Tuesday, June 16, 2026
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लेख/विचार

भारतीय राजनीति की ‘मिसाल जोड़ियां’

एक कहावत है कि जोड़ियां आसमान से बन कर आती हैं, लेकिन यह कहावत केवल शादी-विवाह तक ही सीमित है क्योंकि बात जब राजनीति की हो तो दो लोगों के बीच में साझा रणनीति और सूझबूझ अहम हो जाती है। भारतीय राजनीति का इतिहास उन जोड़ियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने साझा विजन, नेतृत्व और रणनीतिक कौशल से देश की दिशा और दशा को आकार दिया। ये जोड़ियां न केवल अपनी पार्टी के लिए बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं। पंडित नेहरू-महात्मा गांधी की वैचारिक साझेदारी से लेकर नरेंद्र मोदी-अमित शाह की आधुनिक रणनीति तक, इन जोड़ियों ने भारतीय राजनीति को एक स्वर्णिम राह पर आगे बढ़ाया।
सर्व ज्ञात है कि स्वतंत्रता संग्राम में गांधी-नेहरू की जोड़ी ने भारत को एकजुट करने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई। गांधी जी का अहिंसा और सत्याग्रह का दर्शन जन-जन तक पहुंचा, तो नेहरू ने अपने आधुनिक और समाजवादी दृष्टिकोण से कांग्रेस को संगठित किया। गांधी की नैतिक शक्ति और नेहरू की वैश्विक सोच ने भारत को आजादी की राह पर अग्रसर किया। यह जोड़ी विचारधारा और कार्यान्वयन के तालमेल का प्रतीक बन गई।
इसी क्रम में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक जोड़ी भी आती है, जिन्हे भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक और प्रभावशाली साझेदारी के रूप में जाना जाता है। दोनों भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में से थे और उन्होंने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी की सफलता का आधार उनकी अलग-अलग लेकिन पूरक नेतृत्व शैली थी, जैसे वाजपेयी हिंदुत्व के विचारों को समर्थन देते थे, लेकिन उनकी छवि ऐसी थी कि गैर-भाजपा दल और अल्पसंख्यक समुदाय भी उन पर भरोसा करते थे। उनकी कविताएं और वक्तत्व कला ने उन्हें जनता का प्रिय नेता बना दिया था, जो आज भी कायम है। दूसरी ओर आडवाणी एक अनुशासित और रणनीतिक नेता थे। उन्होंने भाजपा को संगठनात्मक रूप से मजबूत किया और हिंदुत्व को केंद्र में रखकर पार्टी की विचारधारा को प्रचारित किया। 1998 में वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया, जिसमें आडवाणी का समर्थन महत्वपूर्ण था। वहीं 1999 कारगिल युद्ध के दौरान वाजपेयी की कूटनीति और आडवाणी की आंतरिक सुरक्षा नीतियों ने भारत को मजबूत स्थिति में रखा।
ऐसी ही एक जोड़ी साउथ में भी उभरी। जयललिता और एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) की जोड़ी।

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प्रशासन से पॉपुलैरिटी तक: आईएएस अधिकारियों का डिजिटल सफर

आईएएस अधिकारियों का सोशल मीडिया पर बढ़ता रुझान एक नई चुनौती बनता जा रहा है। वे इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर पर नीतियों से जुड़ी जानकारियाँ और प्रेरणादायक कहानियाँ साझा कर रहे हैं, जो जागरूकता बढ़ा सकती हैं। लेकिन क्या यह डिजिटल स्टारडम उनकी वास्तविक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से समझौता है? व्यक्तिगत छवि बनाने की होड़ में पारदर्शिता और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में एक संतुलन जरूरी है, जहां अधिकारी डिजिटल दुनिया में सक्रिय रहते हुए भी जनता की सेवा को प्राथमिकता दें।
-डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत में सिविल सेवा हमेशा से ही सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। एक आईएएस अधिकारी का दायित्व न केवल नीतियों को लागू करना होता है, बल्कि जनता की समस्याओं को समझकर उन्हें हल करना भी है। लेकिन हाल के वर्षों में एक नया चलन देखने को मिल रहा है – आईएएस अधिकारियों का सोशल मीडिया की ओर बढ़ता आकर्षण।

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सिंदूर’ बनाम विदेश मंत्रालय: पाकिस्तानी हमलों पर भारत के बयानों में दिलचस्प अंतर

राजीव रंजन नाग, नई दिल्ली। पाकिस्तान पर हाल ही में हुए हमलों के संबंध में भारतीय जनता के समक्ष दो अलग-अलग तरह की कहानियाँ पेश की गई हैं। पहली कहानी, जैसा कि ऑपरेशन के नाम “सिंदूर” से पता चलता है, पहलगाम हत्याकांड की धार्मिक प्रकृति को दोहराने और प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से लिंग आधारित हिंदू छवि को उभारने के लिए बनाई गई है।
दूसरी कहानी – एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई अधिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी कहानी – विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में दिखाई दी। इसका नेतृत्व दो महिला अधिकारियों – एक हिंदू और एक मुस्लिम – ने किया और इसमें विदेश सचिव विक्रम मिस्री का एक बयान भी शामिल था, जिसमें दोहराया गया कि पहलगाम हमले का उद्देश्य राष्ट्र को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करना था, लेकिन भारत सरकार और उसके लोगों ने चुनौती का सामना किया और विभाजित होने से इनकार कर दिया।

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मजदूरों का भारत: शोषण के साए में खड़ा विकास

“जिन हाथों ने इस देश की इमारतें खड़ी कीं, उन्हीं हाथों को आज रोटी, छत और पहचान के लिए जूझना पड़ रहा है। दिहाड़ीदार मजदूर केवल श्रम नहीं देते, वे इस देश की नींव हैं — लेकिन सबसे उपेक्षित भी। विकास की रफ्तार में उनका पसीना झलकता है, पर उनकी आवाज़ नहीं सुनाई देती। क्या यही है ‘नए भारत’ का सपना — जहाँ श्रमिक अनदेखे, अनसुने और असुरक्षित रहें?”
-डॉ. सत्यवान सौरभ

बदलते दौर में जब तकनीक, पूंजी और ग्लैमर की दुनिया भारत को चमकाता दिखता है, तब देश का एक बड़ा तबका ऐसा है जो उस चमक की नींव बनाता है लेकिन खुद अंधेरे में घुटता रहता है। यही तबका है — दिहाड़ीदार मजदूर। जिनकी बदौलत गगनचुंबी इमारतें खड़ी होती हैं, सड़कों पर रफ्तार दौड़ती है, और शहर सांस लेता है। परन्तु विडंबना यह है कि इन मजदूरों के जीवन में न तो स्थिरता है, न सुरक्षा, न पहचान और न ही संवेदनशीलता।

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ख़ैर मख़दूम

ये वक्त ख़ैर मख़दूम का, है कितना खुश नसीब।
रिश्तो को जोड़ रखने का, बन जाता है रक़ीब।
हम उनकी मेजबानी का, कितना करें तारीफ़।
लब्ज़ ही मेरे पास ना, हम कैसे करें तारीफ़ ।
ख़ुदा ने जो यह की अता, दुनिया को बेदाग समीर।

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विनाश के पाँच तोप: शिक्षा से तहसील तक

शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, थाना और तहसील जैसे पाँच संस्थानों की विफलता गंभीर चिंता का विषय है। शिक्षा अब ज्ञान नहीं, कोचिंग और फीस का बाजार बन चुकी है। स्वास्थ्य सेवाएँ निजीकरण की भेंट चढ़ चुकी हैं, जहाँ इलाज से ज्यादा पैकेज बिकते हैं। चिकित्सा व्यवस्था मुनाफाखोरी का अड्डा बन गई है। थाने न्याय की जगह रिश्वत का केंद्र और तहसील एक कागज़ी भूलभुलैया बनकर रह गई है। इन संस्थाओं को सुधारने की जरूरत हैं।
-प्रियंका सौरभ

“शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, थाने औ तहसील।
सब मिलकर ताबूत में, ठोंक रहे हैं कील।।”
यह दो पंक्तियाँ महज़ अलंकार नहीं, बल्कि उस निराशा का संगीन उद्घोष हैं, जो आम आदमी की उम्मीदों को कुचलकर उसे निराशा की चुम्बक बनाती हैं। ये पाँच स्तंभों से हमारा समाज अपनी नाजुक मिट्टी का संतुलन बनाये रखता है — पर, अफ़सोस, वे स्वयं पत्थर बन चुके हैं।

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जाति की जंजीरें: आज़ादी के बाद भी मानसिक गुलामी

कैसे लोग अंधभक्ति में बाबा की पेशाब को “प्रसाद” मानकर पी सकते हैं, लेकिन जाति के नाम पर दलित व्यक्ति के छूने मात्र से पानी अपवित्र मान लिया जाता है। इन समस्याओं की जड़ें धर्म, राजनीति, शिक्षा और मीडिया की भूमिका में छिपी हैं। शिक्षा में विवेक की कमी, मीडिया की चुप्पी, धर्मगुरुओं की मनमानी और जातिवादी मानसिकता समाज को पिछड़ेपन की ओर ढकेल रही है। यह सवाल उठाता है कि यदि आस्था किसी बाबा की पेशाब को ‘पवित्र’ मान सकती है, तो एक दलित का पानी ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है?
-प्रियंका सौरभ

भारत, जिसे आध्यात्मिकता और विविधता का देश कहा जाता है, अपने भीतर विरोधाभासों का एक ऐसा संसार छुपाए बैठा है जो कभी-कभी चौंका देता है। एक ओर हम विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और सांस्कृतिक परतों में आज भी मध्ययुगीन सोच जड़ें जमाए बैठी है।

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निजी स्कूलों की मनमानी के चलते अभिभावकों का शोषण !

आज के समय में शिक्षा को ज्ञान का माध्यम कम और व्यवसाय का जरिया अधिक समझा जाने लगा है। निजी स्कूल, जो कभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रतीक माने जाते थे, अब अभिभावकों की जेब पर बोझ बनते जा रहे हैं। कापी-किताबों की आड़ में इन स्कूलों द्वारा की जा रही लूट किसी डकैती से कम नहीं है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो न केवल शिक्षा व्यवस्था की साख पर सवाल उठाता है, बल्कि समाज के मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए गम्भीर संकट पैदा कर रहा है।
हर साल नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों की ओर से किताबों, कॉपियों और स्टेशनरी की लम्बी फेहरिस्त अभिभावकों के सामने पेश कर दी जाती है। ये सामग्रियां न केवल महंगी होती हैं, बल्कि इन्हें खरीदने के लिए अभिभावकों को स्कूल द्वारा निर्धारित दुकानों या प्रकाशकों तक सीमित कर दिया जाता है। बाजार में उपलब्ध सस्ते और समान गुणवत्ता वाले विकल्पों को दरकिनार कर स्कूल प्रबंधन अपनी मर्जी थोपता है। यह स्पष्ट है कि इसके पीछे कमीशन और मुनाफाखोरी का खेल चल रहा है। क्या यह शिक्षा का उद्देश्य है कि बच्चों के भविष्य के नाम पर उनके माता-पिता को आर्थिक रूप से कमजोर किया जाए?
यह शोषण यहीं तक सीमित नहीं है। हर साल पाठ्यक्रम में मामूली बदलाव कर नई किताबें खरीदने की बाध्यता थोपी जाती है, भले ही पुरानी किताबें उपयोगी हों। इसके अलावा, स्कूलों द्वारा आयोजित गतिविधियों, वर्कशॉप और अन्य शुल्कों के नाम पर भी अभिभावकों से अतिरिक्त वसूली की जाती है। एक तरफ सरकार शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाने की बात करती है, वहीं निजी स्कूलों की यह मनमानी उस सपने (सरकार की मंशा) को चकनाचूर कर रही है।

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राम से बड़ा राम का नाम

प्रभु श्री राम का चरित्र हमारा वो सनातन इतिहास है जो इतने वर्षों बाद भी सम्पूर्ण विश्व की मानवता को वर्तमान तथा भविष्य की राह दिखा रहा है।
वो त्रेता युग का समय था जब सूर्यवंशी महाराज दशरथ के घर कौशलनन्दन श्री राम का जन्म हुआ था।
समय कहाँ रुकता है भला ! तो वह अपनी गति से चलता रहा। आज हम द्वापर से होते हुए कलियुग में आ गए हैं। लेकिन इतने सहस्रों वर्षों के बाद भी, इतने युगों के पश्चात भी प्रभु श्री राम का चरित्र देश देशांतर की सीमाओं से परे, वर्षों और युगों के कालचक्र को लांघकर अनवरत सम्पूर्ण विश्व को आकर्षित करता रहा है।
‘‘हरे रामा, हरे कृष्णा’’ का जाप आज वैश्विक स्तर पर एक अनूठी आध्यात्मिक सन्तुष्टि, परम् आनन्द की अनुभूति एवं मनुष्य को एक अलग ही आनन्दमय लोक में पहुँच जाने का अनुभव दिलाने वाला सर्व स्वीकार्य मंत्र बन चुका है।
दरअसल श्री राम का चरित्र ही ऐसा है। एक आदर्श पुत्र हो या एक आदर्श भ्राता (भाई), एक आदर्श पति हो या एक आदर्श राजा, एक आदर्श मित्र हो या फिर एक आदर्श शत्रु! राम मर्यादाओं में रहने वाले,पुरुषों में उत्तम, ऐसे ‘‘मर्यादा पुरूषोत्तम’’ हैं जिनका जीवन कठिनाइयों एवं संघर्षाे से भरा रहा किंतु फिर भी मानव रूप में उन्होंने मुस्कुराते हुए सहज रूप से धर्म की राह पर चलते हुए इस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया कि इतने वर्षों बाद आज भी वह हमारा पथप्रदर्शक है।
कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि प्रभु श्री राम का चरित्र हमारा वो सनातन इतिहास है जो इतने वर्षों बाद भी सम्पूर्ण विश्व की मानवता को वर्तमान तथा भविष्य की राह दिखा रहा है।
इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि आज की 21 वीं सदी में भी जब आदर्श प्रशासन की बात की जाती है तो भारत ही नहीं विश्व भर में ‘‘रामराज्य’’ ही उसका प्रतिमान होता है।
यही कारण है कि हम यह कामना करते हैं कि, ‘‘नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल से घराना हो, चरण हों राघव के जहां मेरा ठिकाना हो।’’
कहते हैं कि जब लंका जाने के लिए श्री राम की वानर सेना समुद्र के ऊपर पुल का निर्माण कर रही थी और वानर समुद्र में पत्थर फेंक रहे थे, तो प्रभु श्री राम ने देखा कि वानर समुद्र में पत्थर पर ‘राम’ नाम लिखकर फेंक रहे हैं और पत्थर तैर रहे हैं। उन्होंने सोचा कि जब मेरा नाम लिखा पत्थर तैर रहा है तो यदि मैं कोई पत्थर फेंकूँ तो वो भी तैरेगा।

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स्वागत योग्य एवं अनुकरणीय है शराबबन्दी

मध्य प्रदेश सरकार ने धार्मिक महत्व के 19 नगरों और ग्राम पंचायतों में एक अप्रैल से शराब बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के अनुसार उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मण्डलेश्वर, ओरछा, मैहर, चित्रकूट, दतिया, पन्ना, मण्डला, मुलताई, मंदसौर और अमर कण्टक की नगरीय सीमा में शराब नहीं बिकेगी। इसके अलावा सलकनपुर, कुण्डलपुर, बांदकपुर, बरमानकलां, बरमानखुर्द और लिंग ग्राम पंचायत सीमा में भी शराब की सभी दुकानें और बार बंद करवाने का आदेश दिया गया है। प्रदेश सरकार का यह कदम स्वागत योग्य और अनुकरणीय है। अच्छा होता यदि यह प्रतिबंध पूरे प्रदेश में लागू होता।

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