आजादी के बाद कई बार ऐसा समय आया जब किसी जघन्य अपराध ने पूरे देश को झकझोरा, लोग सड़कों पर उतरे, आन्दोलन हुए तथा अपराधियों के लिए कठोरतम दण्ड की मांग ने जोर पकड़ा। सरकारों ने भी तत्परता दिखाते हुए नये तथा अधिक कड़े कानून बनाकर अथवा पुराने कानून में अमूल-चूल परिवर्तन करके आम जन को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया। लेकिन सजा की कठोरता तथा त्वरित एवं निश्चित न्याय के बीच की खाई सदैव न्याय में अन्याय का दर्शन करवाती रही। अपराध-विज्ञान और न्यायिक इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि कानून सख्त बना देना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि असली प्रश्न दंण्ड की कठोरता का नहीं बल्कि दण्ड मिलने कि निश्चितता और प्रक्रिया की गति का है। भारत में ऐसे कानूनों की लम्बी श्रृखला है, जिनमें आजीवन कारावास, कठोर कारावास या फिर मृत्युदण्ड तक के प्रावधान शामिल हैं। हाल ही में संसद द्वारा पारित सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026 में भारी-भरकम जुर्माना और 10 साल तक की सजा के प्रावधान तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाना आदि शामिल है।
अब यहाँ समझना आवश्यक है कि इस विधेयक के आधार पर कठोर कार्यवाही तो तभी होगी जब पेपर लीक का मामला बनेगा। लेकिन पेपर लीक होने की स्थिति में उससे जुड़े छात्रों का क्या होगा? क्या सम्बन्धित परीक्षा को रद्द करके दोबारा कराया जायेगा? और यदि परीक्षा दोबारा हुई तो फिर इस कानून से छात्रों को क्या मिला? जबकि पेपर लीक के बाद रद्द हुई परीक्षा ही छात्रों के आक्रोश और आत्महत्या की मुख्य वजह बतायी गयी है। यह ठीक है कि सख्त कानून बन जाने से अपराधी को भारी जुर्माने के साथ सख्त दण्ड मिलेगा तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट के कारण शीघ्र दण्ड मिलेगा। परन्तु क्या विद्यार्थी इतने भर से सन्तुष्ट हो सकते हैं? क्योंकि परीक्षा रद्द और उसके दुबारा आयोजन को रोकने का यह विधेयक कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं करता है। हत्या आदि के अपराधी को जब मृत्यु दण्ड या कठोर कारावास की सजा मिलती है तो पीड़ित पक्ष किसी न किसी स्तर पर सन्तुष्टि का भाव प्रकट करता है कि देर से सही परन्तु न्याय तो मिला। जबकि पेपर लीक का मामला इससे सर्वथा भिन्न है। क्योंकि पेपर लीक से जुड़े अपराधियों को सख्त सजा मिलने के बाद क्या लाखों विद्यार्थी यह बोलकर सन्तुष्ट हो सकते हैं कि उन्हें न्याय मिल गया। इस आधार पर यदि देखा जाये तो छात्रों की समस्या जस की तस बनी हुई है। परीक्षा में शामिल विद्यार्थियों का परीक्षाफल कुछ भी आये परन्तु परीक्षा रद्द होने के बाद उनका पहला स्टेटमेंट यही होता है और आगे भी होगा कि हमारी पूरे साल की मेहनत बेकार हो गयी। हाल ही में जन्तर-मन्तर पर विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए आन्दोलनकारी छात्रों का मूल विषय यही था ही। लगभग सभी का एक ही स्टेटमेंट था कि हम साल भर मेहनत करते हैं, हमारे माता-पिता एक-एक पैसा जोड़कर कोचिंग करवाते हैं और आप पेपर लीक कर देते हो, एग्जाम रद्द कर देते हो। अतएव इन विद्यार्थियों की समस्या का स्थाई समाधान होना अभी भी शेष है। वैसे भी दण्डनीति का उद्देश्य केवल अपराधी को दण्डित करना नहीं अपितु पीड़ित को सन्तोषजनक न्याय दिलाना भी है। अतः यदि लाखों अभ्यर्थियों को पुनः परीक्षा देनी पड़े तो अपराधी को दण्ड मिलने के बाद भी अभ्यर्थियों की क्षतिपूर्ति नहीं होती है। सार्वजनिक परीक्षा संशोधन विधेयक-2026 पारित होने के बाद यह दावा करना सर्वथा हास्यास्पद ही होगा कि सख्त कानून से डरकर पेपर लीक करने वाले ऐसा अपराध नहीं करेंगे। क्योंकि सर्वेक्षण के आंकड़े और व्यावहारिक अनुभव यही बताते हैं कि सख्त कानून का अपराध की दर में स्थाई गिरावट से कोई सम्बन्ध नहीं है। निर्भया काण्ड के बाद 2013 और 2018 में बलात्कार सम्बन्धी कानूनों में क्रान्तिकारी संशोधन किये गये। यहाँ तक कि मृत्युदण्ड का भी प्रावधान जोड़ा गया। परन्तु उपलब्ध आंकड़े यह नहीं दर्शाते हैं कि सिर्फ दण्ड सख्त कर देने से ऐसे अपराधों में स्थाई और निर्णायक कमी आ गयी हो। क्योंकि समाज में अपराध की मूल वृत्ति जस का तस बनी हुई है। सार्वजानिक परीक्षाओं में पेपर लीक तथा धांधली रोकने के लिए बनाये गये कानूनों का उदाहरण भी इसी वास्तविकता को प्रस्तुत करता है। पेपर लीक जैसी घटनाओं से लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लग जाता है। ऐसी स्थिति में मात्र सख्त कानून बना देने से बच्चों का तनाव दूर नहीं हो सकता। इसके लिए प्रक्रियात्मक तथा व्यावहारिक समाधान खोजने की सख्त जरुरत है।
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए केवल दण्ड बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की तकनीकी सुरक्षा और जवाबदेही तय करना अधिक आवश्यक है। अतः यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक की बात सामने आये तो परीक्षा रद्द कर लाखों बच्चों को दोबारा परीक्षा के मानसिक और आर्थिक तनाव में धकेलने की अपेक्षा लक्षित पुनः परीक्षा जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए मूल परीक्षा के परिणाम घोषित करने के बाद यदि पूर्व निर्धारित सीमा तक उच्च रैंक प्राप्त अभ्यर्थियों की मेरिट सूची बनाकर केवल उन्हीं की दोबारा परीक्षा करवाई जाये और फिर दोनों परीक्षाओं के प्राप्ताकों का फोरेंसिक एवं सांख्यिकीय विश्लेषण करवा लिया जाये। तो नकलची तथा अनुचित साधनों का सहारा लेने वाले अभ्यर्थियों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। इससे निर्दोष परीक्षार्थियों का समय और सरकार का पैसा दोनों बचाया जा सकता है। साथ ही अपराधियों की आसानी से पहचान कर उन्हें कानून के शिकंजे में जकड़ा जा सकता है।
– डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
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