Wednesday, November 4, 2026
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लेख/विचार

पहले अपनी जेब टटोलिए

देश में बहुत सारे मुद्दों में एक मुद्दा बढ़ती हुई आबादी भी अहम मुद्दा है। ऐसे में कई लोग बिना सोचेए बिना अपने बैंक बेलेंस की परवाह किए और बिना ये सोचे कि परिवार वहन कैसे होगा चार पाँच बच्चों की लाइन लगा लेते है। फिर भले चाहे बच्चें फटेहाल हालत में कुपोषण का शिकार होते पल रहे हो। परिवार नियोजन में सबसे पहला मुद्दा हर दंपत्ति का आर्थिक स्थिति को लेकर होता है। बच्चे पैदा करना बड़ी बात नहींए आप बच्चों को किस तरह की परवरिश देना चाहते हो ये बात बहुत मायने रखती है। सोचो घर में आप एक ही कमाने वाले है और तीन चार बच्चें पैदा कर लेते है तो न तो आप खर्चे झेल पाओगे न बच्चें ठीक से पले बढ़ेंगे।

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नई पीढ़ी के लिए माँ बाप बोझ क्यूँ

कुछ घरों में माँ बाप के हालात देखकर आँखें भर आती है। नये ज़माने के बच्चों की दुनिया में क्यूँ समा नहीं सकते माँ-बाप जब ये बच्चें बड़े हो जाते है। क्यूँ वो बच्चें इतने ज़्यादा समझदार हो जाते है जब माँ-बाप बूढ़े हो जाते है। माँ-बाप दो मिलकर दो तीन बच्चों को लाड़ से पालते है पर दो तीन बच्चें मिलकर माँ बाप को ढंग से रख नहीं सकते।
माना की एक पीढ़ी का अंतर हो जाता है माँ बाप और बच्चों की सोच के बीच। पर जिनको अपने पैरों पर चलना सिखाया वही बच्चें बोलते है की आपको कुछ पता नहीं, आप नहीं समझेंगे या आपको कुछ आता नहीं ये कहाँ के संस्कार है।

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भारत में बच्चों को कोविड-19 टीकाकरण – ट्रायल को मंजूरी मिली

बच्चे भारत का भविष्य – कोविड -19 से बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा युवाओं की जवाबदारी – एड किशन भावनानी
वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी ने पिछले वर्ष से लेकर तबाही मचाना चालू है। हालांकि वर्ष 2020 के अंत तक थोड़ी राहत मिली थी, परंतु अभी नए वर्ष 2021 की शुरुआत से ही और अभी फरवरी अंत से तो इस महामारी ने उग्र रूप धारण कर अपना रौद्र रूप दिखाया है और विश्व में सबसे अधिक विपरीत असर भारत पर पड़ा है। भारत में इसकी दूसरी लहर अपने पीक पर है। मेडिकल संसाधन अपेक्षाकृत कम पड़ गए और वैश्विक मदद से बड़े स्तर पर सहायता प्राप्त हो रही है।…बात अगर हम भारत में रणनीतिक, चरणबद्ध तरीके से टीकाकरण अभियान की करें तो बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है।

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अकती खेलन कैसें जाऊँ री…..

बुन्देलखण्ड में दूर.दराज गांवों में अखती अपने ही ढंग से मनाई जाती है। अब से 45 वर्ष पूर्व के वो दिन मुझे याद हैं जब मेरे जन्म स्थान खुटगुवां ग्राम उ.प्र. में अलग ही तरह से अक्षय तृतीया मनाई जाती थी। इसे खेल और पूजा दोनों तरह से मनाते थे। वहां इसे अकती कहते हैं। यह तो मुझे बाद में ज्ञात हुआ कि अक्षय तृतीया का ही अपभ्रंस अकती है। अकती. अखती. आखाती. अक्षय तीज. अक्षय तृतीया। यहां यह मुख्यता से महिलाओं का त्योहार बन गया है। विशेषतः कुँवारी कन्याएँ इसमें भाग लेती हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन घर में मिट्टी के छोटे छोटे कलश, एक बड़ा कलश, भींगी हुई चने की दाल आदि रखकर पूजा करतीं। दूसरे दिन रात्रि को ग्राम के बाहर जाकर लगभग एक घंटे तक बरगद के पेड़ की पूजा करने के बाद पुतरा.पुतरिया (गुड्डा.गुड्डी) द्ध का ब्याह रचाया जाता। जिसमें विवाह की सभी रश्में की जाती। लड़कियाँ पूजा से लौटते समय रास्ते में मिलने वाले लोगों को सौन भेंट करती आती हैं। वे झुंड बनाकर घर.घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और सोन बांटतीं है।

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कोरोना महामारी की गांवों में तीव्रता से दस्तक

– संक्रमण फैलने से रोकने महायुद्ध स्तर पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी
– भारत गांव प्रधान देश है गांव में कोविड-19 इलाज का सुचारू प्रबंधन, झोलाछाप चिकित्सकों पर सख्त कार्यवाही, टीकाकरण, जनजागरण अभियान जरूरी – एड किशन भावनानी
वैश्विक रूप से मानव को तीव्रता से संक्रमित कर रही कोरोना महामारी के अब सिम्टम्स पर भी नियंत्रण नहीं रहा।बड़ी तेजी से सिम्टम्स का बदलना, वैश्विक रूप से बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। 2020 में जिसके कुछ सीमित सिम्टम्स से लेकिन अब 2021 में इस महामारी ने भयंकर तांडव मचाते हुए अपने सिम्टम्स में विशालता लाकर विस्तृत परिक्षेत्र में समायोजित कर मानव को घेर रही है जिसमें मानव उसको पता ही नहीं चल पाता और उसके फेफड़े संक्रमित हो चुके होते हैं।….बात अगर हम भारत की करें तो यह एक गांव प्रधान देश है हमारी करीब 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है।

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मरीज़ों से नर्स का सौहार्दपूर्ण नाता

हर साल12 मई को हम वर्ल्ड नर्स डे मनाते है ममता का दूसरा नाम है नर्स क्यूँकि ‘स्पर्श, प्यार और परवाह दवाई का दूजा नाम जब पिलाए परिचारिका अपने हाथों से दवाई या काढ़ा मरीज़ के हर दर्द भागे छुड़ाकर तन से नाता ईश्वर ने स्त्री के भीतर ममता और संवेदना का स्त्रोत कूट.कूट कर भर दिया है। तभी तो परिवार हो या पेशन्ट सबके प्रति सौहार्द भाव से अपना कर्तव्य निभाते जादूई स्पर्श की परत लगाते दर्द से निजात दिलाने में एक नर्स का काम कर रही स्त्री माहिर होती है। इस महामारी में अपने स्वास्थ्य की और परिवार की परवाह न करते मरीज़ों की सेवा में दिन रात अपना योगदान दे रही हर परिचारिकाओं को सौ सलाम। कई जगह पर बिना वेतन के भी सरकारी अस्पताल में सेवाएं दे रही कुछ नर्स,कोरोना मरीज़ो का मुफ्त में इलाज कर निभा रहीं हैं।

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क्यों हो रही है रेमडेसिविर के लिए इतनी मारामारी? कोरोना की रामबाण दवा नहीं है रेमडेसिविर

कोरोना की दूसरी लहर भारत में इतना भयानक रूप धारण कर चुकी है कि पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट को कहने पर विवश होना पड़ा कि यह दूसरी लहर नहीं बल्कि सुनामी है और अगर हालात ऐसे ही चलते रहे तो अनुमान लगाए जा रहे हैं कि अगले कुछ महीनों के भीतर मौतों का कुल आंकड़ा कई लाखों में पहुंच सकता है। इन दिनों कोविड संक्रमण के प्रतिदिन साढ़े चार लाख से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं और हजारों लोगों की रोजाना मौत हो रही हैं। यही कारण है कि कोरोनावायरस के तेजी से बढ़ते मामलों की वजह से देशभर में अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन सिलेंडर तथा कोरोना के इलाज में बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रहे रेमडेसिविर इंजेक्शन सहित कुछ दवाओं की मांग में इतनी जबरदस्त वृद्धि हो गई है कि स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ने लगी हैं

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शादीशुदा बेटे की विडंबना समझो

शायद इस विषय के बारे में कोई सोच भी नहीं रहा। हर विषय, हर किरदार पर लिखा गया है पर शादीशुदा बेटे कि हालत और मन: स्थिति को शब्दों में ढ़ालना आसान नहीं। ये एक ऐसा किरदार है जिस पर दोगुनी जिम्मेदारी होती है। बेटा खुद को माँ-बाप का कर्ज़दार समझता है क्यूँकि जन्म दिया है। और पत्नी का रखवाला क्यूँकि अग्नि को साक्षी मानकर ताउम्र साथ निभाने का वचन दिया है, तो हुआ न सैंडविच।
अक्सर हम कई घरों में सास बहू को लड़ते झगड़ते देखते है। दोषारोपण और तू तू मैं मैं से शुरू होते परिस्थिति अलग होने की कगार तक आ जाती है। जब बेटे की शादी होती है तो यहाँ पर एक माँ को कुछ बातों के लिए खुद को तैयार करना जरूरी होता है। पहले तो आपका औधा एक पायदान उपर उठता है, यानी कि माँ से आप सासु माँ बनने जा रही है।

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कोविड-19 – कोरोना वैक्सीन पेटेंट संरक्षण अस्थाई रूप से सस्पेंड कर मानव प्राण बचाना जरूरी

विश्व व्यापार संगठन ने सभी देशों की सहमति बनाकर शीघ्र निर्णय लेना जरूरी
कोरोना वैक्सीन बौद्धिक संपदा अधिकार स्थगित करना जरूरी – वैक्सीन उत्पादन बढ़ेगा, मानवता का भला होगा – एड किशन भावनानी
विश्व के मानवों को कोरोना महामारी अपने फंदे में जकड़ तीव्रता से निकल रही है और हम मानव अभी तक वैश्विक रूप से आपस में ही उलझ कर रह गए हैं। हालांकि हर देश एक दूसरे की मेडिकल संसाधनों से मदद कर रहे हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्रसंघ भी हरकत में आए हैं परंतु वर्तमान समय में जरूरत है विश्व व्यापार संगठन को अत्यंत तात्कालिक रूप से सभी सदस्य 160 सदस्य देशों की सम्मिट आयोजित कर कोरोना वैक्सीन से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकार को अस्थाई अवधि के लिए तात्कालिक सस्पेंड करने का प्रस्ताव पास करने की ओर ठोस कदम बढ़ाने की जरूरत है ताकि लाखों लोगों की जो विश्व स्तर पर सांसे अटकी हुई है, उन्हें जीवन दान देनेमें यह ठोस प्रस्ताव पारित कर सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सकता है।

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सकारात्मक पहल…

यह सही है कि इस महामारी के दौर में भयानक रूप से संक्रमित हो रहे लोग और उससे भी भयानक मृत्यु के आंकड़ों ने सभी को भयभीत कर रखा है। ऐसे समय में सरकारी व्यवस्थाएं नाकाम साबित हो रही है। लोग बाग बेड, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए परेशान हो रहे हैं। जहां लोग आपदा में अवसर तलाश कर भ्रष्टाचार और कालाबाजारी को बढ़ावा दे रहे हैं, जो मानवता को दरकिनार कर संवेदनहीन होकर सिर्फ अपना लाभ अर्जित कर रहे हैं उन्हें इंसान होने का दर्जा कतई नहीं दिया जा सकता है। उन्हें मानव समाज कभी माफ नहीं करेगा। मगर ऐसे विपत्ति के समय में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मरीजों की सेवा में जी जान से जुटे हुए हैं। इन लोगों के सेवा भाव के कारण इंसानियत पर भरोसा टिका हुआ है।

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