Sunday, September 23, 2018
Breaking News
Home » विविधा » सपना मांगलिक की कलम से……हिजड़े की व्यथा

सपना मांगलिक की कलम से……हिजड़े की व्यथा

sapna-manglikकहते विकलांग उसे जिनका, अंग भंग हो जाता
मिलता यह दर्जा मुझको तो, क्यों मैं स्वांग रचाता
झूठ वेश खोखली ताली, दो कोठी बस खाली
जीता आया नितदिन जो मैं, जीवन है वो गाली।

घिन करता इस तन से हरपल, मन से भी लड़ता हूँ
कोई नहीं जो कहे तेरा, मैं दर्द समझता हूँ
तन-मन और सम्मान रौंदे, दुनिया बड़ा सताये
होता मेरे साथ भला क्यों, कोई जरा बताये।

अपनों ने ही त्याग दिया जब, मान गैर क्यों देते
जैसा भी है अपना है तू, गले लगाकर कहते
लिंग त्रुटि क्या दोष माँ मेरा, काहे फिर तू रूठी
फैंक दिया दलदल में लाकर, ममता तेरी झूठी।

मेरे हक, खुशियाँ सब सपने, मांग रहा हूँ कबसे
छीन लिया इंसा का दर्जा, दुआ मांगते मुझसे
सब किस्मत का लेखा जोखा, कर्म प्रभाव तभी तो
मैं अपने दुःख पर लेकिन तुम, मुझ पर ताली पीटो।

मित्र, बच्चे, घरबार न मेरा, कोई जीवन साथी
बस्ता, काॅपी न नौकरी बस, ताली साथ निभाती
बचकर निकलो इधर न गुजरो, वो जा रहा हिंजड़ा
केश घसीट पुलिस ले जाती, जैसे स्वान पिंजरा।

तुम सम ही सपने हैं मेरे, मैं भी ब्याह रचाऊं
लाल जोड़ा, नाक में नथनी, कुमकुम मांग सजाऊँ
बन प्रति वर्ष अरावन दुल्हन, कैसे मैं इठलाती
दिन सोलह सुहागन अभागी, विधवा फिर हो जाती।

है तन अधूरा मन अधूरा, ना कुछ मुझमे पूरा
ताली गाली लगती फिर भी, जलता इससे चूल्हा
जितना श्रापित मेरा जीवन, दुखद अधिक मर जाना
जूते चप्पल मार लाश को, कहते लौट न आना।