Monday, September 24, 2018
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स्वास्थ्य सुविधाओं की खुली लूट

pankaj-k-singhभारत में प्रतिवर्ष संक्रामक ‘दिमागी बुखार’ (जेई और एईएस) कुछ विशेष महीनों में पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेता है। विशेषकर प्रतिवर्ष लाखों भारतीय बच्चे संक्रामक ‘दिमागी बुखार’ का शिकार होकर काल के गाल में समा जाते हैं। ‘दिमागी बुखार’ से हो रही बच्चों की मौत के बेहद संवेदनशील मामलों को रोकने के लिए केंद्र सरकार को तत्काल एक बेहद कारगर रणनीति बनाने की आवश्यकता है। देशभर में ‘दिमागी बुखार’ (जेई और एईएस) की स्थिति बेहद गंभीर स्तर पर पहुंच गई है। भारत सरकार तथा राज्यों की ओर से ‘दिमागी बुखार’ की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे विशेष कार्यक्रम बहुत अधिक सफल नहीं हो सके हैं। इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए शीघ्र ही राज्य सरकारों को भी जरूरी ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
‘दिमागी बुखार’ (जेई और एईएस) की रोकथाम के लिए, आवश्यक फागिंग, टीकाकरण और शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए सरकार प्रतिवर्ष भारी-भरकम धनराशि खर्च कर रही है, परंतु लापरवाही तथा अनेक स्तरों पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण जमीनी स्तर पर कोई फायदा अभी तक दिखाई नहीं पड़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित होने वाले धन की खुली लूट देश में होती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल और भी अधिक बदतर है। यहां तक कि कई राज्यों में तो जिला मुख्यालयों तक पर भी पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
विगत कुछ वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत ने कतिपय उपलब्धियां भी प्राप्त की हैं। भारत में शिशु मृत्युदर में शनैः-शनैः सुधार हो रहा है। भारत ने संक्रामक रोगों से लड़ने में अपनी क्षमता एवं तत्परता का परिचय दिया है। संक्रामक रोगों से लड़ने के मामले में भारत का प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर सुधरा है। हाल ही में भारत में ‘इबोला’ के संक्रमण का पहला मामला सामने आने के अगले दिन सरकार ने पूरे देश में अलर्ट घोषित किया। स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने हवाई अड्डों पर ‘इबोला’ संक्रमण की जांच में चूक से बचने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी भी बना दी। इन तमाम प्रयासों के बावजूद अभी भी स्वास्थ्य सुधारों के मुद्दों पर बहुत से सुधार बाकी हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय की समीक्षा में ही यह बताया गया है कि हवाई अड्डों पर मंत्रियों की विदेश यात्राओं के ब्यौरे भी ठीक ढंग से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। यहां तक कि ‘इबोला’ पर हवाई अड्डों पर बनाए गए सतर्कता घेरे में भी कई खामियां हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय को ‘इबोला’ से सचेत करने की सुविधा से लैस बताए गए 14 हवाई अड्डों में से 12 में बड़ी लापरवाही एवं खामियां मिली हैं। इस लिहाज से देश में ‘इबोला’ के संक्रमण से बचाव करने में केवल दिल्ली और मुंबई के हवाई अड्डे ही सक्षम हैं। तथ्य यह है कि विदेश से आने वाले यात्रियों से न तो विमान में और ना ही हवाई अड्डों पर ही उनके स्वास्थ्य संबंधी फॉर्म भरवाए जा रहे है। हवाई अड्डों पर तैनात कर्मचारी भी सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग एवं आवश्यक सुरक्षा मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने यद्यपि जानलेवा और संक्रामक ‘इबोला’ वायरस ‘जीनोम’ की पहचान करने का एक सस्ता और प्रभावी तरीका विकसित कर लिया है। फिलहाल इस घातक बीमारी पर नियंत्रण पाने का एकमात्र तरीका पर्याप्त निगरानी और सतर्कता ही है। अभी भी रक्त के नमूने से ‘इबोला’ वायरल ‘जीनोम’ की श्रृंखला बना पाना बहुत बड़ी चुनौती है। दरअसल जांच में लिए गए रक्त के नमूने में वायरल ‘आरएनए’ की मात्रा बहुत ही कम होती है और इंसान का अपना ‘आरएनए’ अत्यधिक होता है। उस पर भी गर्म मौसम में वायरल ‘आरएनए’ में तेजी से बदलाव होता रहता है। इसके अलावा रक्त के नमूने को पूरी सतर्कता से यदि नहीं रखा गया, तो वह ‘इबोला’ संक्रमित है या नहीं, यह भी पता करना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका के ‘ब्रांड इंस्टीट्यूट’ के शोध के अनुसार, ‘इबोला’ वायरस के ‘जीनोम’ की श्रृंखला को इंसानी ‘आरएनए’ 10 दिनों के दौरान 80 प्रतिशत से कम करके 0.5 प्रतिशत तक ले आते हैं। इसके कारण ‘इबोला’ संक्रमण वाले वायरल ‘आरएनए’ की पहचान मुश्किल हो जाती है। – पंकज के. सिंह