अब की बरसी तो जोर से बरसी…कहीं गांव तो कहीं शहर ले डूबी
और ले डूबी खेतों में काम करते
किसानों की उम्मीद…!
धरती तो तृप्त हो गई…
कोयल भी कूकने लगी…
लतायें फिर से झूमने लगी
लेकिन फिर भी
मिट्टी का भाग्य नहीं बदला….!
आकाश का रीतापन भी तो देखो
जैसे बादल रो कर
अपनी उदासी को धरती में
समाहित कर देना चाहता है…
आषाढ़ की बारिश जमकर बरसी…!
प्रकृति भी कहाँ न्याय कर पाई?
जी उठी धरती और
संतप्त हुआ किसान का मन…
इस बार आषाढ़ में बरसा तो बहुत
किसान का भीगता मन….!
— प्रियंका वर्मा माहेश्वरी
गुजरात
गुजरात
Jansaamna