
हम उसे यह भी सिखाते हैं कि जीवन एक युद्ध है, एक जीतेगा तो एक हारेगा। हमने उसके जीवन को हार-जीत के खेल के मैदान में बदल दिया है, जहां किसी की मदद लेना या मदद करने को हमने नकल करार दे दिया है। इस पूरी व्यवस्था में हमने बच्चे को उदासीन, आलसी और ऐसा मनुष्य बना दिया है जो कक्षा-कक्ष में केवल अपने प्रतिद्वंदी देखता है न कि अपने हमउम्र सहपाठी जिनके साथ उसे समाज में जीवन जीना है। क्या आप सब मेरी इस बात से सहमत नहीं हैं कि ऐसा करके हम सब ने उसकी मानवीय संवेदनाएं छीनकर उसे मशीन बना दिया है?बच्चों के लिए स्कूल ऐसी जगह बन गया है जो उबाऊ है, अमानवीय है, जहां सब कुछ नकली अभिनय है, शिक्षक के सम्मान से लेकर कक्षा के वातावरण तक। जहां शिक्षक और बच्चे ईमानदारी से संवाद करने को भी स्वतंत्र नहीं है, हर कोई अपने शक और चिंताओं के साए में है। अगर हम अपने बच्चों को समाज के लिए अच्छे, संस्कारी, समझदार, जुझारू एवं आत्मविश्वासी नागरिक बनाना चाहते हैं तो स्कूलों को ऐसी जगहों में बदलना होगा जहां बच्चों को मिलजुल कर काम करने, एक दूसरे की मदद करने, एक दूसरे की गलतियों से परस्पर सीखने के अवसर मिलें, अनुभव मिलें। स्कूल ऐसी जगह बने जहां बच्चों को गलतियां करने के अवसर मिलें, अपनी गलतियों को पहचानने के अवसर मिलें, और उन्हें सुधारने के अनगिनत मौके। कोई क्या जानता है और समझता है इसे हम न तो जानते हैं और ना ही कभी जान पाएंगे, परीक्षा और प्रश्नों के द्वारा तो बिल्कुल ही नहीं जान सकते।
यह दुनिया जटिल है। तेजी से बदल रही है। स्कूल में किसी निश्चित ज्ञान के भंडार को सीख कर सारी जिंदगी उसका उपयोग कर पाना, एक निरर्थक कल्पना है। सच्चाई तो यह है कि दुनिया के सबसे ज्वलंत प्रश्न और समस्याओं का निवारण स्कूलों के पास है ही नहीं। जीवन में शांति, सहिष्णुता, सौहार्द और मानवीय मूल्यों के महत्व पर कितने पाठ्यक्रम हैं आज। बच्चों के लिए अगर कोई बात दुनिया में जीने के लिए आवश्यक होगी तो बच्चे उसका पता करके उसे स्वंय ही सीख लेंगे। किसी भी बात को केवल तभी सीखा जाता है जब उसकी जरूरत महसूस होती है। आज से बीस साल बाद जब स्कूली शिक्षा पूरी करके दुनिया में बच्चा स्वंय कदम रखेगा, तब जिस ज्ञान, कौशल और क्षमता की उसे आवश्यकता होगी, उसमें उसे स्कूलों में उपलब्ध करा ही नहीं पा रहे हैं या करा ही नहीं सकते। बच्चे जिज्ञासावश जो चुनेंगे उसमें से कुछ बातें खराब भी होंगी परंतु कुछ अच्छी बातें भी तो सीखने के अवसर उन्हें मिलेंगे। जब वे उन्हें खुद से चुनेंगे तो अपने गलत चयन को वे अवश्य पहचानेंगे और उसे अवश्य बदलेंगे और यही बात सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कोई कभी गलती ही नहीं करेगा तो उसे सुधारना कैसे सीखेगा? अगर दूसरे लोग उसकी गलती को सुधारते रहेंगे तो वह स्वयं कैसे सीखेगा? जिस बच्चे को चयन करने का कभी अवसर ही न मिला हो, वह सही चयन करने और निर्णय लेने की क्षमता पर कैसे विश्वास कर पाएगा?
प्रदर्शन उठता है कि क्या हम बच्चों को भीरु, आज्ञाकारी, कायर भेड़ों जैसा बनाना चाहते हैं या फिर मुक्त इंसानों जैसा।
लेखिका विज्ञान अध्यापिका, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश