बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जाए।
इसमें पहली नजर में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिला; सवाल यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।
Read More »
Jansaamna
इतिहास की एक अजीब आदत है। वह हमेशा विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन विजय की नींव रखने वालों को अक्सर भूल जाता है। वह मंच पर खड़े नेताओं की तस्वीरें छापता है, नारों को याद रखता है, भाषणों को उद्धृत करता है, समझौतों की तारीखें लिखता है और इस्तीफों को लोकतंत्र की जीत घोषित कर देता है। लेकिन इतिहास की किताबों में शायद ही कभी उस आदमी का नाम मिलता है जिसने सबसे पहले अपनी जेब से कलम निकाली, मोबाइल निकाला, कैमरा चालू किया और देश को बताया—”यहाँ कुछ ऐसा हो रहा है जिसे पूरे देश को देखना चाहिए।”
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब राजनीतिक दल अभी से महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाएँ। केवल आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं; दलों को आंतरिक कोटा, वित्तीय सहयोग, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और निर्णयकारी भूमिका में महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी। अगर यह मौका चूक गया तो आरक्षण भी दिखावा बन जाएगा। समावेशी और सशक्त लोकतंत्र के लिए अब निर्णायक और नीतिगत पहल ज़रूरी है।
मनुष्य के विकास में खेलों की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि वे बच्चों और युवाओं के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास में भी अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। परंतु वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण और मोबाइल क्रांति ने इन खेलों की जगह आधुनिक डिजिटल खेलों को दे दी है, जिससे बच्चों का जीवन-शैली और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में पारंपरिक खेलों का विशेष स्थान रहा है। कबड्डी, खो-खो, कुश्ती, कंचे, लंगड़ी टांग, पिट्टू, गिल्ली-डंडा, टायर दौड़, लुका-छिपी, गदा-पीठी, घरगुला आदि खेल गाँवों और शहरों दोनों में लोकप्रिय थे। इन खेलों में केवल मनोरंजन ही नहीं था, बल्कि इनमें जीवन के लिए आवश्यक अनेक गुण भी छिपे होते थे।
आइए जानते हैं एक पुत्र अपनी मां के विषय में उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर क्या-क्या विचार रखते हैं।