Thursday, June 18, 2026
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लेख/विचार

क्या बीजेपी को मिलेगी हरियाणा की सत्ता फिर से ?

बीजेपी बेहतर आर्थिक विकास, रोजगार के अवसर और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जोर दे रही है। इसके अलावा भाजपा जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की भी कोशिश में लगी है। साथ ही भाजपा के बड़े नेता चुनाव प्रचार के दौरान किसानों के मुद्दों पर पार्टी की स्थिति को साफ कर सकते हैं, ताकि आंदोलन के कारण पैदा हुए असंतोष को कम किया जा सके। बीजेपी ने हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से 46 पर सबसे ज्यादा वोट हासिल किए। हालांकि, एंटी इनकम्बेंसी, किसान आंदोलन, और जेजेपी से गठबंधन का टूटना बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती है। विपक्षी दलों की एकजुटता और जातीय समीकरणों का का प्रभाव भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या बीजेपी हरियाणा की सत्ता में लौट पाती है या नहीं? -डॉ सत्यवान सौरभ

पिछले 10 साल से प्रदेश की सत्ता चला रही भाजपा तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में इस बार सत्ता की लड़ाई बेहद दिलचस्प हो गई है। क्या पिछले 10 सालों से सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को इस बार भी सत्ता नसीब होगी। बीजेपी के चुनावी अभियान का प्रमुख चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं।

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मैं ओजोन हूं, मानव से कुछ कहना चाहती हूंः ‘मानव अपने छद्म विकास के लिए मुझे नष्ट कर रहा है, मैं रक्षक हूं भक्षक नहीं’

आज 16 सितंबर विश्व ओजोन दिवस है, वही ओजोन जो पूरे ब्रह्मांड को सूर्य की हानिकारक किरणों अर्थात पराबैंगनी विकिरणों (युवी-बी) को रोकने का कार्य करती है, मैं ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली गैस हूं, मेरा रंग हल्का नीला है साथ ही मैं समुद्र तट से 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर समताप मंडल के निचले भाग में तीखी गंध के साथ एक विषैली गैस के रूप में विद्यमान हूं और हां मेरी मोटाई भौगोलिक स्थिति के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है, मेरी मोटाई नापने की इकाई डॉबसन है।
वैसे मुझसे, आपको फ्रांस के दो भौतिकविदों फेबरी चार्ल्स और हेनरी बुसोन ने सन् 1913 में परिचित कराया था, इससे पहले ईश्वर के इस चमत्कार से मानव जाति अनभिज्ञ थी।
मानव जब तक वास्तव में मानव रहा तब तक मैं स्वस्थ रही साथ ही ईश्वर द्वारा दिए गए कार्य को मे बखूबी निभाती रही परंतु जैसे ही मानव स्वार्थी होकर अपने विकास में लगा तो मेरा ह्रास होने लगा, जिसकी पहली बानगी मानव को 1980 में अंटार्कटिका में देखने को मिली जहां का तापमान -80 डिग्री से भी नीचे रहता है, यह स्थान मानव जाति के लिए कब्रगाह के समान है। संपूर्ण वर्ष में सबसे ज्यादा ह्रास सितंबर और अक्तूबर मे देखने को मिला।

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जम्मू-कश्मीर में भाजपा का नया दांव, इंजीनियर राशिद की रिहाई से चुनाव गरमाया

जम्मू कश्मीर जम्मू-कश्मीर में करीब 10 साल बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहा है और राजनीति के नये दांव पेंच ने इसे दिलचस्प बना दिया है। बारामूला के सांसद राशिद इंजीनियर जेल से बाहर आ गए हैं। राशिद को जमानत मिलते ही राजनीतिक पारा गरमा गया है।
आतंकवाद के लिए धन जुटाने के आरोपी सांसद इंजीनियर राशिद के चुनाव प्रचार से किसे फायदा और किसे नुकसान होगा, यह सवाल घाटी में गहराता जा रहा है। नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस में खलबली मच गई है। नया सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर राशिद की आवामी इत्तेहाद पार्टी से बीजेपी को क्या फायदा होने वाला है।
राशिद के जेल से बाहर आने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की चुनौतियां सबसे अधिक बढ़ गई हैं। राशिद वही शख्स है जिसने जेल में बंद रहने के बावजूद 2024 में पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को बारामूला लोकसभा सीट से हरा दिया था। अब उमर अब्दुल्ला दलील दे रहे हैं कि राशिद को चुनाव के लिए जमानत मिली है। राशिद और उनके लोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। नेशनल कांफ्रेस के बाद पीडीपी सुप्रीमो महबूबा मुफ्ती ने राशिद की पार्टी पर जमकर निशाना साधा है, उनका कहना है कि राशिद की पार्टी आईपी भाजपा की नई अघोषित पार्टी है।
दरअसल राशिद लंबे समय से सलाखों के पीछे रहे हैं, यही वजह है कि जनता की सहानुभूति वे लोकसभा में भी बटोरने में कामयाब रहे, इस बार वह विधानसभा चुनाव में इसी भावना के साथ और मतदाताओं से जुड़ सकते हैं जिससे विपक्षी दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राशिद की पार्टी ने पूरे घाटी में पैर पसार लिए है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक रशीद के 26 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। राशिद के छोटे भाई शेख ख़ुर्शीद ने लैंगेट से नामांकन भरने के बाद कहा था कि राशिद के जमानत से बाहर आने पर सैलाब आएगा। राशिद के भाई खुर्शीद अहमद शेख सरकारी अध्यापक थे जिन्होंने चुनाव लड़ने के लिए नौकरी छोड़ दी है।
घाटी में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी का अपना वोट बैंक है। राशिद की पार्टी इन्हीं वोटरों को अपने पाले में ला सकती है, इससे जहां मामला त्रिकोणीय होगा तो भाजपा को एक तरह से फायदा मिल सकता है।

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नई पेंशन योजना कितनी कारगर?

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यूनिफाइड पेंशन योजना लागू की जिसके तहत इस योजना का लाभ सरकारी कर्मचारियों को दिया जाएगा साथ ही यह भी कहा गया कि 2004 के बाद रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलेगा। यह योजना एनडीए गवर्नमेंट की नई योजना है जिसे नेशनल पेंशन स्कीम एनपीएस के समांतर जारी किया गया है और यह योजना 1अप्रैल 2025 से लागू होगी। गौरतलब है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए एनपीएस और यूपीएस में से एक को चुनने का विकल्प रखा गया है। वहीं देश के कई राज्यों में पुरानी पेंशन योजना ओपीएस अभी भी लागू है। अब ऐसे में लोगों को ओपीएस, एनपीएस और यूपीएस में अंतर करना मुश्किल हो रहा है, लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि कौन सी योजना उनके लिए लाभदायक है और उनके लिये अनुकूल होगी।
यूपीएस पेंशन योजना के तहत केंद्रीय कर्मचारियों को एक निश्चित पेंशन दिया जाएगा जो आखरी 12 महीने की औसत मूल वेतन का 50% होगा। कर्मचारियों को यह पेंशन पाने के लिए कम से कम 25 साल तक नौकरी करनी होगी। वहीं अगर किसी कर्मचारी की सेवा में रहते हुए मृत्यु होने की स्थिति में परिवार (पत्नी) को 60 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलेगा। इसके अलावा 10 साल तक की न्यूनतम सेवा की स्थिति में कर्मचारी को कम से कम 10 हज़ार रुपये प्रति माह पेंशन के रूप में दिए जाएंगे। इसके अलावा कर्मचारी और फ़ैमिली पेंशन को महंगाई के साथ जोड़ा जाएगा। इसका लाभ सभी तरह की पेंशन में मिलेगा। वहीं ग्रैच्युटी के अलावा नौकरी छोड़ने पर एकमुश्त रकम दी जाएगी। इसकी गणना कर्मचारियों के हर छह महीने की सेवा पर मूल वेतन और महंगाई भत्ते के दसवें हिस्से के रूप में होगी।

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यूपी में सपा का पीडीए तो कांग्रेस का पीएमडी

संजय सक्सेनाः लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत की मजबूत कड़ी और इंडिया गंठबंधन के सहयोगी दल समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) से प्रभावित होकर कांग्रेस ने भी उत्तर प्रदेश में पीडीए को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है। इसी क्रम में सपा की तरह कांग्रेस आलाकमान ने भी यूपी के पिछड़ा, मुस्लिम और दलित (पीएमडी) समाज के तीन नेताओं पर दांव चला है, जिसके तहत उक्त समाज के तीन वरिष्ठ नेताओं को केंद्रीय कांग्रेस कमेटी में शामिल करते हुए न केवल इन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है, बल्कि इनके कंधो पर महत्वपूर्ण चुनावी राज्यों की जिम्मेदारी भी डाली गई हैै, जिन तीन नेताओं को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है उमसें कांग्रेस नेता मुस्लिम चेहरा शाहनवाज आलम, दलित नेता सुशील पासी को राष्ट्रीय सचिव बनाते हुए बिहार का सह प्रभारी बनाया है। इसी तरह पिछड़ा समाज से आने वाले नेता विदित चौधरी को राष्ट्रीय सचिव बनाकर हिमाचल व चंडीगढ़ का सह प्रभारी बनाया गया है।

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धीमा न्याय निर्भयाओं को कर रहा कमजोर

महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा में संस्थागत कारकों में अपर्याप्त संसाधन वाले पुलिस बल और अप्रभावी कानून प्रवर्तन सहित संस्थागत विफलताएं, महिलाओं के खिलाफ हिंसा के जारी रहने में योगदान करती हैं। अक्सर, मामले या तो दर्ज नहीं किए जाते हैं या पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है, जिससे सजा की दर कम होती है। 2012 में निर्भया मामले में हुई कथित देरी ने पुलिस प्रक्रियाओं और कानून प्रवर्तन में महत्वपूर्ण खामियों को उजागर किया, जिससे व्यापक सार्वजनिक आक्रोश हुआ। धीमी न्यायिक प्रक्रिया और लंबित मामले महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की प्रभावशीलता को कमज़ोर करते हैं। विलंबित न्याय अक्सर पीड़ितों को कानूनी मदद लेने से हतोत्साहित करता है और अपराधियों को सज़ा से बचने का मौक़ा देता है। 2012 के निर्भया मामले में अभियुक्तों के मुक़दमे में लगभग आठ साल लग गए, जो महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा के मामलों में न्याय की सुस्त गति को दर्शाता है।
-प्रियंका सौरभ
कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम (2013) जैसे प्रगतिशील कानूनों के अस्तित्व के बावजूद, निगरानी, जवाबदेही और संस्थागत समर्थन की कमी के कारण उनका कार्यान्वयन कमज़ोर बना हुआ है। राष्ट्रीय महिला आयोग के एक अध्ययन में पाया गया कि कई कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समितियों का अभाव है, जो यौन उत्पीड़न अधिनियम को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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भाई की कलाई

वक्त बहुत तेजी से आगे बढ़ते जाता है और हम उसके साथ बढ़ते हुए भी पीछे रह जाते हैं यादें पीछा ही नहीं छोड़ती। बचपन में मैं घर में सभी की बहुत लाडली थी। किसी भी चीज के लिए भैया को बाद में मुझे सबसे पहले पूछा जाता था। घर में कोई भी प्रसंग हो मेरी उपस्थिति हर जगह रहती थी और मैं हर जगह आगे भी रहती थी। चंचल स्वभाव के कारण मैं सभी की नजरों में चढ़ी रहती थी। चंचला कहकर सभी लोग मुझे चिढ़ाते थे और इसी वजह से मेरा नाम भी चंचला पड़ गया था। रक्षाबंधन पर भी मेरी जिद रहती थी कि सबसे पहले राखी मैं ही बांधूंगी और मेरी राखी आगे ही होनी चाहिए लेकिन मालूम नहीं था कि ये पहले और आगे का चक्कर में मुझे भविष्य में राखी बांधने के लिए कलाई नहीं मिलेगी। शादी के बाद दूरी की वजह से मेरा जल्दी-जल्दी पीहर जाना मुश्किल हो गया था, फिर जब भी समय मिलता तो साल डेढ़ साल में एक बार जाकर आ जाती थी। घर से कभी दूर ना रहने वाली मैं स्टेशन पर पापा को देखकर ही सब सामान छोड़कर उनसे लिपट जाया करती थी। वो एक आलिंगन, वह दुलार और आंखों में सुकून उस बीते वक्त की खामी को खत्म कर देता था। भैया भी मुस्कुराते हुए पीछे से सारा सामान लेकर मुझे चिढ़ते हुए घर लेकर आते थे।

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जीवन में तीन रंगो का सामंजस्य

जिंदगी एक इंद्रधनुष है। सात रंग के सपने बुनते हुए हम अपने बीते कल से कुछ सीखते हैं। आज को संवारते हैं। और आने वाले कल के लिए उम्मीदों के बीज छोड़ जाते हैं। इन तीन पड़ावों के लिए जिंदगी के इंद्रधनुष से हमें तीन रंगों की जरूरत होती है। शौर्य के लिए केसरिया, सादगी के लिए सफेद और खुशियों के लिए हरा। जिंदगी की आजादी भी शायद इन्हीं तीन रंगों से शुरू होती है, लेकिन क्या कोई इन रंगों को हमसे चुरा ले गया है ? जीवन को क्यों जरूरत है इन रंगों की, आगे इन्हीं पर चर्चा होगी।
आज जश्न आजादी के रंग में सारी दुनिया फिर से सराबोर और होगी। बच्चे-बड़े, बुजुर्ग हर कोई इस रंग में रंगा नजर आएगा। तीन रंगों के झंडे को आसमान में लहराता देख हम गौरवांवित होंगे। आजादी का एहसास कराते इन रंगों का मेल ही ऐसा है, जो सबको अपने रंग में रंग देता है। इस रंग में रंगने के बाद हमारे अंदर की सारी नकारात्मकता दूर हो जाती है। कुछ पल के लिए ही सही, पर तिरंगे को देख मन में एक आशा की किरण जगती तो है ही।
सरकारी अव्यवस्था, शासन-प्रशासन की कमियों को लेकर अपनी जिंदगी को कब तक बेरंग करते रहेंगे हम। दूसरों की गलतियों को दिखाने और गिनाने में लगे रहेंगे, तो जीवन में निराशा, क्रोध, तनाव तो आएंगे ही। हर काम के लिए सरकार को कोसने रहने से अच्छा है कि हम भी अपना उत्तरदायित्व समझे। स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका भी तय करें। तिरंगे की तीन रंग यही तो हमें सिखाते हैं। अपने मन के बंधन को तोड़ इन तीन रंगों को महसूस तो कीजिए। अगर जिंदगी में ये रंग एक बार फिर से लौट आए, तो सही मायने में आजादी का अनुभव हो।

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स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विशेष

सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी: भारत के प्रथम राष्ट्रीय नेता की निर्माण यात्रा
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आधुनिक भारत के अग्रदूतों में से एक थे और ब्रिटिश राज के भीतर स्वशासन के समर्थक थे। उन्होंने देश की आजादी में प्रभावशाली भूमिका निभाई। एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर के रूप में करियर शुरू करने से लेकर कांग्रेस के माध्यम से राजनीति में कदम रखने तक, उनका प्रभाव और भी अधिक बढ़ गया।
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का जन्म 10 नवंबर 1848 को कलकत्ता, भारत में हुआ था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने सिविल सेवा में जाने का लक्ष्य बनाया। 1868 में वे बिहारी और लाल गुप्ता रोमेश चंद्र दत्त के साथ भारतीय सिविल सेवा परीक्षा देने के लिए इंग्लैंड गए। उस समय, वे एकमात्र हिंदू थे, जिन्होंने चुनौतीपूर्ण सवालों का सामना करने के बावजूद साक्षात्कार बोर्ड को पार कर लिया था।
भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच के यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकते थे। किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं। वे सार्वजनिक जीवन में आए। 1858 में भारत सीधे तौर पर अंग्रेजी शासन के अधीन आ गया था। बंगाल एवं बॉम्बे प्रेसिडेंसी में इससे पहले ही संवैधानिक राजनीति बढ़ गई थी। इसके बावजूद भारत के विभिन्न भागों के बीच संवादहीनता से उनका आपसी संपर्क कायम नहीं हो पाया। किंतु 1870 एवं 1880 के दशक में रेल नेटवर्क के प्रसार ने इन कमियों को दूर कर दिया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1848-1925) इसका लाभ उठाने के लिये सही समय पर सही व्यक्ति थे। वह अखिल भारत के प्रथम नेता के रूप में उभरे।

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विदिशा: जहां नागपंचमी पर ताले की पूजा होती है

आपने देश में जगह-जगह तरह-तरह की पूजा के बारे में सुना होगा, पर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे विदिशा शहर में एक स्थान ऐसा भी है जहां नागपंचमी पर ताले की पूजा होती है और यह किसी परम्परा या मान्यता के कारण नहीं होता बल्कि यह पूजा यहां एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) के आदेश के कारण होती है। दिलचस्प यह है कि यह पूजा एक ऐसे मंदिर में होती है जिसकी डिजाइन पर नई लोकसभा का निर्माण हुआ है।
मध्यप्रदेश का विदिशा शहर एक ऐतिहासिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। बेतवा नदी के किनारे भगवान राम के चरण यहां जिस जगह पर पड़े वह जगह यहां चरणतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती (कहीं-कहीं इनका नाम यूपकेतु और सुबाहु भी मिलता है) भी यहां के राजा रहे। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वाल्मीकि ऋषि भी इसी क्षेत्र के निवासी थे। सम्राट अशोक की पत्नी विदिशा भी यहां के नगर सेठ की कन्या थीं।

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