Wednesday, October 7, 2026
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सवालों के घेरे में मुख्य चुनाव आयुक्त

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा है। मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी उंगली पर लगी स्याही उसके अधिकार की गारंटी है और मतदाता सूची से लेकर मतगणना तक पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त है। लेकिन जब इसी चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें तो चिंता स्वाभाविक है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों विपक्षी दलों के तीखे निशाने पर हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), फॉर्म-6 में कथित बदलाव और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। आरोपों की राजनीतिक प्रकृति अपनी जगह है, लेकिन जब इन्हीं आरोपों के बीच सर्वाेच्च न्यायालय को भी चुनाव आयोग से जवाब मांगना पड़े, तो पूरे मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज कर देना उचित नहीं होगा।
सवाल यह नहीं है कि विपक्ष चुनाव आयोग पर आरोप क्यों लगा रहा है। असली सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग उन आरोपों का पर्याप्त, स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से संतोषजनक जवाब दे पा रहा है?
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसकी विश्वसनीयता किसी एक दल, सरकार या व्यक्ति की विश्वसनीयता नहीं होती। आयोग पर उठने वाला सवाल अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठता है। इसलिए आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह विश्वास कायम रखना भी है कि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष है और हर मतदाता के अधिकार की समान रूप से रक्षा की जा रही है।
एस आई आर को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में बहस तेज है। मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना निश्चित रूप से आवश्यक है। फर्जी या अपात्र नाम हटाने के साथ पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम प्रक्रिया की खामी से सूची से बाहर हो जाता है, तो यह महज प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि उसके लोक तांत्रिक अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है।
यही कारण है कि चुनाव आयोग को सवालों से बचने के बजाय सवालों का सामना करना चाहिए। फॉर्म-6 में क्या बदलाव हुए? क्यों हुए? किस प्रक्रिया के तहत हुए? मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था क्या है? इन सभी सवालों के तथ्यात्मक जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
सर्वाेच्च न्यायालय का कड़ा रुख भी इसी व्यापक संवैधानिक चिंता की ओर संकेत करता है। अदालत ने संबंधित मामलों में चुनाव आयोग और उसके सदस्यों से जवाब मांगा है। इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग दोषी सिद्ध हो गया है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट करता है कि उठाए गए सवालों को गंभीरता से देखा जा रहा है। इसलिए किसी भी संवैधानिक संस्था के लिए न्यायपालिका की टिप्पणियों और सवालों को आत्ममंथन का अवसर मानना चाहिए।
दूसरी ओर विपक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाना आसान है, लेकिन हर आरोप को ठोस प्रमाण और तथ्य के साथ सामने रखना जरूरी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना का अधिकार है, लेकिन संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने वाली राजनीति भी सावधानी से होनी चाहिए। आरोप प्रमाणित होंगे तो व्यवस्था मजबूत होगी, केवल आरोपों का शोर होगा तो लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर होगा।
सत्ता पक्ष को भी इस विवाद को केवल विपक्ष की साजिश बताकर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर जनता का भरोसा उसके अपने लोकतांत्रिक हित में है। आज सत्ता में कोई और है, कल कोई और हो सकता है। संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती किसी एक सरकार की नहीं, पूरे देश की आवश्यकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि चुनाव आयोग अपने निर्णयों, प्रक्रियाओं और मतदाता सूची से जुड़े प्रत्येक विवाद पर तथ्य, आंकड़े और दस्तावेज सामने रखे। पारदर्शिता ही संदेह का सबसे प्रभावी उत्तर है।
मुख्य चुनाव आयुक्त व्यक्ति नहीं, एक संवैधानिक पद है। इसलिए सवाल किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि उस संस्था की विश्वसनीयता बचाने का है जिस पर देश के लोकतांत्रिक भविष्य की जिम्मेदारी है।
जनता का वोट लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। मतदाता सूची में उसका नाम और मतदान की निष्पक्ष प्रक्रिया उस ताकत की बुनियाद है। यदि बुनियाद पर सवाल उठ रहे हैं तो जवाब भी उतनी ही गंभीरता से देना होगा।
अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है, सवालों से बचने की नहीं, सवालों का पारदर्शी जवाब देने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण है चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा जीतना।