Friday, September 25, 2026
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एआई : अभिशाप या वरदान

जब से मोबाइल का विस्तार होना शुरू हुआ है, तब से मोबाइल तकनीक की दुनिया में तहलका मचा हुआ है। हर थोड़े समय पर नए फीचर्स आते रहते हैं, मोबाइल अपडेट होते रहते हैं। इसी तकनीकी क्रांति की अगली और सबसे बड़ी सीढ़ी है—एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। एआई के जनक अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक जॉन मैकार्थी थे। भारत में एआई की शुरुआत 1980 के दशक में प्रोफेसर एच. एन. महाबला और अन्य वैज्ञानिकों तथा सरकार के प्रोजेक्ट्स द्वारा हुई।

आज जब से चैटजीपीटी, जेमिनी और जेनेरेटिव एआई आया है, तब से इसने बड़े से लेकर बुजुर्ग तक को अपनी चपेट में ले रखा है। कहीं मौज-मस्ती के लिए, तो कहीं जानकारी के लिए और कहीं समय बचाने के लिए अनेक कारणों से इस तकनीक का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। अब तो एआई “मल्टीमॉडल” हो गया है। यानी यह हमारी आवाज सुनकर और कैमरे से हमारे आसपास देखकर इंसानों की तरह सजीव बातचीत कर सकता है। कार्यक्षमता और गतिशीलता भी इंसानों की तुलना में ज्यादा है।

हाल ही में एआई से बने रोबोट के अस्पताल से भागने जैसे भ्रामक और एनिमेटेड वीडियो भी वायरल हुए, जिसने लोगों के मन में डर पैदा किया कि क्या एआई खुद के निर्णय ले सकता है? हालांकि यह भ्रामक है, लेकिन इसके बढ़ते प्रभाव ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यह तकनीक हमारे लिए कितनी सुरक्षित है? और हम इस पर कितना निर्भर होते जा रहे हैं? क्या यह हमारी क्रियाशीलता और रचनात्मकता को कम नहीं कर रहा है?

एआई एक ऐसी आर्टिफिशियल तकनीक है, जो कंप्यूटर मशीनों को इंसानों की तरह सोचने, सीखने और निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। सबसे बड़ी बात कि यह प्रणाली बड़ा डेटा संग्रह करने की क्षमता रखती है, जैसे टेक्स्ट, इमेज, वीडियो और मशीनों के जरिए डेटा में छिपे पैटर्न को भी पलक झपकते ही ढूंढ लेती है और साथ ही इंसानी दिमाग की नकल भी कर सकती है। यह तकनीक जटिल समस्याओं का विश्लेषण करके सही कदम या जवाब तय करने में सक्षम है। इसका चलन इसीलिए भी बढ़ा है, क्योंकि यह काम की गति और कार्य कुशलता के साथ उत्पादकता में भारी वृद्धि करता है। जो काम मनुष्य बार-बार दोहराकर थक जाता है, उसे एआई बिना थके और बिना गलती के चौबीस घंटे कर सकता है। यह ग्राहकों की पसंद को समझकर सटीक सुझाव देता है। चिकित्सा के क्षेत्र में तो इसके जरिए बीमारियों का शुरुआती दौर में ही पता लगाना संभव हो गया है।

लेकिन जिस तरह यह हमारे जीवन पर हावी होता जा रहा है, उसके नकारात्मक प्रभाव से भी हम अछूते नहीं रह सकते हैं। यदि एआई दस आदमियों का काम अकेले कर सकता है, तो कंपनियां ज्यादा वर्कर क्यों रखेंगी? इस ऑटोमेशन से शुरुआती स्तर की नौकरियों पर खतरा बढ़ रहा है और इसके अलावा इसमें प्राइवेसी रिस्क ज्यादा है। आपका व्यक्तिगत डेटा लीक या चोरी हो सकता है। आज साइबर अपराधी “डीपफेक” तकनीक का इस्तेमाल करके किसी का भी नकली चेहरा और आवाज बनाकर वित्तीय धोखाधड़ी कर सकते हैं। यही नहीं, तकनीकी रूप से एआई कई बार “मतिभ्रम” (Hallucinations) का शिकार होकर पूरे आत्मविश्वास के साथ गलत और मनगढ़ंत जानकारियां भी दे देता है। यह एआई का वह आधुनिक रूप है, जो केवल डेटा का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि इंसानों की तरह नई कविताएं, निबंध, कोडिंग और तस्वीरें खुद “पैदा” (Generate) कर सकता है। इसी वजह से यह बच्चों और बड़ों को अपनी चपेट में ले चुका है।

यदि एआई को ठीक तरीके से प्रशिक्षित नहीं किया गया, तो वह गलत फैसला ले सकता है और गलत जानकारी भी देगा। कभी भी भ्रामक उत्तर दे सकता है। इसके बढ़ते हुए प्रभाव और लोगों में लोकप्रिय होने के कारण भविष्य में अनियंत्रित और शक्तिशाली होकर इंसानों के लिए खतरा बन सकता है।

आज छोटे-मोटे कामों के लिए लोग एआई पर इतने निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे लोगों की रचनात्मकता और क्रियाशीलता पर असर पड़ रहा है। बच्चे इसका इस्तेमाल शिक्षा के बजाय मौज-मस्ती और बिना अपनी बुद्धि पर जोर दिए अपना कार्य इस ऐप के द्वारा आसानी से कर लेते हैं, जिससे उनके बौद्धिक विकास और कार्य क्षमता पर असर पड़ता है। दूसरी बात कि इस अत्याधुनिक तकनीक को स्थापित करने और इसे बनाए रखने में बहुत अधिक खर्च और पर्यावरण पर संकट भी आता है। एआई के डेटा सेंटर्स और सुपर कंप्यूटर चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत होती है, जिससे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है।

आज एआई का इस्तेमाल बैंक, हेल्थ केयर, रोजमर्रा की लाइफ, सोशल मीडिया, मनोरंजन, ऑटोमोबाइल और शिक्षा के क्षेत्र में किया जा रहा है। एआई खुद में बुरा नहीं है, यह एक औजार की तरह है—उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है कि वह इसका इस्तेमाल कैसे करता है। एआई के इस दौर में नौकरियों के संकट से बचने का एकमात्र तरीका खुद को “अपस्किल” (तकनीकी रूप से अपग्रेड) करना है।

आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा के क्षेत्र में इसका सकारात्मक उपयोग बढ़े और तकनीकी कंपनियों के साथ-साथ सरकारें सुरक्षा और रेगुलेशन के कड़े मानकों को सख्ती से लागू करें, ताकि यह तकनीक इंसानों के लिए खतरा बनने के बजाय मददगार साबित हो। एआई खुद में कोई ‘विलेन’ (खलनायक) नहीं है। यह सिर्फ एक टूल (औजार) है। एआई का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि इंसान इसका इस्तेमाल कैसे करता है। हमें इसका “गुलाम” बनने के बजाय इसे अपना “सहायक” बनाना होगा।

  • प्रियंका वर्मा माहेश्वरी, गुजरात