा चुनाव जीत गये और दोबारा मुख्य मंत्री बने। मोदी ने चुनावी जनसभाओं में महिलाओं की बडी संख्या में उपस्थिति को ध्यान में रखकर काम करना शुरू किया और जेंडर आधारित राजनीति की ठोस शुरूआत की। मोदी ने नवजात कन्याओं से लेकर बुजुर्ग महिलाओं के कल्याण के लिये अनेक योजनाओं की शुरूआत की। मोदी की कार्यशैली में योजनाओं के त्वरित क्रियान्वायन और कडी निगरानी को सर्वाेच्च प्राथमिकता मिलती रही है और वह लाल फीताशाही के अवरोधों को दूर करने में कसर नहीं रखते हैं।
गुजरात में विकास और जेंडर आधारित राजनीति की सफलता को देखते हुये अन्य राज्यो की भाजपा सरकारों ने उसे अपनाया जिसमें मध्यरप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी जेंडर आधारित राजनीति का बडा लाभ मिला और लक्ष्मी लाडली जैसी योजनाओं के कारण जनता में ‘मामा’ कहे जाने लगे। भाजपा में मोदी के बाद शिवराज और अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जेंडर की राजनीति करके महिला मतदाताओं को रिझाने में कामयाब हो रहे हैं।
करवा चौथ व्रत, संकष्टी /करक गणेश चतुर्थी व्रत, पूजन एवं विधान
रायबरेली। गोकर्ण ऋषि की तपस्थली पर मां गंगा के पावन गोेकना घाट के वरिष्ठ पुरोहित पंडित जितेन्द्र द्विवेदी ने कहा कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में संकष्टी गणेश चतुर्थी, करवा चौथ का व्रत 01 नवम्बर 2023 दिन, बुद्धवार को है। यह महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण निर्जला व्रत है। इस दिन महिलाओं को निर्जला व्रत रखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ का व्रत ,अखंड ,सौभाग्य के लिए रखा जाता है ।माना जाता है कि इस व्रत को विधिपूर्वक रहने से पति की आयु लम्बी होती है। इस व्रत को निर्जला रखा जाता है, यही कारण है कि करवा चौथ का व्रत अन्य व्रतों की अपेक्षा कठिन होता है ,करवा चौथ व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं ,सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं , करवा चौथ व्रत के एक दिन पूर्व सुहागिन महिलाएं मेहंदी आदि लगाकर श्रंगार करती हैं और शाम के समय शिव परिवार अर्थात भगवान शिव जी, माता पार्वती जी, भगवान गणेश जी, भगवान कार्तिकेय जी और नंदीश्वर की प्रतिमा चौकी पर रखकर विधि विधान से पूजा के बाद चंद्रोदय पर चंद्रदेव को अर्घ्य देती हैं, अर्घ्य देने के बाद पति द्वारा लोटा से जल पिलाकर व्रत का परायण होता है।
सुहागिनों का सबसे बड़ा त्यौहार है करवा चौथ
करवा चौथ पर्व का हमारे देश में विशेष महत्व है क्योंकि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं और रात को चांद देखकर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं। भारतीय समाज में वैसे तो महिलाएं विभिन्न अवसरों पर अनेक व्रत रखती हैं लेकिन पति को परमेश्वर मानने वाली नारी के लिए इन सभी व्रतों में सबसे अहम स्थान रखता है ‘करवा चौथ’ व्रत, जो इस वर्ष 1 नवम्बर को मनाया जा रहा है। पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य तथा सौभाग्य के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में उसकी सफलता की कामना से सुहागिन महिलाओं द्वारा कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला यह व्रत अन्य सभी व्रतों से कठिन माना जाता है, जो सुहागिनों का सबसे बड़ा व्रत एवं त्यौहार है। महिलाएं अन्न-जल ग्रहण किए बिना अपार श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं तथा रात्रि को चन्द्रमा के दर्शन करके अर्ध्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं। यही वजह है कि अखण्ड सुहाग का प्रतीक यह व्रत अन्य सभी व्रतों के मुकाबले काफी कठिन माना जाता है।
कहा जाता है कि इस व्रत के समान सौभाग्यदायक अन्य कोई व्रत नहीं है और सुहागिनें यह व्रत 12-16 वर्ष तक हर साल निरन्तर करती हैं, उसके बाद वे चाहें तो इसका उद्यापन कर सकती हैं अन्यथा आजीवन भी यह व्रत कर सकती हैं। आजकल तो कुछ पुरूष भी पूरे दिन का उपवास रखकर पत्नी के इस कठिन तप में उनके सहभागी बनते हैं। दिनभर उपवास करने के बाद शाम को सुहागिनें करवा की कथा सुनती व कहती हैं तथा चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा को अर्ध्य देकर अपने सुहाग की दीर्घायु की कामना कर प्रण करती हैं कि वे जीवन पर्यन्त अपने पति के प्रति तन, मन, वचन एवं कर्म से समर्पित रहेंगी।
सजना है मुझे सजना के लिए …
भारत में सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा त्यौहार है ‘करवा चौथ’, जो दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के प्रति समर्पण का अनूठा पर्व माना जाता है। इस विशेष त्यौहार का सुहागिन महिलाएं सालभर इंतजार करती हैं। हालांकि यह व्रत अन्य सभी व्रतों से कठिन माना जाता है, फिर भी देशभर में हर जाति, हर सम्प्रदाय की महिलाएं अपने पति की दीर्घायु तथा अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए खुशी-खुशी यह व्रत रखती हैं और रात को चांद देखकर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं। हालांकि समय के साथ इस व्रत को मनाए जाने की परम्पराओं में थोड़ा बदलाव आया है और अब बहुत सी अविवाहित युवतियां भी अच्छे वर की प्राप्ति की कामना से यह व्रत करने लगी हैं।
करवा चौथ के शुभ दिन महिलाओं के चेहरे पर एक अलग ही तेज नजर आता है। इस पर्व का नाम सुनते ही मन में सोलह श्रृंगार किए खूबसूरत नारी की छवि उभर आती है। दरअसल मेंहदी लगे हाथों में रंग-बिरंगी खनकती चूड़ियां, माथे पर आकर्षक बिंदिया, मांग में सिंदूर, सुंदर परिधान और तरह-तरह के आकर्षक गहने पहने अर्थात् सोलह श्रृंगार किए सुहागिन महिलाएं इस दिन नववधू से कम नहीं लगती। दुल्हन के लाल जोड़े की भांति इस दिन भी लाल रंग के परिधान पहनने का चलन बहुत ज्यादा है। वास्तव में करवा चौथ सुहागिन महिलाओं के सजने-संवरने का एक विशेष अवसर है।
एकीकृत भारत के निर्माता थे सरदार पटेल
31 अक्तूबर 1875 को गुजरात के खेड़ा जिले के नाडियाड में एक किसान परिवार में जन्मे सरदार वल्लभ भाई पटेल को एकता की मिसाल कहा जाता है क्योंकि देश की एकता को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने देश को एकजुट करने में सदैव महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण में उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। जिस समय देश आजाद हुआ, तब यह कई छोटी-छोटी रियासतों में बंटा था, जिन्हें एकजुट करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। आजाद भारत को एकजुट करने का श्रेय पटेल की राजनीतिक और कूटनीतिक क्षमता को ही दिया जाता है। भारत के राजनीतिक एकीकरण के लिए सरदार पटेल के इसी अविस्मरणीय योगदान को चिरस्थायी बनाए रखने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 31 अक्तूबर 2014 से उनकी जन्मतिथि 31 अक्तूबर को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई। तभी से सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
देश की आजादी के उपरांत 500 से भी ज्यादा देशी रियासतों का एकीकरण किया जाना सबसे बड़ी समस्या थी। दरअसल अंग्रेज भारत से जाते-जाते कुटिल चाल चलते हुए करीब 550 देशी रियासतों को खुद ही अपने भविष्य के निर्णय का अधिकार दे गए थे। उसके पीछे उनका उद्देश्य था कि इतनी बड़ी संख्या में रियासतों के स्वायत्त रहते भारत के लिए स्वयं को एकजुट रख पाना बेहद मुश्किल होगा। सरदार पटेल ने अपने ‘लौहपुरूष’ व्यक्तित्व का परिचय देते हुए इस गंभीर चुनौती को न केवल स्वीकार किया बल्कि बहुत ही कम समय में बड़ी कुशलता से इतनी सारी रियासतों के एकीकरण का कार्य सम्पन्न कराने में सफल भी हुए। उन्होंने आजादी के ठीक पहले पी.वी. मेनन के साथ मिलकर कई देशी रियासतों को भारत में मिलाने का कार्य आरंभ कर दिया था। उस समय देशभर में सैंकड़ों ऐसी देशी रियासतें थी, जो स्वयं में सम्प्रभुत्ता प्राप्त थी, जिनका अपना अलग झंडा और अलग शासक था। दोनों ने देशी रियासतों के शासकों को समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना संभव नहीं होगा। इसका असर यह हुआ कि केवल तीन रियासतों को छोड़कर बाकी सभी रियासतों-राजवाडों ने अपनी मर्जी से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
विश्व युद्ध की तरफ बढ़ती इजराइल हमास जंग
इजराइल तथा फिलिस्तीन के आतंकवादी संगठन हमास के बीच जारी जंग को तीन सप्ताह पूरे होने वाले है। दोनो तरफ से जारी युद्ध में अब तक भयंकर रुप से जन धन का नुकसान हो चुका है। इस लड़ाई में 25 अक्टूबर तक इजराइल के 1400 लोग मारे जा चुके हैं और 222 लोगों को हमास ने बंधक बना रखा है। वहीं दूसरी तरफ इजराइल के आक्रमण से 6546 फिलिस्तीनी लोगों की जान जा चुकी है। इसमें 2404 बच्चे बताए जा रहे हैं। ज्ञातव्य है कि हमास द्वारा इजराइल पर 7 अक्टूबर को हमला किया गया था। इजराइल से हमदर्दी, सहयोग और एकजुटता दिखाने के लिए अमेरिकी राश्ट्रपति जो बाइडेन, जर्मनी के चांसलर ओलाक स्कोल्ज, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक इजराइल का दौरा कर चुके हैं।
बदलती रामलीलाः आस्था में अश्लीलता का तड़का
जब आस्था में अश्लीलता का तड़का लगा दिया जाता है तो वह न सिर्फ उपहास का कारण बन जाती है बल्कि बहुसंख्यक लोगों की भावनाएं भी आहत होती हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र समाज को प्रेम, उदारता, सम्मान व सद्भाव का संदेश देता है। पर अफसोस, राम के चरित्र व आदर्शों को प्रस्तुत करने वाली रामलीला आज के दौर में अश्लीलता परोसने का साधन बन गई है। संपर्क साधनों का विकास, विशेष रूप से टेलीविज़न धारावाहिक, रामलीलाओं के दर्शकों में कमी का कारण बन रहा है, और इसलिए रामलीलाएँ, लोगों और समुदायों को एक साथ लाने की अपनी प्रमुख भूमिका खो रही हैं। आधुनिकता की चकाचौंध ने नई पीढ़ी को हमारी संस्कृति, सभ्यता एवं संस्कारों से अलग कर दिया है। नई पीढ़ी ने अपने आपको इंटरनेट, लैपटॉप, मोबाइल की दुनिया तक ही सीमित कर लिया है। उसे बहरी दुनिया से कोई सरोकार नहीं रह गया है। आज नई पीढ़ी हमारे परम्परागत तीज त्योहारों को भूलती जा रही है। इन लोगों को मेला,रामलीला या दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम समय की बर्बादी नज़र आने लगे है। जिसके फलस्वरूप हमारे कार्यक्रमों के तौर तरीकों में परिवर्तन आये है और भावना बदली है।
-डॉ सत्यवान सौरभ
रामलीला, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘राम का नाटक’ है, रामायण महाकाव्य का एक प्रदर्शन है जिसमें दृश्यों की एक श्रृंखला में गीत, कथन, गायन और संवाद सम्मिलित होते हैं। यह पूरे उत्तर भारत में हर साल शरद ऋतु में अनुष्ठान कैलेंडर के अनुसार दशहरे के त्योहार के दौरान प्रदर्शित किया जाता है। अयोध्या, रामनगर और बनारस, वृंदावन, अल्मोड़ा, सत्तना और मधुबनी की रामलीलाएँ सबसे अधिक प्रतिनिधिक हैं। रामायण का यह मंचन देश के उत्तर में, सबसे लोकप्रिय कहानी कहने की कला वाले रूपों में से एक, रामचरितमानस, पर आधारित है।
’दिखावा’ तेजी से फैलता एक सामाजिक रोग
समय के साथ बदलते समाज में दिखावे की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। आजकल ज्य़ादातर लोग दूसरों के सामने अपनी नकली छवि पेश करते हैं। काफी हद तक ईएमआइ की सुविधाओं ने भी लोगों में दिखावे की इस आदत को बढ़ावा दिया है। दूसरे के पास कोई भी नई या महंगी चीज देखकर लोगों के मन में लालच की भावना जाग जाती है। फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स की वजह से भी युवाओं में दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। रिलेशनशिप को भी सोशल साइट्स पर दूसरों को दिखाने के लिए ही अपडेट किया जा रहा है। जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ेगी, आपके आचार, विचार और व्यवहार में गंभीरता आएगी। तब कभी आप सोचेंगे कि अगर मैं 300 रुपए की घड़ी पहनूं या 30000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी। मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा। सोने के लिए एक बेड ही पर्याप्त होगा। फिर आपको ये भी लगेगा कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूं या इक्नामी क्लास में, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा। या फिर रेलवे केे स्लीपर क्लास में यात्रा करो या एसी में, ट्रेन एक ही समय में दोनों को पहुंचाएगी। इसलिए अपनी आवश्यक आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए न कि व्यर्थ के दिखावे पर फोकस करना चाहिए।
किसी भी चीज का दिखावा करने की आपको कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इससे क्षणिक फायदा मिलता है। हमें कुछ भी काम करना है वह दूर दृष्टि को ध्यान में रखते हुए करना है।
शक्ति आराधना पर्व नवरात्रि
माँ शब्द में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है। यह सृष्टि भी तो हमारी माँ ही है, जो हमारा लालन-पालन और भरण-पोषण करती है। उदार भाव से हमारे उत्थान को प्रबलता प्रदान करती है। इसी भाव के कारण हम सदैव पूजा-अर्चना में सर्वप्रथम पृथ्वी माँ को ही प्रणाम करते है। इस समय तो ममतामयी माँ शेर पर सवारी कर भक्तों के कल्याण के लिए आई है। हमें सकारात्मक ऊर्जा एवं शक्ति प्रदान करने के लिए माँ अखंड ज्योत के द्वारा हमारे जीवन के अंधकार का भी समूल नाश कर देती है। करुणामयी, भक्तवत्सल माँ तो शुभता प्रदान करने वाली है। मन के संशय को नाश करने एवं हमारी अभिलाषाओं को साकार रूप देने माँ नौ दिन विभिन्न-विभिन्न रूपों से हमें गुण, ऊर्जा, उत्साह एवं उमंग से भर देंगी। हमें अपने आनंद का विस्तार करने के लिए माँ के सच्चे दरबार पर अडिग विश्वास करना होगा। भक्तिभाव में मग्न होकर हमें माँ की पूजा-अर्चना एवं उपासना करनी है। विघ्नों को हरने वाली माँ, नव उत्साह जननी माँ, धन-धान्य के भंडार देने वाली माँ, त्रिभुवन में निवास करने वाली माँ, मन के द्वार को आलौकित करने वाली माँ की स्तुति हम मंगल कलश की स्थापना के साथ करेंगे। भय हारिणी एवं भव तारिणी माँ के प्रत्येक स्वरुप का नमन और वंदन करेंगे।
देवी दुर्गा तो दुर्गति का भी विनाश कर देती है। हर नवरात्रि की तरह इस बार भी हम देवी के दर्शन, उनकी दया, कृपा, करुणा एवं आशीर्वाद के अभिलाषी होंगे। उत्साह, उमंग और भक्ति भाव से ओत-प्रोत होकर हमें देवी के आराधना पर्व को उत्सव का स्वरुप देना होगा। बच्चों को भी माँ के विभिन्न स्वरूपों से अवगत कराना होगा। माँ की आराधना हमें बहन-बेटी के सम्मान को सुरक्षित रखने की भी प्रेरणा देती है। माँ के प्रति अगाध श्रृद्धा हमें एक सम्मानित समाज के निर्माण की ओर अग्रसर करती है, जिसमें समस्त प्राणियों में नारी के प्रति सम्मान का भाव सदा जीवंत रहें। माँ तो धैर्य, साहस, शक्ति एवं वात्सल्य का अप्रतिम रूप है। माता हमें जीवन में नवीन दिशा प्रदान करें।
Jansaamna