Friday, October 23, 2026
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400 किमी दूर UP PET परीक्षा केंद्र: नकलविहीन परीक्षा या युवाओं की अग्निपरीक्षा?

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए प्रारंभिक अर्हता परीक्षा (PET) लाखों अभ्यर्थियों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। आरोप है कि अनेक अभ्यर्थियों को उनके गृह जनपद से सैकड़ों किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र आवंटित किए गए हैं। कानपुर के अभ्यर्थियों को मथुरा और अलीगढ़ जैसे शहरों में परीक्षा देने जाना पड़ रहा है। कानपुर से मथुरा की बताई गई शहरी दूरी लगभग 339 किलोमीटर है। ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए यह दूरी 400 किमी से ऊपर हो जाती है। यदि किसी अभ्यर्थी को परीक्षा देने के लिए इतनी दूर जाना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर परीक्षा व्यवस्था की सुविधा के लिए अभ्यर्थी को इतनी बड़ी कीमत क्यों चुकानी चाहिए?
यह मामला केवल परीक्षा केंद्र की दूरी का नहीं है। यह युवाओं के समय, धन, सुरक्षा, गरिमा और समान अवसरों से जुड़ा सवाल है। उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) को स्पष्ट करना चाहिए कि दूरस्थ परीक्षा केंद्र आवंटित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और क्या इस व्यवस्था के मानवीय तथा आर्थिक परिणामों का आकलन किया गया है?
सबसे पहले आयोग को यह बताना चाहिए कि क्या अभ्यर्थियों को तीन से चार सौ किलोमीटर दूर भेज देने से नकल की संभावना समाप्त हो जाती है? क्या परीक्षा केंद्रों की दूरी बढ़ा देने भर से पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, फर्जी अभ्यर्थियों और परीक्षा व्यवस्था में सेंधमारी पर पूरी तरह रोक लग जाती है? यदि ऐसा नहीं है, तो ईमानदारी से परीक्षा देने वाले युवाओं को इस अतिरिक्त परेशानी से गुजरने के लिए क्यों विवश किया जा रहा है? नकलविहीन परीक्षा सुनिश्चित करना आयोग और प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसके लिए प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, अभ्यर्थियों का सत्यापन, तकनीकी निगरानी, परीक्षा केंद्रों पर प्रभावी नियंत्रण, संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई और दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड जैसे उपायों को मजबूत किया जाना चाहिए। केवल दूरस्थ केंद्र आवंटित कर देने से निष्पक्ष परीक्षा की गारंटी नहीं मिल जाती।
नकल रोकने की जिम्मेदारी व्यवस्था की है, उसकी कीमत अभ्यर्थियों के परिवार क्यों चुकाएं? आयोग को सार्वजनिक करना चाहिए कि परीक्षा केंद्रों के आवंटन में दूरी, उपलब्ध क्षमता और सुरक्षा से जुड़े कौन-कौन से मानदंड अपनाए गए हैं? यदि दूरस्थ केंद्रों का आवंटन किसी ठोस आवश्यकता के कारण किया गया है, तो उस आवश्यकता और उसके विकल्पों की जानकारी भी सामने आनी चाहिए। दूर शहर में परीक्षा केंद्र मिलने का अर्थ है कि अनेक अभ्यर्थियों को परीक्षा से एक दिन पहले ही घर से निकलना पड़ेगा। यात्रा के बाद अपरिचित शहर में ठहरने के लिए होटल, लॉज या गेस्ट हाउस तलाशना होगा। भोजन की व्यवस्था करनी होगी और फिर अगले दिन समय से परीक्षा केंद्र पहुंचना होगा। यह सब उस युवा के लिए कितना कठिन होगा, जिसके परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर है? परीक्षा के समय किसी शहर में अचानक बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के पहुंचने पर ठहरने के स्थानों की मांग बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में होटल और गेस्ट हाउस के किराये, भोजन की कीमतों तथा ऑटो-टेंपो के किराये में अनुचित बढ़ोतरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या परीक्षा वाले शहरों में ठहरने की उपलब्धता का आकलन किया गया है? क्या अभ्यर्थियों को विश्वसनीय आवास, परिवहन और शिकायत निवारण की जानकारी दी गई है? यदि किसी अभ्यर्थी से मजबूरी का फायदा उठाकर अधिक किराया वसूला जाता है, तो वह शिकायत कहां करेगा? आयोग और जिला प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। यदि महिला अभ्यर्थियों को भी उनके घर से डेढ़ सौ किलोमीटर या उससे अधिक दूरी पर परीक्षा केंद्र आवंटित किए गए हैं, तो उनकी यात्रा और सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता होना स्वाभाविक है। अपरिचित शहर में सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था, सुबह-सुबह परीक्षा केंद्र तक पहुंचना, सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता और किसी आपात स्थिति में सहायता मिलना, ये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। महिला सुरक्षा का अर्थ केवल परीक्षा केंद्र के भीतर सुरक्षा व्यवस्था करना नहीं है। घर से निकलने, यात्रा करने, ठहरने, परीक्षा देने और वापस लौटने तक की परिस्थितियों पर विचार करना भी जरूरी है। क्या केंद्र आवंटित करते समय महिला अभ्यर्थियों की इन कठिनाइयों का आकलन किया गया? क्या उनके लिए सुरक्षित आवागमन और आवश्यक सहायता की व्यवस्था है? यदि नहीं, तो आयोग को तत्काल इस दिशा में कदम उठाने चाहिए। महिला अभ्यर्थियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल परीक्षा देने के लिए सुरक्षा और सुविधा से जुड़े हर जोखिम को स्वयं उठाएं। जब बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को दूरस्थ शहरों में परीक्षा देने जाना पड़ता है, तो रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, ट्रेनों और बसों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। यदि बड़ी संख्या में परीक्षार्थियों की यात्रा एक ही समय के आसपास होती है, तो भीड़ प्रबंधन, अतिरिक्त परिवहन, प्लेटफॉर्म सुरक्षा और आपातकालीन चिकित्सा सहायता की जरूरत बढ़ सकती है। ऐसे में सवाल है कि रेलवे, परिवहन विभाग और जिला प्रशासन के बीच समन्वय की क्या व्यवस्था की गई है? क्या अतिरिक्त यात्रियों के संभावित दबाव का आकलन किया गया है? क्या जरूरत के अनुसार अतिरिक्त बसों और भीड़ नियंत्रण की तैयारी है? यात्रा के दौरान दुर्घटना, बीमारी या भगदड़ जैसी कोई घटना हो जाए, तो उसकी परिस्थितियों की जांच और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक होगा। लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद जांच बैठाना नहीं, बल्कि पहले से जोखिम पहचानकर उसे रोकने का प्रयास करना भी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित है। सरकारी रोजगार के अवसरों में समानता का प्रश्न अनुच्छेद 16 से भी जुड़ता है। केवल परीक्षा केंद्र दूर होने से संवैधानिक उल्लंघन भले ही सिद्ध नहीं होता हो, परंतु यदि परीक्षा व्यवस्था अभ्यर्थियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालती है, उनकी सुरक्षा में जोखिम पैदा करती है या समान अवसरों तक पहुंच को प्रभावित करती है, तो उसकी निष्पक्षता और औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार का अभ्यर्थी शायद होटल और यात्रा का खर्च आसानी से उठा ले, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार के लिए यही खर्च बड़ी चुनौती बन सकता है। PET जैसी राज्यव्यापी परीक्षा में अभ्यर्थियों को यथासंभव उनके गृह जनपद या आसपास के जिलों में परीक्षा केंद्र आवंटित किए जाने चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में परीक्षा केंद्र की दूरी 100 किलोमीटर के भीतर रखने का प्रयास किया जा सकता है, ताकि युवाओं को परीक्षा देने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा, अतिरिक्त आर्थिक बोझ, अपरिचित शहर में ठहरने की परेशानी और सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना न करना पड़े। यह 100 किलोमीटर की सीमा किसी मौजूदा कानूनी नियम का दावा नहीं, बल्कि अभ्यर्थियों की सुविधा, समान अवसर और मानवीय गरिमा को ध्यान में रखकर दिया गया व्यावहारिक सुझाव है। यदि किसी अपरिहार्य कारण से किसी अभ्यर्थी को इससे अधिक दूरी पर परीक्षा केंद्र आवंटित करना पड़े, तो आयोग को उसके औचित्य पर विचार करना चाहिए तथा निकटवर्ती जिलों में उपलब्ध विकल्पों का पूरा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आयोग को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कितने अभ्यर्थियों को 100, 150, 200, 300 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी पर केंद्र आवंटित किए गए हैं और निकटवर्ती जिलों में उपलब्ध परीक्षा केंद्रों का उपयोग क्यों नहीं किया जा सका? अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अभ्यर्थियों को दूर क्यों भेजा गया; सवाल यह है कि क्या आयोग समय रहते उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए तैयार है? युवाओं को परीक्षा में अपनी योग्यता साबित करनी है, व्यवस्था की कमियों का बोझ नहीं उठाना है। नकलविहीन परीक्षा जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर अभ्यर्थियों की परेशानी को अनदेखा करना पूरी तरह से अमानवीय है। मानवाधिकार आयोग को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए।
सरकार और परीक्षा आयोग को इस मामले में स्पष्ट जवाब देना चाहिए। निष्पक्ष परीक्षा वही है जिसमें नकल पर प्रभावी रोक हो, प्रक्रिया पारदर्शी हो और अभ्यर्थियों को अनावश्यक आर्थिक, शारीरिक तथा मानसिक संकट में न धकेला जाए। आखिरकार, परीक्षा केंद्रों की दूरी नहीं, परीक्षा व्यवस्था की ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता नकलविहीन परीक्षा का वास्तविक प्रमाण है। वातानुकूलित सरकारी कार्यालयों में बैठकर मनमाने कार्यक्रम आम आदमी पर थोपना अलग बात है और आम जन की व्यावहारिक परेशानियों को ध्यान में रखते हुए मानवीय दृष्टिकोण से किसी भी कार्य की रूपरेखा बनाना अलग बात है। लेकिन प्रज्ञा प्रदूषित हो चुके सरकारी तंत्र को यह बात शायद ही कभी समझ में आए। – डॉ. दीपकुमार शुक्ल (स्वतंत्र टिप्पणीकार)