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“ प्रेम की चिड़िया ”

बहुत छोटी सी कोई बात भी
झकझोर देती है
तो चिड़िया प्रेम की पल भर में
जीना छोड़ देती है
न जबरन बांधना इसको,
संभलकर थामना इसको
जरा सी चोट लग जाए
तो ये दम तोड़ देती है l
***
तड़पती हीर होगी आज भी
राँझे की यादों में
लिपट कर रो रही होगी
समय की वो मियादों में
गली सूनी डगर सूना,
निगाहों का नगर सूना
कि प्यासी नागफेनी के
उदासी का कगर सुना
नहीं पतझड़ से कोई डर
अगन में रोज तपती है
ज़माने की रिवाजें सोच का रूख
मोड़ देती है l
***
लबों पर तो सजाने को
सनम का नाम काफी है
कि जीवन में प्रिये के साथ की
एक शाम काफी है
दिलों के चित्र में भरने को
एक हीं रंग है अच्छा
समर्पण से जुड़ी चाहत का
बेशक संग है अच्छा
बदल जाती हैं जो नज़रें
जरा सी देर में मुड़ कर
वो बेदर्दी से दिल के तार
एक दिन तोड़ देती है l
– कंचन पाठक.