स्कूल की इमारत में पहला कदम रखते समय प्रत्येक बच्चा अधिक चैतन्य, ज्यादा जिज्ञासु, कुछ नया सीखने को इच्छुक, उन चीजों से कम डरने वाला जिन्हें वह नहीं जानता, चीजों को जानने समझने में अधिक चतुर, रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ, धैर्यवान और स्वतंत्र होता है। समाज के सभी व्यक्ति अभिभावक हैं, शिक्षक भी अभिभावक ही होता है। इसलिए मेरी बातों को शायद आसानी से समझ जाएंगे कि बिना औपचारिक स्कूली निर्देशों के सिर्फ आसपास की दुनिया को ध्यान से देखते हुए लोगों के संपर्क से हमारे बच्चे या छात्र तमाम जटिल और अमूर्त बातें सीख लेते हैं। वे बातें जो न तो स्कूल उन्हें कभी सीखा पाएगा और न ही कोई शिक्षक। बच्चे स्कूल जाने वाली उम्र में एक कुशल सीखने वाले होते हैं, चीजों को बार-बार करके देखना, गलतियां करना फिर अपनी गलतियों को सुधार कर वापस चीजों को पुनः कर करके देखना और सीखना उसकी आदत में शुमार होता है। बच्चों के सीखने में स्कूल की भूमिका : स्मृति चौधरी
स्कूल की इमारत में पहला कदम रखते समय प्रत्येक बच्चा अधिक चैतन्य, ज्यादा जिज्ञासु, कुछ नया सीखने को इच्छुक, उन चीजों से कम डरने वाला जिन्हें वह नहीं जानता, चीजों को जानने समझने में अधिक चतुर, रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ, धैर्यवान और स्वतंत्र होता है। समाज के सभी व्यक्ति अभिभावक हैं, शिक्षक भी अभिभावक ही होता है। इसलिए मेरी बातों को शायद आसानी से समझ जाएंगे कि बिना औपचारिक स्कूली निर्देशों के सिर्फ आसपास की दुनिया को ध्यान से देखते हुए लोगों के संपर्क से हमारे बच्चे या छात्र तमाम जटिल और अमूर्त बातें सीख लेते हैं। वे बातें जो न तो स्कूल उन्हें कभी सीखा पाएगा और न ही कोई शिक्षक। बच्चे स्कूल जाने वाली उम्र में एक कुशल सीखने वाले होते हैं, चीजों को बार-बार करके देखना, गलतियां करना फिर अपनी गलतियों को सुधार कर वापस चीजों को पुनः कर करके देखना और सीखना उसकी आदत में शुमार होता है।
Jansaamna
महोब्बत के आगे जो ममता ले आती है। वो माँ कहलाती है।
कोरोना से विश्व पर क्या असर हुआ है इसकी बानगी अमरीकी राष्ट्रपति का यह बयान है कि, “विश्व कोरोना वायरस की एक अदृश्य सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है।” चीन के वुहान से शुरू होने वाली कोरोना नामक यह बीमारी जो अब महामारी का रूप ले चुकी है आज अकेले चीन ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए परेशानी का सबब बन गई है। लेकिन इसका सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि वैश्वीकरण की वर्तमान परिस्थितियों में यह बीमारी समूची दुनिया के सामने केवल स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि आर्थिक चुनौतियाँ भी लेकर आई है। सबसे पहले 31 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को वुहान में न्यूमोनिया जैसी किसी बीमारी के पाए जाने की जानकारी दी। देखते ही देखते यह चीन से दूसरे देशों में फैलने लगी और परिस्थितियों को देखते हुए एक माह के भीतर यानी 30 जनवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे विश्व के लिए एक महामारी घोषित कर दिया।
शाहीनबाग़ संयोग या प्रयोग हो सकता है लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान देश की राजधानी में होने वाले दंगे संयोग कतई नहीं हो सकते। अब तक इन दंगों में एक पुलिसकर्मी और एक इंटेलीजेंस कर्मी समेत लगभग 42 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। नागरिकता कानून बनने के बाद 15 दिसंबर से दिल्ली समेत पूरे देश में होने वाला इसका विरोध इस कदर हिंसक रूप भी ले सकता है इसे भांपने में निश्चित ही सरकार और प्रशासन दोनों ही नाकाम रहे। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि सांप्रदायिक हिंसा की इन संवेदनशील परिस्थितियों में भी भारत ही नहीं विश्व भर के मीडिया में इसके पक्षपातपूर्ण विश्लेषणात्मक विवरण की भरमार है जबकि इस समय सख्त जरूरत निष्पक्षता और संयम की होती है। देश में अराजकता की ऐसी किसी घटना के बाद सरकार की नाकामी, पुलिस की निष्क्रियता, सत्ता पक्ष का विपक्ष को या विपक्ष का सरकार को दोष देने की राजनीति इस देश के लिए कोई नई नहीं है। परिस्थिति तब और भी विकट हो जाती है जब शाहीनबाग़ में महिलाओं को कैसे सवाल पूछने हैं और किन सवालों के कैसे जवाब देने हैं, कुछ लोगों द्वारा यह समझाने का वीडियो सामने आता है। लेकिन फिर भी ऐसे गंभीर मुद्दे पर न्यायपालिका भी कोई निर्णय लेने के बजाए सरकार और पुलिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी डाल कर निश्चिंत हो जाती है।
एक वक्त था जब नेता भाषण देते थे अपनी बात रखते थे तो उसमें वैचारिकता होती थी। नीयत तब भी वोट हासिल करने की होती थी मगर उनकी छवि साफ-सुथरी होती थी। जनता नेताओं की बात सुनती थी। आज की तरह अपनी बात को सुनाने के लिए भाड़े के ट्टू नहीं लाने पड़ते थे। आज कितने ही नेतागण ऐसे हैं जिनके ऊपर आपराधिक मामले दर्ज हैं और उनमें नैतिकता लेशमात्र भी नहीं दिखाई देती। ऐसे भी नेता हैं जो अपने बयान के कारण समाज में हंसी का पात्र बन जाते हैं और शर्मिंदगी उठाते हैं। नेताओं के विवादित बयान एक ही बात दर्शाती है कि या तो वह खुद को चर्चित करना चाहते हैं या इस तरह के बयानों द्वारा अपने समर्थित दल में खास जगह पाना चाहते हैं। या फिर क्या इस तरह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते हैं? बीजेपी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, सपा, बसपा के नेताओं को कई बार अपने बयानों के कारण सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी है मगर तब तक जबान फिसल चुकी होती है।
सामने 20 हजार प्रति किलो वाले मशरूम की प्लेट रखी थी, लेकिन मंत्रीजी एक निवाला तक हलक से नीचे नहीं उतार पा रहे थे। उन्हें अमरीकी दद्दा के आने की सूचना जैसे ही मिली, मंत्रीजी गहन चिन्ता के सागर में समा गये | तभी उनका निजी सहायक आ पहुंचा | मंत्रीजी का लटका चेहरा देख पलभर में भांप गया कि मंत्रीजी को क्या परेशानी है।