Thursday, September 10, 2026
Breaking News
Home » लेख/विचार » 2075 के भारत के लिए रेलवे का निर्माण

2075 के भारत के लिए रेलवे का निर्माण

माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 8 सितंबर को पूर्ण हो चुके पश्चिमी समर्पित माल गलियारे—वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर—को राष्ट्र को समर्पित किया जाना भारतीय रेल के बदलते स्वरूप की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने रेलवे के बुनियादी ढाँचे पर विशेष बल दिया है—विद्युतीकरण, नई रेल लाइनें, दोहरी और बहुल लाइनें, स्टेशनों का पुनर्विकास, आधुनिक ट्रेनें, बेहतर सुरक्षा एवं सिग्नल प्रणाली और देश के सर्वाधिक व्यस्त रेलमार्गों पर अतिरिक्त क्षमता का निर्माण इसी प्रयास का हिस्सा हैं।

वडोदरा में प्रधानमंत्री ने इस व्यापक सोच को कुछ शब्दों में बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया—“हम लोगों और सामान को अधिक तेजी से पहुँचाने, नए अवसर पैदा करने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए भारत के बुनियादी ढाँचे को मजबूत कर रहे हैं।”

पश्चिमी डीएफसी के पूरा होने के साथ ही देश के दो विशाल समर्पित माल गलियारे—1,337 किलोमीटर का पूर्वी डीएफसी और 1,506 किलोमीटर का पश्चिमी डीएफसी—मिलकर 2,843 किलोमीटर का नया माल परिवहन नेटवर्क तैयार करते हैं। इसका महत्व केवल मालगाड़ियों तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे माल यातायात समर्पित गलियारों पर स्थानांतरित होता है, परंपरागत रेलमार्गों पर यात्री ट्रेनों के लिए बहुमूल्य रास्ते उपलब्ध होते हैं; दूसरी ओर, बंदरगाहों, औद्योगिक क्षेत्रों, खदानों, उत्पादन केंद्रों और बाजारों के बीच माल परिवहन अधिक तेज और भरोसेमंद बनता है।

यह उपलब्धि हमें एक और बड़ा प्रश्न पूछने का अवसर देती है—2050 और फिर 2075 के भारत को कैसी रेलवे की आवश्यकता होगी?

रेलवे की योजना तब शुरू नहीं हो सकती, जब यातायात हमारे दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाए। आज बनाई गई एक रेल लाइन सौ वर्ष या उससे भी अधिक समय तक देश की सेवा कर सकती है। भारतीय रेल की कई सबसे व्यस्त धमनियाँ आज भी उन्हीं मार्गों पर चल रही हैं, जिनका सर्वेक्षण और निर्माण डेढ़ सौ वर्ष से भी पहले हुआ था।

➤  जब भारत ने भविष्य के लिए रेल बनाई

हमारे अपने रेलवे इतिहास में इसका एक अद्भुत उदाहरण मिलता है। भारत की पहली यात्री रेलगाड़ी 1853 में बम्बई से ठाणे तक केवल 21 मील चली थी, लेकिन अगले चालीस वर्षों में रेलवे नेटवर्क बढ़कर लगभग 18,500 मील हो गया। अर्थात् पूरे चालीस वर्षों तक औसतन लगभग 460 मील, या 740 किलोमीटर, नया रेलमार्ग हर वर्ष जुड़ता रहा।

स्वतंत्रता के बाद के काल से इसकी तुलना दिलचस्प है। 1950-51 में भारतीय रेल के पास 53,596 रूट किलोमीटर थे; आज यह लगभग 69,000 किलोमीटर है—अर्थात् सात दशकों से अधिक समय में औसतन करीब 214 रूट किलोमीटर प्रतिवर्ष की भौगोलिक वृद्धि। निस्संदेह, स्वतंत्र भारत ने विरासत में मिले नेटवर्क के आमान परिवर्तन, विद्युतीकरण, दोहरी और बहुल लाइनों, मजबूत पटरियों, सिग्नल प्रणाली और क्षमता विस्तार में बहुत बड़ा निवेश किया है। इसलिए दोनों कालखंडों की सीधी तुलना उचित नहीं होगी। यहाँ महत्वपूर्ण बात केवल यह समझना है कि कभी भारत में रेल नेटवर्क के भौगोलिक विस्तार की कल्पना कितने बड़े पैमाने पर की गई थी—और तेजी से बढ़ते भारत को भविष्य में फिर कितने बड़े पैमाने पर सोचने की आवश्यकता पड़ सकती है।

रेलवे के साथ भूमि संबंधी कानूनी व्यवस्था भी विकसित हुई। 1850 के अधिनियम XLII ने सरकार द्वारा स्वीकृत रेलवे के लिए सार्वजनिक कार्यों की भूमि-अधिग्रहण व्यवस्था का रास्ता खोला; उसी वर्ष बम्बई में रेलवे भूमि के लिए प्रावधान हुए, 1852 में मद्रास ने ऐसा किया और 1857 में अधिक व्यापक भूमि-अधिग्रहण व्यवस्था सामने आई। आज के भारत में मुआवजे, पुनर्वास, पर्यावरण और नागरिक अधिकारों के मानदंड स्वाभाविक रूप से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन इतिहास का एक सबक आज भी प्रासंगिक है—जब कोई देश आने वाली पीढ़ियों के लिए बुनियादी ढाँचा बनाता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर, भूमि और संस्थागत व्यवस्था की योजना साथ-साथ बनानी पड़ती है।

➤  सड़कों ने क्या दिखाया है

स्वतंत्र भारत ने स्वयं दिखाया है कि निरंतर बुनियादी ढाँचा निर्माण क्या कर सकता है। 1951 में देश का सड़क नेटवर्क लगभग 4 लाख किलोमीटर था; आज यह बढ़कर 63.73 लाख किलोमीटर हो चुका है। केवल राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर मार्च 2026 में लगभग 1,46,572 किलोमीटर हो गई है। इसके साथ चार या अधिक लेन वाले राजमार्गों, एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर और एक्सप्रेसवे का भी असाधारण विस्तार हुआ है।

इसे रेल बनाम सड़क की बहस के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। सड़कों के विस्तार ने दिखाया है कि जब आने वाली आर्थिक और सामाजिक मांग को ध्यान में रखकर लगातार क्षमता बनाई जाती है, तो बुनियादी ढाँचे का विस्तार किस पैमाने पर संभव है। रेलवे में भी ऐसी ही दीर्घकालीन सोच भारत की सड़क क्रांति की स्वाभाविक पूरक बन सकती है।

➤  विकास का भूगोल समझना होगा

भारत की आर्थिक गतिविधियाँ तेजी से बड़े शहरी और औद्योगिक केंद्रों के आसपास केंद्रित हो रही हैं। देश के 47 दस-लाख से अधिक आबादी वाले शहर लगभग 60 प्रतिशत जीडीपी में योगदान करते हैं। इसलिए इन विकास केंद्रों को तेज, नियमित और किफायती रेल सेवाओं से जोड़ना केवल यात्रियों की सुविधा का प्रश्न नहीं है; यह आर्थिक विकास के बुनियादी ढाँचे का हिस्सा है।

और इस कनेक्टिविटी की योजना हमें दो विशाल प्रवाहों—लोगों और सामग्री—को ध्यान में रखकर बनानी होगी।

विनिर्माण, निर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोजगार बढ़ने के साथ लाखों लोग अपने गृह क्षेत्रों और उन शहरों के बीच आते-जाते रहेंगे, जहाँ रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। उनके लिए रेलवे क्षमता का अर्थ केवल अधिक गति नहीं, बल्कि पर्याप्त, भरोसेमंद और किफायती यात्रा भी है। बढ़ती अर्थव्यवस्था को उन क्षेत्रों के बीच अपने श्रमबल को सुगमता से ले जाने की क्षमता चाहिए, जहाँ श्रमिक उपलब्ध हैं और जहाँ रोजगार बढ़ रहा है।

दूसरा प्रवाह उतना ही महत्वपूर्ण है। बढ़ते शहरों और उद्योगों को कोयला, लौह अयस्क, इस्पात, सीमेंट, खाद्यान्न, वाहन, कंटेनर, कल-पुर्जे और असंख्य दूसरी वस्तुएँ चाहिए, जो देश भर की खदानों, खेतों, कारखानों और बंदरगाहों से आती हैं।

इसलिए भविष्य की रेलवे को केवल शहर से शहर नहीं, बल्कि लोगों को रोजगार से, कच्चे माल को उद्योग से, कारखानों को बाजार से और उत्पादन केंद्रों को बंदरगाहों से जोड़ना होगा।

➤ अगले पचास वर्षों की क्षमता

रेलवे के नक्शे पर यातायात का संकेन्द्रण भी उतना ही उल्लेखनीय है। सात हाई-डेंसिटी नेटवर्क कॉरिडोर रेलवे नेटवर्क का केवल लगभग 16 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल रेल यातायात का करीब 41 प्रतिशत इन्हीं पर चलता है। ये केवल व्यस्त रेल लाइनें नहीं हैं; ये देश के बड़े शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों और बाजारों को जोड़ने वाली आर्थिक धमनियाँ हैं।

आधुनिक सिग्नलिंग, ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन और बेहतर संचालन व्यवस्था मौजूदा ढाँचे से काफी अतिरिक्त क्षमता निकाल सकती हैं और इस दिशा में प्रगति जारी रहनी चाहिए। लेकिन जैसे-जैसे यातायात बढ़ेगा, भौतिक क्षमता को भी उसके साथ बढ़ना होगा।

➤ कभी-कभी एक और ट्रेन चलाने का उत्तर एक और रेल लाइन ही होती है

इसलिए हमारे सबसे व्यस्त कॉरिडोरों का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि अगले पाँच या दस वर्षों में कितनी ट्रेनें चलानी हैं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि पचास वर्ष बाद उन पर कितना यातायात होगा। भविष्य की आवश्यकता के अनुसार तीसरी और चौथी लाइनें, अतिरिक्त जोड़ी पटरियाँ, बड़े शहरों के बाईपास, नए समर्पित माल गलियारे और अत्यधिक व्यस्त इंटर-सिटी क्षेत्रों में समर्पित यात्री गलियारे भी आवश्यक हो सकते हैं।

और इन्हें अलग-अलग परियोजनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता। रेलवे एक संपूर्ण प्रणाली है। मुख्य कॉरिडोर, फीडर मार्ग, जंक्शन, टर्मिनल, बंदरगाह, औद्योगिक साइडिंग और परंपरागत यात्री नेटवर्क—इन सबकी योजना एक साथ बननी चाहिए, क्योंकि पूरी व्यवस्था की क्षमता अंततः इस बात पर निर्भर करती है कि उसके सभी हिस्से कितनी कुशलता से एक-दूसरे के साथ काम करते हैं।

➤ कल की रेलवे के लिए आज की जमीन

यह हमें शायद सबसे कठिन संसाधन—भूमि—तक ले आता है।

रेलवे के लिए सबसे कठिन भूमि अक्सर वह होती है, जिसकी आवश्यकता तब महसूस होती है, जब प्रस्तावित मार्ग के चारों ओर शहर, उद्योग, सड़कें और बस्तियाँ पहले ही फैल चुकी होती हैं। यदि किसी संभावित कॉरिडोर की पहचान बीस या तीस वर्ष पहले कर ली जाए, तो उसकी रक्षा कहीं अधिक सुविचारित तरीके से की जा सकती है।

भारत को इसलिए एक रेलवे कैपेसिटी मैप 2075 तैयार करने पर विचार करना चाहिए, जिसमें उन कॉरिडोरों की पहचान हो, जिन्हें अगले पचास वर्षों में बड़ी अतिरिक्त क्षमता की आवश्यकता पड़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर लाइन आज ही बना दी जाए। इसका अर्थ है लोगों और माल के भविष्य के प्रवाह का अनुमान लगाना, संभावित रेलमार्गों की पहचान करना, उन्हें शहरों, उद्योगों, बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स की विकास योजनाओं से जोड़ना और महत्वपूर्ण कॉरिडोरों को उस समय सुरक्षित कर लेना, जब ऐसा करना अभी संभव और व्यावहारिक है।

यह नक्शा स्थिर भी नहीं होना चाहिए। जनसंख्या, उद्योग, तकनीक और व्यापार के स्वरूप में बदलाव के साथ इसकी समय-समय पर समीक्षा हो सकती है; लेकिन मूल सिद्धांत बना रहना चाहिए—रेलवे क्षमता की योजना मांग आने से पहले बने, भीड़ बढ़ जाने के बाद नहीं।

➤ रेल और सड़क—विकास के साझेदार

भारत को रेल भी चाहिए और सड़क भी। सड़कें लचीलापन तथा अनिवार्य प्रथम और अंतिम छोर की कनेक्टिविटी देती हैं; रेलवे लंबी दूरी पर बहुत बड़ी संख्या में यात्रियों और भारी मात्रा में माल को कुशलतापूर्वक ले जा सकती है। एक सुव्यवस्थित परिवहन प्रणाली में दोनों माध्यम वही काम करते हैं, जिसमें वे सर्वश्रेष्ठ हैं।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर दिखाते हैं कि जब रेलवे क्षमता बड़े पैमाने पर और सुविचारित ढंग से बनाई जाती है, तो क्या संभव है। आज भारत के पास वह इंजीनियरिंग क्षमता, तकनीक, वित्तीय सामर्थ्य और परियोजना-प्रबंधन कौशल है, जिसकी उन्नीसवीं शताब्दी के रेलवे निर्माता कल्पना भी नहीं कर सकते थे। रेलवे के बुनियादी ढाँचे पर वर्तमान बल हमें उस भारत के अनुरूप सोचने का अवसर देता है, जो आने वाले दशकों में आकार ले रहा है।

अगले चरण में हमें अपने प्रमुख विकास केंद्रों को अधिक तेज और किफायती ढंग से जोड़ना होगा; अवसरों की तलाश में यात्रा करने वाले लाखों लोगों के लिए भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध कराना होगा; शहरों और उद्योगों तक कच्चा माल और वस्तुएँ पहुँचानी होंगी; अपने प्रमुख रेलमार्गों पर अतिरिक्त क्षमता बनानी होगी; और उन कॉरिडोरों को आज सुरक्षित करना होगा, जिनकी आवश्यकता आने वाली पीढ़ियों को होगी।

रेलवे हमेशा वर्तमान से बड़े भविष्य के लिए बनाई गई है। उन्नीसवीं शताब्दी में बिछाई गई पटरियाँ उस भारत को ढोती रहीं, जिसकी कल्पना शायद उनके निर्माताओं ने भी नहीं की थी। आज लिए गए निर्णय भी 2050 के बहुत बाद तक लोगों और माल की आवाजाही को आकार देंगे।

हमें उस समय रेलवे नहीं बनानी चाहिए, जब यातायात हमारे सामने आकर खड़ा हो जाए। हमें वह रेलवे आज बनानी चाहिए, जो उस भावी भारत को आने का रास्ता दे।

✒️ पी. के. मिश्रा, Ex. GM/MCF