Sunday, November 18, 2018
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थोथा चना, बाजे घना…..

nutan-aजी बिल्कुल सही कहते हैं आप, सरकार बेकार, समाज बेकार, लोकतन्त्र में समस्या, शासन प्रणाली सही नहीं, बस सारी जिंदगी दोष देते रहते हैं हम। कभी सोचा ये बने किससे, कौन है इनका आधार, कौन है जिम्मेदार। नहीं कभी नहीं, चलिए ये बताइए कि आपने क्या किया, सिवाय गाल बजाने के, कभी किसी सामाजिक कार्य में भागीदारी की, कभी निस्वार्थ भावना से किसी गैर की समस्या का समाधान किया, शायद कभी नहीं, करें भी क्यूँ। क्या लेना देना आपको, सीधे सच्चे इंसान हैं आप, अपने रास्ते जाना, अपने रास्ते आना अपना घर, अपनी गृहस्थी, मगन हैं आप अपनी दाल रोटी में। वो बात अलग है कभी कहीं सामाजिक मुद्दों पर बात हुई तो समय पास करने का अच्छा साधन, आपकी बेबाक राय, सिर्फ कोरी राय, करना धरना कुछ नहीं । वो ही कहावत चरितार्थ ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’।
बङे ही प्रेम से अपनी उंगली उठाना, और कमी निकालना, कोई भी समाज सेवी हो या नेता, उनके ओहदे तक पहुंचने की मेहनत किसी को नहीं दिखाई देती, बस विपक्ष की तरह तैयार हैं 24ग7उंगली उठाने को। मानते हैं गंदगी है, कुछ कमियां हैं, पर आप भी तो सिर्फ नाक सिकोड़कर मुहँ पर रूमाल रखकर, आगे बढ़ जाते हैं, क्या कभी हिम्मत की है गंदगी के थोङे हिस्से को भी साफ करने की, शायद कभी नहीं।
अजी जनाब सिर्फ झुकने की देर है, साफ करने वाले हजारों हाथ होंगे आपके साथ, कभी आगे बढ़ कर करके देखो। समस्या ये है कि ‘‘बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन’’क्योंकि बिल्ली भी आप हैं, घंटी भी आप, और बांधने वाले भी आप। बस जरूरत है समझने की, खुद को पहचानने की, साबित करने की, हम ही कर सकते हैं और कोई नहीं।
समाज, शासन हमसे बनता है बदलाव हम ला सकते हैं और कोई नहीं। पर हमारे पास तो ठेकेदारी है उंगली उठाने की, बस जब समय तो जमकर गालियाँ दी और मन हल्का कर लिया लग गए अपने काम पर।
फिर हमें ध्यान भी नहीं रहता हमनें, कब, किसके बारे में कितना बोला था। कई बार तो कुछ लोगों को कहते सुनते हैं, क्या करें, फालतू बैठे थे, तो छेङ लिया मुद्दा,और बहस इतनी तेज आवाज में की आसपास वाले भी परेशान, बात हाथापाई तक भी पहुँच जाती है। बीच बचाव कराने वाले समझाते हैं छोड़ो ये कोई हम शरीफों के मामले हैं, हमें क्या इस सबसे ।
सही बात है यही है शराफत, हमें सिर्फ बोलने का अधिकार वहीं है जब हमने उनसे ज्यादा कुछ किया, या करने की कोशिश भी की, सही कहते हैं, खाली गगरी छलकती ज्यादा।
जो लोग कुछ करते नहीं वही ज्यादा बोलते हैं। सही मायनों में ये कहा जा सकता है जो करता है, वो बोलता नहीं, दूसरों पर उंगली नहीं उठाता क्योंकि उसे पता होता है करने के पीछे की मेहनत के बारे में। कद्र करता है वो करने वाले की, उसके काम की। इसीलिए कहा गया है speech  is silver silence is gold
करने वाले शोर नहीं मचाते। मौके और जिम्मेदारी सिर्फ उन्ही को मिलते हैं, जिनमें कुछ करने का जज्बा होता है बैठे बैठे कुछ नहीं मिलता। और जो कुछ नहीं करते वो सबसे बड़ा एक काम करते हैं दूसरों पर उंगलियां उठाने का और कमियां निकालने का, उन्हें इस बङे काम से फुरसत मिले तो सोचें समाज के बारे में, देश के बारे में।
इसलिए दोष देना बंद करिए और आगे बढ़ कर कुछ करिए। वरना तो थोथा चना बाजे घना।