Tuesday, November 3, 2026
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लेख/विचार

पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है!

बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जाए।

इसमें पहली नजर में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिला; सवाल यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।

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जिसकी तस्वीर कभी छपी नहीं, वही आंदोलन की पहली आवाज़ था

इतिहास के गुमनाम सिपाही : आंदोलन इतिहास बनाते हैं, पत्रकार उसकी पहली आवाज़ दर्ज करते हैं!
आंदोलन खत्म हो गया, नेता याद रह गए—पत्रकार फिर अगले संघर्ष में निकल पड़े!


इतिहास की एक अजीब आदत है। वह हमेशा विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन विजय की नींव रखने वालों को अक्सर भूल जाता है। वह मंच पर खड़े नेताओं की तस्वीरें छापता है, नारों को याद रखता है, भाषणों को उद्धृत करता है, समझौतों की तारीखें लिखता है और इस्तीफों को लोकतंत्र की जीत घोषित कर देता है। लेकिन इतिहास की किताबों में शायद ही कभी उस आदमी का नाम मिलता है जिसने सबसे पहले अपनी जेब से कलम निकाली, मोबाइल निकाला, कैमरा चालू किया और देश को बताया—”यहाँ कुछ ऐसा हो रहा है जिसे पूरे देश को देखना चाहिए।”

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भारत में दण्ड नीति की वास्तविकता और पेपर लीक का न्यायसंगत समाधान

आजादी के बाद कई बार ऐसा समय आया जब किसी जघन्य अपराध ने पूरे देश को झकझोरा, लोग सड़कों पर उतरे, आन्दोलन हुए तथा अपराधियों के लिए कठोरतम दण्ड की मांग ने जोर पकड़ा। सरकारों ने भी तत्परता दिखाते हुए नये तथा अधिक कड़े कानून बनाकर अथवा पुराने कानून में अमूल-चूल परिवर्तन करके आम जन को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया। लेकिन सजा की कठोरता तथा त्वरित एवं निश्चित न्याय के बीच की खाई सदैव न्याय में अन्याय का दर्शन करवाती रही। अपराध-विज्ञान और न्यायिक इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि कानून सख्त बना देना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि असली प्रश्न दंण्ड की कठोरता का नहीं बल्कि दण्ड मिलने कि निश्चितता और प्रक्रिया की गति का है। भारत में ऐसे कानूनों की लम्बी श्रृखला है, जिनमें आजीवन कारावास, कठोर कारावास या फिर  मृत्युदण्ड तक के प्रावधान शामिल हैं। हाल ही में संसद द्वारा पारित सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026 में भारी-भरकम जुर्माना और 10 साल तक की सजा के प्रावधान तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाना आदि शामिल है।

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एक घंटा

न जाने वो कैसी औरतें होती हैं जो अपना ध्यान नहीं रखतीं। ना अपने चेहरे का और ना ही अपने शरीर का। ढीली स्किन और बेडौल शरीर ऐसा लगता है जैसे कि बस शादी करने के लिए ही उनको सुंदर दिखना था। शादी हो जाने के बाद जैसे उनका मकसद पूरा हो गया और फिर अपनी ओर ध्यान मत दो। फिर भी कपड़े फैशनेबल चाहिए रहते हैं ताकि अच्छी दिख सकें। फिर भले ही वो कपड़े उन पर अच्छे लगे या ना लगे। रिया अपनी टेबल पर बैठी हुई यह बात अपनी कलीग से कह रही थी जिसे कुछ ही दिन हुए थे स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करते हुए। पास में ही बैठी  सलोनी मुस्कुराने लगी उसने पूछा, “तुम्हारी शादी हो गई है क्या?”
रिया:- “नहीं, अभी नहीं हुई!”
सलोनी:- “अच्छा! तभी ऐसा बोल रही हो। जब शादी हो जाएगी और तब उसके बाद के अनुभव शेयर करना मेरे साथ और फिर जो बात तुमने अभी कही है वो फिर से कहना।”

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कथावाचकों के लिए भी एक मानक बने

इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है। परन्तु बदले परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है। प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है। श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के एक भाग अथवा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। आचार्य का पद उपाध्याय से दस गुना अधिक बड़ा बताया गया है। क्योंकि आचार्य की सेवाएँ निःस्वार्थ होती थीं। एक समय इन्हीं गुरुजनों के माध्यम से गुरुकुल के विद्यार्थी वेद, वेदान्त, वेदांग तथा स्मृतियों आदि का ज्ञान प्राप्त करते थे। कालान्तर में वेद व्यास ने जब पुराणों की रचना की तब ये पुराण भी गुरुकुलों के पाठ्यक्रमों में क्रमशः शामिल किये गये। जिनमें वर्णित महापुरुषों की कथाएं विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन तथा मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। इन पुराणों को गुरुकुलों तक पहुँचाने के मुख्य सूत्रधार व्यास जी के शिष्य लोमहर्षण सूत जी थे। सूत जी ऋषियों को पुराण सुनाते और ऋषिगण अपने शिष्यों को।

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महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी

2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब राजनीतिक दल अभी से महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाएँ। केवल आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं; दलों को आंतरिक कोटा, वित्तीय सहयोग, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और निर्णयकारी भूमिका में महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी। अगर यह मौका चूक गया तो आरक्षण भी दिखावा बन जाएगा। समावेशी और सशक्त लोकतंत्र के लिए अब निर्णायक और नीतिगत पहल ज़रूरी है। -प्रियंका सौरभ
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, यानी संविधान का 106वां संशोधन, भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का ऐतिहासिक प्रयास है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, लेकिन इसकी सफलता महज संविधान में दर्ज होने से नहीं होगी—बल्कि इस पर अमल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होगी। वर्ष 2029 के आम चुनावों में यदि यह आरक्षण प्रभावी होता है, तो यह न केवल भारत के लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़ होगा, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व की दिशा भी तय करेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को अभी से व्यापक और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे।

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क्या वाकई कानून अंधा है?

हालांकि महिलाओं के प्रति बर्बर हादसे कोई नई बात नहीं है, यह समस्या काफी पुरानी है। निर्भया कांड के बाद लोगों में जो एक डर बैठ गया था और उसके मद्देनजर जो कानून बनाए गए थे उसके द्वारा इस तरह के अपराधों में कोई रोकथाम हुई हो ऐसा नजर नहीं आता है बल्कि हाल के दिनों में उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। पाक्सो एक्ट (2012) भी कुछ समय पहले ही लागू हुआ है। पिछले कुछ समय से निर्भया जैसी ही बर्बरता फिर से देखने सुनने में आ रही है। अनेक वीडियो वायरल हो जाते हैं जिनमें वीभत्सता देखी नहीं जाती। दिल दहल जाता है। इस तरह के अपराधी कुछ वो लोग होते हैं जिनका बैकग्राउंड ही अपराधिक होता है और कुछ सफेदपोश अपराधी होते हैं। हालांकि आपराधिक बैकग्राउंड होना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन सत्ता पर काबिज लोग ही मनमर्जियां करते हैं। सवाल यह उठता है कि इतने कानून बनाए जाने के बाद भी उन पर अमल कितना हो पाता है? कितने अपराधी पकड़े जाते हैं? सजा कितनों को मिलती है? बड़ी बात यह है कि पावर, पैसा के जरिए जमानत मिल जाती है और अपराधी अपराधमुक्त हो जाते हैं।

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पारंपरिक खेल: शारीरिक, मानसिक एवं संज्ञानात्मक विकास का आधार

मनुष्य के विकास में खेलों की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि वे बच्चों और युवाओं के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास में भी अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। परंतु वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण और मोबाइल क्रांति ने इन खेलों की जगह आधुनिक डिजिटल खेलों को दे दी है, जिससे बच्चों का जीवन-शैली और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में पारंपरिक खेलों का विशेष स्थान रहा है। कबड्डी, खो-खो, कुश्ती, कंचे, लंगड़ी टांग, पिट्टू, गिल्ली-डंडा, टायर दौड़, लुका-छिपी, गदा-पीठी, घरगुला आदि खेल गाँवों और शहरों दोनों में लोकप्रिय थे। इन खेलों में केवल मनोरंजन ही नहीं था, बल्कि इनमें जीवन के लिए आवश्यक अनेक गुण भी छिपे होते थे।

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“मां के प्रति पुत्र का वैचारिक आकलन”

आइए जानते हैं एक पुत्र अपनी मां के विषय में उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर क्या-क्या विचार रखते हैं।
(1) 0-3 वर्ष = संसार की सबसे ख़ास व अनमोल है उसकी मां। वह सदैव अपनी मां की छत्रछाया में अपने को सुरक्षित महसूस करता है।
(2) 04-05 वर्ष = मेरी मां बहुत महान है और दुनिया में सबसे अच्छी है।
(3) 06-09 वर्ष = मेरी मां सब कुछ जानती है, वह सबसे होशियार है, मेरी मां से होशियार कोई नहीं है।
(4) 12-15 वर्ष = मैं जब छोटा था, मां ज़्यादा प्यार करती थी, अच्छा व्यवहार रखती थी, पर अब नहीं।
(5) 16-17 वर्ष = वर्तमान के साथ मेरी मां नहीं चलती, सच पूछो तो उनको कुछ पता ही नहीं है, कोई ज्ञान ही नहीं है।

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पर्यावरण – जीवन की नींव, सिर्फ़ एक दिन की बुनियाद नहीं”

“पेड़ सिर्फ़ लकड़ी नहीं होते, ये वो साया हैं जो हमारी साँसों को सहारा देते हैं। मिट्टी सिर्फ़ ज़मीन नहीं होती, वो हमारी जड़ों की पहचान है।”
क्या 5 जून पर्यावरण दिवस मनाकर पर्यावरण बच जाएगा?
हर साल 5 जून आता है — हम पेड़ लगाते हैं, कुछ स्लोगन सुनते हैं और फिर अगले दिन वही ज़िन्दगी…प्लास्टिक की बोतल, AC की हवा, डिस्पोज़ेबल कप में चाय, ऑनलाइन ऑर्डर की पैकिंग में लिपटी दुनिया।
तो सवाल अब ये है, कभी लगा कि ये सब करते हुए हम ख़ुद ही उस धरती को जला रहे हैं, जो हमें जन्म देती है?
“धरती को बचाना हाँ बड़ा काम है, बस अपने छोटे-छोटे लालचों से जीतना है।” पर्यावरण क्या है? सिर्फ़ पेड़ नहीं… पूरा जीवन है |
जब हम पर्यावरण कहते हैं, तो उसका मतलब सिर्फ़ हरे-भरे जंगल नहीं होते।
वो हवा जिसमें माँ ने पहली बार गहरी साँस ली थी। वो पानी जो किसी किसान की मेहनत से भरा खेत सींचता है। वो मिट्टी जिसमें बचपन में हमने नंगे पाँव दौड़ लगाई थी। और वो सूरज जिसकी किरणों से शरीर ही नहीं, मन भी तपता है।
“मिट्टी में जो अपनापन है, वो शॉपिंग मॉल की चमक में कहाँ?”
आपदाएं, बीमारियाँ और हमारा बिगड़ता रिश्ता प्रकृति से कोरोना सिर्फ़ एक वायरस नहीं था। वो प्रकृति की एक गूंगी चीख थी, जो जब निकली तो सारी दुनिया थर्रा गई।
जंगल उजाड़े गए, नदियाँ बांधी गईं, ज़मीन खोदी गई, और अब परिणाम सामने हैं: कभी गर्मी 50 डिग्री पार करती है, तो कभी हवा में ज़हर घुला होता है।
“प्रकृति बहुत शांत रहती है, मगर जब बोलती है, तो सब सुनते हैं।”
पर्यावरण और स्वास्थ्य – सीधा संबंध
मैं एक डॉक्टर हूँ। मैंने अपने क्लिनिक में वो माँएं देखी हैं, जिनके बच्चे रोज़ बीमार पड़ते हैं, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनका खाना, पानी, हवा सब कृत्रिम हो चुका है। मैंने वो बुज़ुर्ग देखे हैं जिनकी नींद सिर्फ़ इसलिए गायब है क्योंकि मोबाइल रेडिएशन से उनका दिमाग़ चैन नहीं ले पाता।
“दवा से नहीं, दुआ से पहले ज़रूरत है प्राकृतिक जीवन की।”

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