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नटखट तू गोपाल जैसा

मुकेश सिंह

नटखट तू गोपाल जैसा
प्रिय तू मुझको न कोई वैसा।
है हवाओं सी तुझमें चंचलता
चांद सी तुझमें है शीतलता।।
प्रखर सूरज सा ओज है मुख में
बादलों सा पानी है।
गंगा की निर्मलता तुझमें
तू प्यार की रवानी है।।
निश्छल तेरी यह मुस्कान
जग में है सबसे छविमान।
अटक अटक कर तेरा बोलना
सात सुरों की अद्भुत तान।।
गुस्से में तेरा मुंह फुलाना
एक पल में ही प्यार जताना।
गले से लगकर एक हो जाना
भर देता है मुझमें जान।।
फूलों सा कोमल है तू
सुभग बड़ा मनमोहक तू।
अब तू ही मेरी आत्मा मेरा है प्राण
शुभाशीष तुझे विवान।।