मैं इस समय केरल के वायनाड में हूं। वही वायनाड जहां लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद उपचुनाव हो रहा है। वायनाड का उपचुनाव इसलिए चर्चा में है कि कांग्रेस ने गांधी परिवार की दूसरी सशक्त वारिस प्रियंका गांधी को पहली बार अपना उम्मीदवार बनाया है। रायबरेली-अमेठी के बाद देश में वायनाड इकलौता लोकसभा क्षेत्र बन गया है, जहां गांधी परिवार का दूसरा सदस्य चुनाव मैदान में है। प्रियंका गांधी को प्रत्याशी बनाए जाने से वायनाड लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव को लेकर मीडिया में भले ही खूब शोर हो पर यहां चुनाव बिना शोरगुल का है। सौ किलोमीटर से अधिक लंबे और तीन जिलों (वायनाड, कोझिकोड और मल्लपापुरम) के सात विधानसभा क्षेत्रों (कलपेट्टा, सुलतान बथेरी, मननथवाड़ी, थिरूवमबडी, इरानाड, नीलाम्बुर, वनडुर) में फैले इस लोकसभा क्षेत्र में दिन में बमुश्किल एक दो चुनाव प्रचार वाहन दिख जाएं तो बड़ी बात है। यहां सड़कों पर जुलूस दिखते हैं न नारे सुनाई पड़ते हैं। चुनावी सभाएं भी सिस्टमैटिक और संयमित।
लेख/विचार
क्या मायावती उपचुनाव में बीजेपी की बी-टीम की छवि तोड़ पाएंगी ?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में घटता जा रहा है, खासकर जब से पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2019 में बुरी तरह से हार का सामना किया और उसकी सीटों की संख्या शून्य हो गई। इसके बावजूद, पार्टी की प्रमुख मायावती ने अब उपचुनावों में अपनी सियासी जंग को पुनः तेज करने की योजना बनाई है। उनका उद्देश्य न केवल बीजेपी के ‘बी-टीम’ के आरोप को तोड़ना है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा में भी रणनीति तैयार करना है। मायावती का हाथी अब यूपी उपचुनाव में बीजेपी और समाजवादी पार्टी (सपा) दोनों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बनता हुआ नजर आ रहा है।
अपराध और अपराधियों को बचाने में अधिकारियों की संलिप्तता
इन दिनों हम देखते है कि देश भर में उच्च पदों पर बैठे कुछ अफसरों के भ्र्ष्टाचार और यौन अपराधों में ख़ुद के शामिल होने और अपराधियों को बचाने में उनकी सलिंप्तता के मामले बढ़ते जा रहे हैं जो देश और समाज के लिए सही संकेत नहीं हैं। आख़िर कौन-सी वज़ह हैं कि उच्च पद आसीन व्यक्तित्व (सभी नहीं) इन घिनौनी हरकतों को रोकने कि बजाय ख़ुद इनको अंजाम देने पर तुले हैं। ऐसे में लिप्त अधिकारी के बारे में नकारात्मक बातें कर लोग उसकी अवहेलना करने लगते हैं। अवहेलना के कारण अधिकारी के प्रति अविश्वास पैदा होता है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के पुलिस हिरासत में साक्षात्कार मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस अधिकारियों ने अपराधी को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग करने की अनुमति दी और साक्षात्कार के लिए स्टूडियो जैसी सुविधा प्रदान की जो अपराध को महिमामंडित करने जैसा है।
Read More »ट्रम्प की जीत के भारत के लिए मायने
अमेरिका एक तरह से भारत की तरह है, जो इस सदी की शुरुआत में नई दिशा की तलाश में था; चीजों को हिलाने और एक नया रास्ता बनाने के लिए दो आम चुनाव, एक नीरस दशक और नरेंद्र मोदी के उग्र आगमन की ज़रूरत पड़ी। व्यवसायी ट्रम्प के लिए, खातों को संतुलित करना और व्यापार घाटे को कम करना एक स्वाभाविक कार्य है, जिसे वे 2016 से 2020 तक की तरह ही लगन से अपनाएंगे। उनके पहले कार्यकाल की रणनीति से प्रेरणा लेते हुए, हम अमेरिका से चीन, भारत और यूरोप जैसे दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा बाजारों में तेल और गैस के निर्यात में वृद्धि की उम्मीद कर सकते हैं।
महाराष्ट्र में योगी का ‘हिंदू एकजुटता’ अभियान, क्या ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ बनेगा सत्ता का मंत्र ?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अपनी पहली रैली के माध्यम से राजनीतिक माहौल को बदलने की कोशिश की है। महाराष्ट्र की सियासत में कदम रखते ही उन्होंने ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ और ‘एक रहेंगे तो नेक और सेफ रहेंगे’ जैसे नारे के जरिए हिंदुत्व के मुद्दे को फिर से एक मजबूत दिशा देने की कोशिश की है। योगी आदित्यनाथ का यह कदम महाराष्ट्र में बीजेपी के वोटबैंक को मजबूत करने और हिंदू समुदाय को एकजुट करने के उद्देश्य से लिया गया है, क्योंकि विधानसभा चुनावों में जातिगत समीकरण और धार्मिक ध्रुवीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दीयों से मने दीवाली, मिट्टी के दीये जलाएँ
आधुनिकता के दौर में दीपोत्सव पर मिट्टी की दीये जलाने की परंपरा विलुप्त हो रही है। इससे सामाजिक रूप से व पर्यावरण पर ग़लत प्रभाव पड़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। पर्यावरण को बचाने के लिए ज़रूरी है आमजन दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने व पटाखे नहीं चलाने का संकल्प लें। इस दीपावली मिट्टी के दीये जलाएँ, तभी पर्यावरण बचाने में हम सफ ल हो पायेंगे।आधुनिकता के दौर में दीपोत्सव पर मिट्टी की दीये जलाने की परंपरा विलुप्त हो रही है। इससे सामाजिक रूप से व पर्यावरण पर ग़लत प्रभाव पड़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। पर्यावरण को बचाने के लिए ज़रूरी है आमजन दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने व पटाखे नहीं चलाने का संकल्प लें। इस दीपावली मिट्टी के दीये जलाएँ, तभी पर्यावरण बचाने में हम सफल हो पायेंगे।
मणिपुर की जातीय हिंसा, अधिकारियों की अग्नि परीक्षा
हिंसा और जातीय विभाजन के कारण एस्प्रिट डे कॉर्प्स (अधिकारियों के बीच एकता और आपसी सम्मान) तनाव में है, जिससे अधिकारियों के बीच सहयोग और विश्वास कमजोर हो रहा है। संघर्ष ने एआईएस अधिकारियों के बीच पारस्परिक सम्बंधों पर गहरा प्रभाव डाला है, सामाजिक आदान-प्रदान और सहयोग दुर्लभ हो गए हैं। नफ़रत फैलाने वाले भाषण, प्रचार और ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से सार्वजनिक चर्चा के ध्रुवीकरण ने रिश्तों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है, जिससे विभिन्न जातीय पृष्ठभूमि के अधिकारियों के लिए एक साथ काम करना मुश्किल हो गया है। मणिपुर में जातीय हिंसा ने गहरे जड़ें जमा चुके सांप्रदायिक संघर्षों से निपटने में भारत की प्रशासनिक प्रणाली की कमजोरी को उजागर कर दिया है। हालाँकि यह स्थिति अखिल भारतीय सेवाओं की अखंडता के लिए गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है, यह संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों में शासन के दृष्टिकोण पर पुनर्विचार और सुधार करने का एक अनूठा अवसर भी प्रदान करती है। क्षमता निर्माण, अनुसंधान और नवीन नीति उपायों पर ध्यान केंद्रित करके, आईएएस और अन्य सेवाएँ संकट को एक सीखने के अनुभव में बदल सकती हैं जो भविष्य के संघर्षों में “स्टील फ्रेम” के लचीलेपन को मज़बूत करती है।
-प्रियंका सौरभ
मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा 3 मई, 2023 को भड़क उठी। इस संघर्ष में 200 से अधिक मौतें हुईं और 60, 000 लोग विस्थापित हुए। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष की जड़ें मणिपुर के जातीय और ऐतिहासिक संदर्भ में गहराई से जुड़ी हुई हैं।
प्रियंका गांधीः 25 साल प्रचार, अब उम्मीदवार..
राजनीति की ‘स्टार’ प्रियंका गांधी कुछ ही वर्षों से कांग्रेस महासचिव है। पहले यूपी की प्रभारी भी रहीं। पार्टी में इस पद के पहले उनकी शुद्ध भूमिका प्रचारक की रही। पापा (पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी) के साथ अमेठी में राजनीति का ककहरा सीखा। मां सोनिया गांधी और पापा के बालसखा कैप्टन सतीश शर्मा के प्रचार की कमान संभाल कर व्यवहारिक पाठ पढ़ा। लगातार जीत का इतिहास गढ़ा। भाई राहुल गांधी के साथ विपक्ष में जीवन को कढ़ा। ढाई दशक तक केवल और केवल परिवार और पार्टी के लिए पसीना बहाते हुए प्रियंका गांधी अब राजनीति के उस मुकाम पर पहुंच रही हैं जो हर राजनीतिक का सपना होता है। वह चाहती तो कभी का इस मुकाम पर पहुंच चुकी होतीं लेकिन परिवार की मर्यादा तोड़ी न छोड़ी। सिर्फ मां, भाई और विरासत में मिली पार्टी की सेवा ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य रहा।
हाँ! इन 25 वर्षों के प्रचार अभियान कभी मनमुताबिक मां और भाई को वोट न मिलने पर प्रियंका कार्यकर्ताओं नेताओं से नाराज भी हुई और अच्छा रिजल्ट आने पर सबकी तारीफ में भी कोई कमी नहीं की। यह उनका अपना स्टाइल है। पब्लिक से भावनात्मक और मुद्दे के रूप में ‘कनेक्ट’ करना जितना वह जानती हैं, उतना शायद ही कोई और नेता जानता हो। सोनिया गांधी के 20 वर्षों के कार्यकाल में हमने उनकी यह खूबी बहुत नजदीक से देखी है। एक अवसर तो ऐसा भी आया जब प्रियंका गांधी ने हम जैसे सामान्य पत्रकार को भी व्यक्तिगत रूप से जीत दिलाने में श्रेय देते हुए हाथ जोड़ दिए। ऐसा केवल हमारे साथ ही हो ऐसा भी नहीं। उन्होंने मां और भाई के चुनाव क्षेत्र में हर छोटे बड़े आम और खास सबका ख्याल रखा।
पीएचडी छात्रों के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के मायने
नेट पर बढ़ती निर्भरता अनजाने में भारत में शोध के दायरे को सीमित कर सकती है। अनुसंधान विचार, कार्यप्रणाली और परिप्रेक्ष्य की विविधता पर पनपता है। नेट जैसे मानकीकृत परीक्षण, जो आलोचनात्मक सोच पर याद रखने को प्राथमिकता देते हैं, ऐसे विद्वान पैदा कर सकते हैं जो परीक्षा उत्तीर्ण करने में माहिर हैं लेकिन ज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ाने की क्षमता का अभाव है, पूछताछ की यह संकीर्णता नवाचार और मूल विचारों के विकास, दोनों को सीमित कर सकती है शैक्षणिक क्षेत्रों में प्रगति के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। पीएचडी प्रवेश के लिए प्राथमिक मानदंड के रूप में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) का उपयोग अकादमिक जांच और आलोचनात्मक सोच के दायरे को सीमित कर रहा है।
-प्रियंका सौरभ
नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट जिसे यूजीसी नेट या एनटीए-यूजीसी-नेट के रूप में भी जाना जाता है, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर के लेक्चररशिप के लिए योग्यता और भारतीय नागरिकों के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप के पुरस्कार के लिए निर्धारित करने के लिए एक परीक्षा है।
दहन स्रोतों से बिगड़ती हवा की गुणवत्ता
स्वच्छ हवा हासिल करने के लिए हमें बेहतर विकल्पों या कुशल प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों की ओर जाना होगा।
नीति निर्माताओं को महामारी विज्ञान, पर्यावरण, ऊर्जा, परिवहन, सार्वजनिक नीति और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए। यह दृष्टिकोण जलवायु और वायु गुणवत्ता उपायों को गति देगा। हमें समझना होगा कि अधिकतम वायु प्रदूषण दहन स्रोतों से पैदा होता है। वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है। पराली, आतिशबाजी और इंडस्ट्री का धुआं घातक हो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी कमाई के सिवाय कुछ नहीं कर रहा। इंडस्ट्रियल एरिया में पुराने टायर जलाकर जहरीला वायु प्रदूषण रोजाना पैदा किया जा रहा है इसे कोई नहीं रोक रहा। इसलिए स्वच्छ हवा हासिल करने का सबसे अच्छा तरीक़ा ये होगा कि फॉसिल ईंधन की खपत और उसे जुड़े उत्सर्जनों को कम किया जाए, जिसके लिए हमें बेहतर विकल्पों या कुशल प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों की ओर जाना होगा।
-डॉ सत्यवान सौरभ
Jansaamna